Gyan Ganga: जीव सुखी कैसे हो ? इस प्रश्न का भगवान श्रीकृष्ण ने बड़ा सुंदर उत्तर दिया है

Gyan Ganga: जीव सुखी कैसे हो ? इस प्रश्न का भगवान श्रीकृष्ण ने बड़ा सुंदर उत्तर दिया है

हम तो दुखालय में सुख ढूँढ़ रहे हैं। कहाँ से मिलेगा? किसी भी काल में संभव नही है। जो आनंद सुख राशि हैं उनसे दुख मांगोगे तो भी नहीं मिलेगा। क्योंकि उनके आलय में दुख है ही नहीं। कुंती मैया ने दुख मांगा तो कहाँ दिया, है ही नहीं तो कहाँ से देंगे।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रय विनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम:॥ 

प्रभासाक्षी के कथा प्रेमियों ! पिछले अंक में हमने पढ़ा था कि हरिद्वार में गंगा के निर्मल तट पर महामुनि मैत्रेय जी और विदुर जी की मुलाक़ात होती है। दोनों भगवत चर्चा में लीन हो जाते हैं। आइए ! आगे के प्रसंग में चलते हैं। 

भगवत सत्संग के दौरान विदुर जी ने महामुनि मैत्रेय जी विविध प्रश्न पूछे। 

सुखाय कर्माणि करोति लोको न तै: सुखम वान्युदुपारमम वा।  

विंदेत भूय: तत एव दु:खम यदत्र युक्तम भगवान वदेत न:॥  

विदुर जी ने पूछा प्रभो! कृपा करके बताएं कि संसार का हर प्राणी सुखी होना चाहता है, ऐसा कोई नहीं जिसको सुख की लालसा न हो, मानव मात्र सुखी होना चाहता है। और केवल चाहता ही नहीं बल्कि उसके लिए दिन-रात प्रयत्नशील भी रहता है। हम जितना भी भाग-दौड़ कर रहे हैं, बस सबका एक ही उद्देश्य है सुखी हो जाएँ। पर देखा जाता है कि जो जितना ही सुखी होने का प्रयत्न करता है उतना ही दुख के दल-दल में फँसता जाता है। सुखी कोई नहीं हो पाता। मेरा प्रश्न यह है की जीव सुखी कैसे हो। 

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बोलिए! जय श्री कृष्ण -------

हम जितना ही दुख से छुटकारा पाना चाहते हैं उतना ही दुख के दल-दल मे गिरते चले जाते हैं। पहले एक झोपड़ी थी, तो चाहते थे कि एक कोठी बन जाए, कोठी बनी तो गाड़ी, फैक्ट्री लग जाए। ऐसा करते-करते राजाओं जैसा वैभव हो गया पर किसी ने पूछा कितने सुखी हो पाए ? तो प्रश्न जहां के तहाँ। पहले तो भोजन में दस-दस रोटियाँ खा लेते थे, मस्ती से रहते थे, अब तो रात में सोने के लिए नींद की गोली लेनी पड़ती है। खाने के नाम पर डॉक्टरों ने कह दिया दाल का पानी पियो। भोजन भी गया रात की नींद भी गई। जो सुख था, वह भी गया।

एक दृष्टांत:- एक राजा अपने मंत्री के साथ कहीं जा रहा था, उसने देखा कि दोपहर की तपती धूप में एक किसान ने अपने खेत में ही सूखी रोटी और मिर्च का अचार खाया और फिर हल जोतने लगा, उसका मुख मण्डल चमक रहा था बड़ा सुखी और संतुष्ट लग रहा था। राज को किसान के सुख-शांति से जलन होने लगी। उसने मंत्री से कहा- किसान के सामने 99 सोने की अशर्फियों से भरी एक थैली रख दो। किसान अशर्फियों से भरी थैली देखकर बहुत खुश हुआ, अशर्फियां गिनने लगा उसके परिवार के सभी सदस्यों ने गिना, बार-बार गिनती की गई सौ में एक कम। अब किसान को निन्यानबे का चक्कर लग गया सौ कैसे पूरा करूँ। चिंता में रहने लगा भूख प्यास खत्म। मुख मलीन हो गया जो सुख था, वह भी गया सौ पूरा नहीं कर पाया।  

  

मैत्रेय मुनि ने कहा- विदुर जी आप साक्षात धर्म के अवतार हैं। मांडव मुनि के शाप से धर्मराज को विदुर के रूप में प्रकट होना पड़ा। बड़ा बढ़िया प्रश्न आपने पूछा- देखिए जगत में सुख है ही नहीं। जहाँ हम सुख ढूढ़ रहे हैं वहाँ है ही नहीं। सुख तो हमारे भीतर है।

ऐसे घट-घट राम हैं दुनिया देखे नाहि, कस्तूरी मन में बसे मृग ढ़ूंढ़े मन माहि। 

दृष्टांत—प्यासा जल की खोज मे तालाब पर पहुँचा, पानी है किन्तु काई जमी है, पी नहीं सकता। रेगिस्तान में बालू पर सूर्य की किरणें पड़ने से पानी का आभास हुआ दौड़ कर गया एक बूंद नहीं। अरे! प्रभु रूपी आनंद तो हमारे भीतर है किन्तु अज्ञान रूपी काई जमी है। 

दृष्टांत--- एक बाप ने अपने बेटे को फल खरीदने के लिए बाजार में भेजा। दुकानदार ने फल दे दिए। फल लेकर जब वह घर पहुंचा, फल देखकर उसके पिताजी क्रोध में लाल-पीले हो गए। बच्चे को डाँटने लगे, तुमने ये नकली फल क्यों उठा लाए? बच्चे ने जवाब दिया- दुकानदार ने ये ही फल दिए। आदमी दौड़ा-दौड़ा दुकानदार के पास गया, क्रोधित होकर दुकानदार को भला-बुरा कहने लगा। दुकानदार ने कहा-- नाराज बाद में होइए, पहले दुकान का बोर्ड पढ़ लीजिए नकली फलों की दुकान। लोग अपने घरों को सजाने के लिए ले जाते हैं खाने के लिए नहीं। आप के बेटे ने आम माँगे मैंने दे दिए, मुझे क्या मालूम कि खाने के लिए माँग रहा है कि सजाने के लिए। गलती तुम्हारी है, बोर्ड क्यों नहीं पढ़ा। उसी प्रकार भगवान ने स्पष्ट बोर्ड टांग दिया है। दुखालयमशाश्वतम् जगत। यह संसार दु:खालय है।  

अरे! भाई औषधालय मे औषधि मिलेगी गरम-गरम समोसा तो वहाँ मिल नहीं सकता, भोजनालय, पुस्तकालय विद्यालय वैसे ही यह संसार दुखालय है इसमे सुख कहाँ से मिलेगा? बाहर का सुख नकली है। दुखालय में कोई एक ही दुख थोड़ी है, अनेकों दुख हैं। 

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कोई तन दुखी कोई मन दुखी कोई धन बिनु रहत उदास 

थोड़े-थोड़े सब दुखी सुखी राम के दास॥ 

हम तो दुखालय में सुख ढूँढ़ रहे हैं। कहाँ से मिलेगा? किसी भी काल में संभव नही है। जो आनंद सुख राशि हैं उनसे दुख मांगोगे तो भी नहीं मिलेगा। क्योंकि उनके आलय में दुख है ही नहीं। कुंती मैया ने दुख मांगा तो कहाँ दिया, है ही नहीं तो कहाँ से देंगे। उसी प्रकार आप इस जगत के दुखालय में सुख चाहेंगे तो कहाँ से मिलेगा? ईश्वर के चरणाविन्दों में मन लगाए बिना शांति कहाँ? सुख का सागर तो भगवान के चरणों में है। बिजली के विशेषज्ञ को बुलायें वह आपका तार जोड़ देगा आपके घर में भी बिजली का प्रकाश प्रकट हो जाएगा। 

प्रभु ने सबके भीतर आनंद भर दिया है जरूरत है, टी॰वी॰ ऑन करें सही चैनल पर लगाएं। हनुमान जी महाराज ने अपना चैनल जोड़ दिया। 

जासू हृदय आगर बसहू राम सर चाप धर। 

ईश्वर; सर्व भूतेषू। 

सबके भीतर वह बैठा है पर दिखाई नहीं दे रहा है। देखो हनुमान जी ने छाती चीरकर दुनिया को दिखा दिया। जिसको मंदिर मस्जिद में ढ़ूंढ़ते हो वह यहाँ ही बैठा है। 

इस प्रकार से मैत्रेय मुनि ने विदुर जी को बड़ा सुंदर उपदेश दिया।

विदुर ने सृष्टि के बारे में प्रश्न किया तो विस्तार से सृष्टि प्रक्रिया का वर्णन किया। भगवान नारायण की नाभि कमल से ब्रह्मा की उत्पति हुई। ब्रह्मा ने सृष्टि की इच्छा प्रकट की। सर्व प्रथम चार ब्राह्मण कुमार सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने इनसे सृष्टि विस्तार करने को कहा तो चारों कुमारों ने मना कर दिया। नहीं पिताजी हम इस चक्कर में नहीं पड़ेगे, हम हरि का भजन करेंगे। ब्रह्मा जी को क्रोध आ गया हमारे ही पुत्र हमारी आज्ञा नहीं मानते। इतना क्रोध आया कि क्रोध ही भृकुटी का भेदन करके रुद्र के रूप में प्रकट हुआ। बोलिए रुद्र भगवान की जय।

        

क्रमश: अगले अंक में--------------

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

-आरएन तिवारी