Gyan Ganga: प्रभु आखिर क्यों भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए दौड़ पड़े थे?

Gyan Ganga: प्रभु आखिर क्यों भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए दौड़ पड़े थे?

हाथी तो संसार का सच समझ गया। पर हम मानव नहीं समझ पाए। देह का अभिमान लिए हुए हाथी की तरह उन्मत्त विचरण करते हैं पर जब मृत्यु रूपी मगर पैर पकड़ता है तो छोड़ता नहीं। परिजनों की सेवा की भी एक सीमा होती है।

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥ 

प्रभासाक्षी के श्रद्धेय पाठकों ! आज-कल हम सब भागवत कथा सरोवर में गोता लगा रहे हैं। 

पिछले अंक में हम सबने असुरकुल भूषण प्रह्लाद जी का सुंदर चरित्र पढ़ा-

जिस पिता ने बालक प्रह्लाद को भगवान की भक्ति करने से रोकना चाहा, तरह-तरह की यातनाएँ दीं, ज़हर देने की कोशिश की, उन्हें मौत के घाट उतारने की कोई कसर नहीं छोड़ी, उस निर्दयी पिता के लिए भी प्रह्लाद ने मोक्ष माँगा। 

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आइये ! परम मंगलमय भगवत स्वरूप श्रीमदभागवत महापुराण के अंतर्गत अष्टम स्कन्ध में प्रवेश करें। इसमें मन्वन्तरों का निरूपण किया गया है। कलियुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग ये चारों युग जब एक-एक हजार वर्ष व्यतीत होते हैं तब ब्रह्मा जी का एक दिन होता है ब्रह्मा जी के एक दिन में चौदह मन्वन्तर होते हैं। एक मन्वन्तर लग-भग बहतर चतुर्युगी के बराबर होता है। मन्वन्तरों में भगवान के अवतार हुआ करते है। एक बार प्रभु ने एक गज का ग्राह से उद्धार करने के लिए “हरि” अवतार लिया। 

आसीत् गिरिवरो राजन् त्रिकूट इति विश्रुत:

क्षीरोदेनावृत: श्रीमान योजनायुत मुछृत: ॥    

त्रिकूट नामक पर्वत पर एक गजराज (श्रेष्ठ हाथी) अपनी हथिनियों के झुंड के साथ विहार किया करता था। वह गजराज इतना बलशाली था कि सिंह भी उससे डरते थे। 

यद्गन्धमात्रा द्धरयो गजेन्द्रा व्याघ्रादयो व्यालमृगा: सखड्गा: 

महोरगाश्चापि भयाद् द्रवन्ति सगौर कृष्णा: शरभाश्चमर्य:।।

वह एक दिन प्रचंड गर्मी के आतप से संतप्त जल पीने के लिए सरोवर में गया। पानी पीकर प्यास बुझाई पर उसी में प्रविष्ट होकर जलक्रीड़ा करने लगा। सरोवर का जल जब मैला होने लगा तब उसी में बैठे एक ग्राह (मगरमच्छ) को क्रोध आ गया। उसने गजराज का पैर पकड़ लिया। पहले तो गजराज ने सोचा, ये नन्हा सा जीव मेरा क्या बिगाड़ लेगा मेरे डर से तो बड़े-बड़े सिंह और जंगली जानवर पलायन कर जाते हैं, यह किस खेत की मूली है। पर जब अपना अधिकतम बल लगाने के बाद भी पैर छुड़ा नहीं सका तब समझ गया यह साधारण नहीं है। अपनी हथिनियों की तरफ इशारा किया कि मुझे बचाओ। संकट की घड़ी में समस्त सपरिवार के लोगों ने एक साथ मिलकर अपना बल लगाया फिर भी ग्राह ने पैर नहीं छोड़ा। बहुत समय तक दोनों गज-ग्राह में युद्ध चलता रहा। अंत में उस गज श्रेष्ठ के परिवार के सभी लोग उसे छोड़कर धीरे-धीरे जाने लगे। गजराज ने आर्त स्वर में पुकारा- देवियों ! इस संकट में  मुझे अकेला छोड़कर कहाँ जा रही हो ? हथिनियों ने कहा- महाराज ! आंखिर कब तक यहाँ हम भूखे-प्यासे खड़े रहें। यह सुनकर हाथी को वैराग्य हो गया। उसके समक्ष संसार का सच सामने आ गया। सोचने लगा जब तक मुझ में बल था, पराक्रम था तब पूरा झुंड मेरे साथ चलता था। आज इस छोटे से मगर ने मेरा पैर पकड़ा तो छोडकर सब चले गए। अब पता चल गया कि ये सब मेरे सुख के साथी थे, जीने मरने की कसमें खाईं थी वादा किया था। किन्तु आज जब मै दुख में पड़ा तो सब साथ छोड़ कर चल दिए।

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कसमें वादे प्यार वफा ये वादे हैं वादों का क्या 

कोई किसी का नहीं है जग में नाते हैं नातों का क्या ।   

प्रसिद्ध समाज सुधारक गुरु नानक जी कहते हैं– 

प्रीतम जानि लियो मन महिं,

अपने सुख से ही जग बांध्यों, 

कोऊ काहु को नाहि।

सुख में आन सबै मिलि बैठत, रहत चहुं दिशि घेरे 

विपति पाई सबहि संग छाड़त कोऊ न आवत नेरे। 

हाथी तो संसार का सच समझ गया। पर हम मानव नहीं समझ पाए। देह का अभिमान लिए हुए हाथी की तरह उन्मत्त विचरण करते हैं पर जब मृत्यु रूपी मगर पैर पकड़ता है तो छोड़ता नहीं। परिजनों की सेवा की भी एक सीमा होती है। अंततोगत्वा वो भी भगवान से प्रार्थना करने लगते हैं– हे प्रभो ! अब इन्हें उठाओ। पर आश्चर्य है कि इसके बाद भी हम लोगों की आसक्ति नहीं छूटती। अब गजेंद्र समझ गया, प्रभु के सिवाय और कोई मेरी रक्षा नहीं कर सकता। उसने प्रभु के चरणों में ध्यान लगाया और बड़ी अद्भुत स्तुति की, पर उसकी स्तुति में किसी देवता का नाम एक बार भी नहीं आया। 

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम 

पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥   

      

जो इस जगत का मूल कारण है जो इस संसार की रचना, पालन और संहार करने वाला है, उस परम तत्व को मेरा प्रणाम। पर वो है कौन? नाम किसी का नहीं। 

एवं गजेन्द्र मुपवर्णित निर्विशेषम् ब्रह्मादयो विविधलिंग भिदाभिमाना:

नैते यदोपससृपु निखिलात्मकत्वात तत्राखिलामरमयो हरिराविरासित॥   

ब्रह्मा आदि देवता देख रहे हैं सुन रहे हैं परंतु विचार कर रहे हैं कि जब मुझे पुकारता नहीं हमारा नाम नहीं लेता तो हम क्यों दौड़ें ? प्रभु ने सोचा कि इतनी सुंदर स्तुति और नाम किसी का नहीं। आखिर यह किसकी स्तुति मानी जाए। अंत में विचार किया जो किसी की नहीं वो मेरी। करुणा के सागर प्रभु, भक्त वत्सल गजराज की रक्षा करने गरुण पर सवार होकर दौड़ पड़े।

   

जय श्री कृष्ण -----                                              

क्रमश: अगले अंक में --------------

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ----------

-आरएन तिवारी