Gyan Ganga: माता सीताजी की अवस्था देख हनुमानजी के मन में क्या विचार आ रहे थे?

Gyan Ganga: माता सीताजी की अवस्था देख हनुमानजी के मन में क्या विचार आ रहे थे?

माता सीता जी की यह अवस्था देख, श्रीहनुमान जी मन ही मन अत्यंत दुखी व पीड़ित हो रहे हैं। यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी माता सीता जी के संबंध में जो कह रहे हैं, कि उनके नयन अपने श्रीचरणों में थे, और वे लीन श्रीराम जी के पावन श्रीचरणों में थीं।

श्रीहनुमान जी वृक्ष पर चढ़े हुए, व पत्तों की आड़ में छुप कर माता सीता की वास्तविक स्थिति निहार रहे हैं। सब ओर से सक्षम व समर्थ, श्रीहनुमान जी अत्यधिक चिंतन में हैं कि माता सीता की पीड़ा को कैसे हरा जाए। और माता सीता जी भी, ऐसा नहीं कि वे अबला हों। बस प्रभु की लीला में, इस लीला का एक महत्वपूर्ण पात्र निभाने के, अपने परम कर्तव्य का वे निर्वहन कर रही हैं। और बैराग की यह अवस्था तो देखिए। माता सीता निरंतर अपने श्रीचरणों को निहारे जा रही हैं। और अपने नयनों को, अपने श्रीचरणों में कुछ यूँ लगाए हुए हैं, कि नयन भले ही उनके अपने श्रीचरणों में हों, लेकिन मन में चिंतन, प्रभु श्रीराम जी के श्रीयुगल चरणों का ही है-

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: अशोक वाटिका में माता सीता को देखकर हनुमानजी के मन में क्या ख्याल आया?

‘निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी।।’

माता सीता जी की यह अवस्था देख, श्रीहनुमान जी मन ही मन अत्यंत दुखी व पीड़ित हो रहे हैं। यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी माता सीता जी के संबंध में जो कह रहे हैं, कि उनके नयन अपने श्रीचरणों में थे, और वे लीन श्रीराम जी के पावन श्रीचरणों में थीं। सज्जनों कभी सोचा है, कि इन शब्दों में गोस्वामी जी, माता सीता की क्या मनःस्थिति का का उल्लेख करना चाहते हैं। भक्ति भाव से एक बार देखिए तो, कि माता सीता क्या सोच रही होंगी। निश्चित ही माता सीता अपने श्रीचरणों को देख, स्वयं को समझा रही होंगी, कि हे मेरे चरण देवता! आप से विनती है, कि आप ही चलकर मुझे वहाँ लिजा सकते हो, जहाँ मेरे प्रभु के युगल श्रीचरणों की पदचाप होती है। मेरे प्रभु की पदचाप की ध्वनि ऐसी मीठी है, कि श्रीराग की मधुरता भी फीकी सिद्ध होती है। यह सुंदर ध्वनि ऐसी है, मानो कोकिला अपने संपूर्ण माधुर्य व सौंदर्य को समेटे हुए हो। वह मनमोहक प्रभुपद् ध्वनि की तीनों लोकों में कोई काट नहीं। इसलिए हे मेरे अभागे चरणों! मेरी आप से विनती है, कि कैसे भी एक बार, मुझे आप मेरे प्रभु के श्रीचरणों के दर्शन सुलभ करवा दो। मैं प्रण करती हूँ, कि मैं आपके संपूर्ण अपराध क्षमा कर दूंगी। आप सोच रहे होंगे, कि आपने क्या अपराध किया है? अपराधा भी कोई छोटा-मोटा नहीं, अपितु अक्षम्य अपराध किया है। अपराध यह है, कि श्रीलक्ष्मण जी ने जब, कह ही दिया था, कि कुछ भी हो, हमें लक्ष्मण रेखा को पार नहीं करना है, तो तुम दोनों कुटिया में ही रहने को क्यों नहीं डटे रहे। तुम कह देते कि हम तो टस से मस नहीं होंगे। जानकी जी जाती हैं, तो जायें, लेकिन हम यहाँ से रत्ती भर नहीं हिलेंगे। लेकिन क्या करूँ, मैं तो अभागी थी, या यह कह लो, कि प्रभु की लीला का अनुसरण करने में बाध्य थी। प्रभु के आदेशों का पालन करना ही था। पर तुम तो बाध्य नहीं थे। तुम अपने स्थान से न हिलते। कह देते कि हमें गतिमान नहीं होना है, तो बस नहीं होना है। आपके इस कदम से अधिक से अधिक क्या होता, इतना ही तो होता न, कि संपूर्ण जगत में बस बदनामी होती। जगत कहता कि देखो, जानकी जी के चरण ही उनके कहने में नहीं हैं। दुनिया ने जो कहना है, कहने देते। इससे कम से कम, प्रभु से वियोग की पीड़ा सहने से तो बच जाते। और जो बदनामी का परिणाम, प्रभु की निकटता सुलभ करवाये, भला वह बदनामी कैसे हुई। अब देख रहे हो न अपने आप को। कैसे प्रतिक्षण उदास रहते हो। तब अवसर था, कि कुटिया में रुके रहते। लेकिन तुम दोनों नहीं रुके। और आज यहाँ अशोक वृक्ष तले, ऐसे रुके, कि चलने को तरस गए हो। क्यों अब कहाँ गई तुम्हारी चपलता। अब क्यों हर समय मुँह मसोसे से रहते हो। अरे पगलो! तुम नहीं जानते, कि तुम्हें देख-देख कर, मैं अपने प्रभु के श्रीचरणों में लीन रहती हूँ। बस यही एक कारण है, कि तुम दोनों मेरे शाप से अभी तक, अछूते प्रतीत हो रहे हो। नहीं तो जिन निज चरणों के कारण मैं अपने प्रभु के श्रीयुगल पदों के दर्शन करने को तरस गई हूँ, उन निज चरणों को मैं कब का त्याग देती।

इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: विभीषण सबकुछ जानते थे फिर भी माता सीता से पहले मिलने का प्रयास क्यों नहीं किया?

यह सुन कर माता सीता जी के दोनों श्रीचरणों को भी आभास था ही, कि माता सीता हम पर क्रोधित थोड़ी न हैं। यह तो उनकी पीड़ा है बस। जो कि वे हमारे बहाने से व्यक्त कर रही हैं। लेकिन सच में हमसे अब उनकी यह पीड़ा सही नहीं जाती। और एक बार के लिए देखा जाये, तो मईया सत्य ही तो भाषण कर रही हैं। श्रीराम जी की कुटिया से हमें ही नहीं हिलना चाहिए था। हम क्या हिले, देखो सब हिल-सा ही तो गया। लेकिन हे जानकी माता! हमें क्षमा करें। हम भी तो विवश थे। हम बेगाने होते, तो संभव भी था, कि आज आप श्रीराम जी के समीप होती। लेकिन क्या करें, हम आपका अंग जो हुए, तो आपसे टूट कर दूर कहीं जा भी तो नहीं सकते। लेकिन हम वादा करते हैं, कुटिया से लंका तक की यात्र, और अब यहाँ का निरंतर कष्ट, यह सब प्रकार के कष्टों के अंत के साक्षी भी हम ही बनेंगे। शीघ्र ही आप, श्रीराम जी के पावन श्रीचरणों में होंगी। हमारा विश्वास कीजिए, पवन में कुछ ऐसी सुगंध अवश्य प्रतीत हो रही है, कि प्रभु के आगमन के चिन्न प्रगट से होते दिखाई दे रहे हैं। माता सीता को निज चरणों के इन शब्दों ने मानो सहारा-सा दिया। और वे पूनः प्रभु के सिमरन में लीन हो गईं।

आगे क्या घटता है, जानने के लिए इन्तजार करें अगले अंक का---(क्रमशः)---जय श्रीराम। 

-सुखी भारती