दुष्टों को मार भक्तों की रक्षा करती हैं मां कालरात्रि

  •  प्रज्ञा पाण्डेय
  •  अक्टूबर 5, 2019   12:09
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दुष्टों को मार भक्तों की रक्षा करती हैं मां कालरात्रि

नवरात्र में मां कालरात्रि की विशेष रूप से आराधना की जाती है। देवी को प्रसन्न करने के लिए जातक पूजा करते समय लाल, नीले या सफेद रंग के कपड़े पहन सकते हैं। मां कालरात्रि की प्रातः काल सुबह चार से 6 बजे तक करनी चाहिए।

दुर्गा के सातवें रूप को मां कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। नवरात्र के सातवें दिन इनकी पूजा होती है। देवी कालरात्रि दुष्टों को मार कर भक्तों की रक्षा करती हैं, तो आइए हम आपको मां कालरात्रि की महिमा तथा पूजन विधि के बारे में बताते हैं।

  

मां कालरात्रि का स्वरूप

नवरात्र के सातवें दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र में स्थिर कर पूजा करनी चाहिए। इसके लिए ब्रह्मांड की सभी सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं। देवी कालरात्रि को व्यापक रूप से माता देवी- भद्रकाली, काली, महाकाली, भैरवी, मृत्यु, रुद्राणी, चामुंडा, दुर्गा और चंडी कई नामों से जाना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालारात्री के अन्य नाम हैं। काली और कालरात्रि एक दूसरे के परिपूरक होती हैं। ऐसी मान्यता है कि देवी के इस रूप से सभी राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश होता है।

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मां कालरात्रि की पूजा विधि

नवरात्र में मां कालरात्रि की विशेष रूप से आराधना की जाती है। देवी को प्रसन्न करने के लिए जातक पूजा करते समय लाल, नीले या सफेद रंग के कपड़े पहन सकते हैं। मां कालरात्रि की प्रातः काल सुबह चार से 6 बजे तक करनी चाहिए। जीवन की कठिनाइयों को कम करने के लिए सात या सौ नींबू की माला देवी को अर्पित कर सकते हैं। सप्तमी की रात में तिल या सरसों के तेल की अखंड ज्योति जलाएं। इसके अलावा अर्गला स्तोत्रम, सिद्धकुंजिका स्तोत्र, काली चालीसा और काली पुराण का पाठ करना चाहिए। सप्तमी की पूरी रात दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। देवी कालरात्रि की पूजा करते समय इस बात का ध्यान रखें जिस स्थान पर मां कालरात्रि की मूर्ति है उसके नीचे काले रंग का साफ कपड़ा बिछा दें। देवी की पूजा करते समय चुनरी ओढ़ाकर सुहाग का सामान चढ़ाएं। इसके बाद मां कालरात्रि की मूर्ति के आगे दीप जलाएं।

मां कालरात्रि का महत्व 

देवी कालरात्रि ने राक्षसों के राजा रक्तबीज को मारने के लिए अवतार लिया था। मां की आराधना से घर में सुख-समृद्धि आती है। मां कालरात्रि का रूप भयानक है, लेकिन वह अपने भक्तों को शुभ फल देती हैं। देवी कालरात्रि को याद करने से राक्षस, दानव, दैत्य, भूत-प्रेत डरकर भाग जाते हैं। दुष्टों का दूर भगाने वाली मां कालरात्रि ग्रह बाधाओं को भी खत्म करती हैं।

मां कालरात्रि से जुड़ी कथा

पौराणिक कथा के अनुसार शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में सबको दुखी किया था। परेशान होकर अंत में सभी देवता शिव जी के पास गए। शिव जी ने भक्तों की दशा देखकर देवी पार्वती को राक्षसों को मारने को कहा। शिव जी के आदेश पर पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ को मार दिया। लेकिन देवी दुर्गा ने रक्तबीज को जब मारा तो उसके शरीर से लाखो रक्तबीज पैदा हुए। इसे देखकर दुर्गा जी ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया और जब दुर्गा जी ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया। इसके बाद सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया।

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मां का पसंदीदा भोग

मां कालरात्रि को प्रसन्न करने के लिए सप्तमी के दिन भगवती को गुड़ का नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मण को दान देना चाहिए। ऐसा करने से कोई दुख नहीं होता है।

प्रज्ञा पाण्डेय







Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

  •  आरएन तिवारी
  •  जनवरी 15, 2021   16:50
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Gyan Ganga: भगवान दूसरों के हित के लिए ही इस धरती पर लेते हैं अवतार

भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

सज्जनों! श्रीमद्भगवत गीता केवल श्लोकों का पुंज नहीं है। श्लोक होते हुए भी भगवान की वाणी होने से ये मंत्र भी हैं। इन मंत्र रूपी श्लोकों में बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ है जो समस्त मानव जाति के लिए अत्यंत उपयोगी है।

आइए ! गीता प्रसंग में चलें--- पिछले अंक में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के मन में उत्पन्न शंका का समाधान करते हुए कर्मयोग करने का उपदेश दिया था। इस जगत में कर्म ही प्रधान है, कर्म की प्रधानता को देखकर ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा—

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कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।

श्री भगवान उवाच

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 

आगे भगवान कहते हैं- हे अर्जुन! महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य मनुष्य भी उसी का ही अनुसरण करते हैं, वह श्रेष्ठ-पुरुष जो कुछ आदर्श प्रस्तुत कर देता है, समस्त संसार भी उसी का अनुसरण करने लगता है। 

इंसान के कर्तव्य कर्म का असर देवताओं पर भी पड़ता है और वे भी अपने कर्तव्य कर्म में संलग्न हो जाते हैं। 

इस विषय में एक दृष्टांत है- चार किसान बालक थे। आषाढ़ का महीना आने पर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलाने का समय आ गया है, वर्षा नहीं हुई तो न सही, हम तो समय पर अपने कर्तव्य का पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेत में जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरों ने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि क्या बात है? वर्षा तो अभी हुई नहीं, फिर 

ये हल क्यों चला रहे हैं? जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्य पालन में पीछे क्यों रहें? ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लगे। अब मेघों (बादलों) ने विचार किया, हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं? सारी बात पता लगने पर उन्होंने भी सोचा कि हम अपने कर्तव्य से क्यों हटें? उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। अब मेघों की गर्जना सुनकर इंद्र ने सोचा कि बात क्या है? जब इंद्र को मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं, तब इंद्र ने भी अपने कर्तव्य-पालन का निश्चय किया और मेघों को वर्षा करने की आज्ञा दे दी।    

यह है, कर्म का प्रभाव। जब प्रत्येक व्यक्ति अहंकार छोड़कर अपने-अपने कर्तव्य का पालन करता है, तब परिवार, समाज, राष्ट्र और सम्पूर्ण संसार को सुख पहुंचता है। 

अब निम्नलिखित श्लोक में भगवान अपना स्वयं का उदाहरण देकर अपने वक्तव्य की पुष्टि करते हैं। 

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।

नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- हे पृथा पुत्र पार्थ! इस त्रैलोक में मेरे लिए कुछ भी करना बाकी नहीं है। मुझे सब कुछ प्राप्त है फिर भी मैं कर्म करता हूँ। भगवान ने बड़ी विलक्षण बात कही है। अपने लिए कोई कर्तव्य न होने पर भी भगवान दूसरों के हित के लिए इस धरती पर अवतार लेते हैं और सज्जनों का उद्धार, दुर्जनों का विनाश तथा धर्म की स्थापना करने के लिए कर्म करते हैं।

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“धर्म संरक्षणार्थाय धर्म संस्थापनाय च”

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

भगवान कहते हैं- हे अर्जुन ! यदि मैं अपना कर्म सावधानी पूर्वक न करूँ तो बड़ा अनर्थ हो जाएगा, क्योंकि मैं आदर्श पुरुष हूँ। सम्पूर्ण प्राणी मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं, यदि मैं अपने कर्तव्य का पालन नहीं करूँ, तो इस संसार में कोई भी अपने कर्तव्य का पालन नहीं करेगा और कर्तव्य का पालन नहीं करने से उनका पतन हो जाएगा। मनुष्य को इस जगत में कैसे रहना चाहिए? यह बताने के लिए भगवान मनुष्य लोक में अवतार लेते हैं। सच पूछिए, तो संसार एक पाठशाला है जहाँ हमें लोभ और लालच को किनारे कर अपने साथ-साथ दूसरों के हित के लिए कर्म करना सीखना है। शास्त्र और उपनिषदों का यही निचोड़ है कि हम जीवन पर्यंत दूसरों के हित में लगे रहें। उसी का जीवन धन्य है जिसने स्वयं को पर हित में लगा दिया।

गोस्वामी तुलसीदास महाराज की यह अमर चौपाई भी इसी बात का समर्थन करती है।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

श्री वर्चस्व आयुस्व आरोग्य कल्याणमस्तु...

जय श्रीकृष्ण

- आरएन तिवारी







Gyan Ganga: हनुमानजी के बिना प्रभु श्रीराम का दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता

  •  सुखी भारती
  •  जनवरी 14, 2021   18:33
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Gyan Ganga: हनुमानजी के बिना प्रभु श्रीराम का दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता

जब कोई संत मिलते हैं तो आत्मा और परमात्मा का मिलन करवाते हैं। यहाँ हनुमान जी संत की भूमिका में हैं और श्रीराम−सुग्रीव की भूमिका जीव और ब्रह्म की है। अग्नि को साक्षी बनाकर प्रीति दृढ़ करने की जो बात गोस्वामी जी ने लिखी वह अपने गर्भ में गूढ़ रहस्य संजोए हुए है।

विगत अंकों में हमने पढ़ा कि श्री हनुमान जी जीव और ब्रह्म के मिलन को प्रतिक्षण तत्पर हैं और सुग्रीव श्री हनुमान जी पर उनके सामर्थ्य व विवेक पर पूर्ण विश्वास करते हैं। सज्जनों रामायण के अंदर वर्णित यह भिन्न−भिन्न प्रसंग जो हम पढ़ते अथवा सुनते हैं ऐसा नहीं कि ये एक कहानी अथवा उपन्यास के कोई अंश हैं। इन प्रसंगों में घटने वाली निम्न से भी निम्न दिखने वाली कोई घटना सीधे हमारे लिए अध्यात्मिक ऊँचाइयों का श्रेष्ठतम संदेश समेटे होती है। अब यहाँ ही आप देख लीजिए श्री हनुमान जी जब श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता करवाते हैं तो अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता करवाते हैं−

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।

पावक साखी देइ करि जोरी प्रीति दृढाइ।।

अर्थात् श्री हनुमान जी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाकर अग्नि को साक्षी देकर परस्पर दृढ़ करके प्रभु श्रीराम एवं सुग्रीव की प्रीति जोड़ दी। 

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सज्जनों आप चिंतन दृष्टि से अगर देखेंगे तो हनुमान जी ने श्रीराम जी और सुग्रीव का मैत्री संबंध बिल्कुल वैसे ही जोड़ा जैसे सांसारिक तौर पर कोई पंडित दूल्हा−दुल्हन को अग्नि साक्षी करवाकर उनका पति−पत्नी का संबंध जोड़ता है। तो क्या श्री हनुमान जी ने श्रीराम और सुग्रीव को दूल्हा−दुल्हन के प्रपेक्ष्य में लिया? निःसंदेह इसका उत्तर हाँ में है। सांसारिक दृष्टिकोण से भले ही हमें यह हास्यसपद लगे लेकिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण इसे पूर्णतः उचित व न्यायसंगत मानता है। वह यूं कि धर्मिक ग्रंथों में सभी जीव आत्माओं को नारी रूप में ही देखा गया है। और पुरुष केवल ईश्वर को ही गया गया है। जैसे गुरबाणी में भी आता है−

इसु जम महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई।।

और जब कोई संत मिलते हैं तो आत्मा और परमात्मा का मिलन करवाते हैं। यहाँ हनुमान जी संत की भूमिका में हैं और श्रीराम−सुग्रीव की भूमिका जीव और ब्रह्म की है। अग्नि को साक्षी बनाकर प्रीति दृढ़ करने की जो बात गोस्वामी जी ने लिखी वह अपने गर्भ में गूढ़ रहस्य संजोए हुए है। वह यह कि प्रीति तो संसार में किसी न किसी से हो ही जाती है। लेकिन आवश्यक नहीं कि वह प्रीति दृढ़ ही हो। कारण कि जरा-सा स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ तो प्रीति टूट जाती है। लेकिन श्री हनुमान जी का मत तो यही है कि देखो भई सांसारिक प्रीति या संबंध बनाने में और उन्हें आगे सुदृढ़ अथवा विकसित करने हेतु हमारा अवतार ही नहीं हुआ। जीव और ब्रह्म की प्रीति कैसे सुदृढ़ हो हमारा सारा चिंतन, प्रयास व बल इसी के निमित है। अब श्रीराम और सुग्रीव की मैत्री की शुरुआत तो हमने करवा दी लेकिन बीच में यह जलती हुई अग्नि को साक्षी बना दिया। इसके पीछे कुछेक कारण हैं। प्रथम तो यह कि मित्रता के साक्षी के रूप में उसी को रखना चाहिए जो पूर्णतः पावन व पवित्र हो। जो केवल धर्म का पक्ष ले। जैसे अग्नि का धर्म जलाना होता है। अब उसमें पापी तथा पुण्यात्मा जो भी हाथ डालेगा वह उसे समान रूप से जला डालेगी। अग्नि कोई पक्षपात नहीं करती। उसके अंदर न किसी के लिए राग है और न ही द्वेष। संदेश है कि अगर मित्रों में साक्षी ऐसा हो जो पूर्णतः निष्पक्ष हो तो आपकी मित्रता सर्वोत्तम है, श्रेष्ठ है। 

इसके अंदर आध्यात्मिक संदेश यह है कि सुग्रीव जीव है और श्रीराम जी ब्रह्म। दोनों के मिलन पर साधना, त्याग, तपस्या की अग्नि निरंतर प्रज्ज्वलित रहती है। तो जीव ब्रह्म से प्रीति व संबंध निरंतर प्रगाढ़ करता रहता है। योग व समाध की राहि पर नित नई ऊँचाइयों को प्राप्त होता है। श्रीराम−सुग्रीव और अग्नि तो ठीक है लेकिन साथ में श्री हनुमान जी की निरंतर उपस्थिति का क्या तात्पर्य है? वह यह कि भले ही गुरु अथवा संत ने जीव एवं ब्रह्म के बीच एक बार मित्रता की नींव रख दी हो और बीच में साधना की अग्नि भी अनवरत जल रही हो लेकिन तब भी श्री हनुमान जी जैसे गुरु अथवा संत की सदैव, प्रतिक्षण साथ रखना परम आवश्यक है। क्योंकि अभी तो मित्रता का सिर्फ आरंभ ही हुआ है, प्रगाढ़ नहीं हुई। हो सकता है कि दोनों मित्रों में कल को कोई ऐसी घटना भी घट जाये जो दोनों मित्रों के परस्पर प्रेम को समाप्त ही कर दे। तो ऐसी स्थिति में कौन इस संबंध की रक्षा करेगा? कौन दिशा दिखायेगा? तो ऐसे में श्री हनुमान जी जैसे संत ही होते हैं जो विकट परिस्थिति में भी सब कुछ संभाल लेते हैं। और सुग्रीव के प्रसंग में हम आगे देखते भी हैं कि कैसे राज्य प्राप्त करने के पश्चात सुग्रीव अपनी सेवा−कर्त्तव्य को भूल ही जाता है। और सुग्रीव को पुनः मार्ग पर लाने हेतु जब श्रीराम जी श्री लक्ष्मण को भेजते हैं तो श्री हनुमान जी ही थे जो सुग्रीव को समझाकर सारी बिगड़ती परिस्थितियां संभाल लेते हैं। और सुग्रीव पुनः श्रीराम जी की सेवा में उपस्थित व तत्पर हो उठता है।

सांसारिक विवाह साधना के इसी क्रम की तो झांकी है। पंडित संत की भूमिका निभाता है। पति परमात्मा की और पत्नी जीव की भूमिका निभाती है। और बीच में अग्नि सांकेतिक रूप है। त्याग, तपस्या व पावनता का। अर्थात् पति−पत्नी के मध्य अगर त्याग, तपस्या व पावनता का संस्कार विद्यमान है और सदैव किसी साधु का सान्निध्य है तो मानना कि यह बैकुण्ठ की जीती जागती झांकी है।

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श्री हनुमान जी की निरंतर उपस्थिति केवल यहीं नहीं है। आप श्रीराम दरबार की झांकी में दृष्टिपात कीजिए। जिसमें श्रीराम जी के संग श्री सीता जी एवं श्री लक्ष्मण जी का होना तो न्यायसंगत लगता है। क्योंकि परिवारिक सदस्य हैं। लेकिन साथ में सदैव श्री हनुमान जी की उपस्थिति इसी भाव को इंगित करती है कि श्रीराम जी के रूप में ब्रह्म, लक्ष्मण जी के रूप में वैराग्य और श्री सीता जी के रूप में भले ही भक्ति विद्यमान हो लेकिन श्री हनुमान जी के रूप में संत की उपस्थिति के बिना श्री राम दरबार कदापि पूर्ण नहीं होता। 

इसके बाद हमारे सामने हनुमान जी प्रभु श्रीराम एवं सुग्रीव जी की मैत्री के कौन से पक्ष का दर्शन करवाएंगे...जानेंगे अगले अंक में... क्रमशः...

-सुखी भारती







संक्रांति पर गंगासागर का है खास महत्व, गंगा का होता है सागर से मिलन

  •  रमेश सर्राफ धमोरा
  •  जनवरी 14, 2021   10:36
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संक्रांति पर गंगासागर का है खास महत्व, गंगा का होता है सागर से मिलन

गंगासागर में मकर संक्रान्ति से पन्द्रह दिन पहले ही मेला शुरू हो जाता है। मेले में दुनिया के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री, साधु-संत आते हैं और संगम में स्नान कर सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं। मेले की विशालता के कारण लोग इसे मिनी कुंभ मेला भी कहते हैं।

भारत के तीर्थों में गंगासागर एक महातीर्थ हैं। मकर संक्रान्ति पर यहां प्रतिवर्ष बहुत बड़ा मेला लगता है। जिसमें दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु गंगा सागर स्नान के लिए आते हैं। गंगासागर की तीर्थयात्रा सैकड़ों तीर्थयात्राओं के समान मानी जाती है। भारत में सबसे पवित्र गंगा नदी गंगोत्री से निकल कर पश्चिम बंगाल में सागर से मिलती है। गंगा का जहां सागर से मिलन होता है उस स्थान को गंगासागर के नाम से जाना जाता है। इस स्थान को सागरद्वीप के नाम से भी जाना जाता है। 

कुम्भ मेले को छोडकर देश में आयोजित होने वाले तमाम मेलों में गंगासागर का मेला सबसे बड़ा मेला होता है। हिन्दू धर्मग्रन्थों में इसकी चर्चा मोक्षधाम के तौर पर की गई है। जहां मकर संक्रान्ति के मौके पर दुनिया भर से लाखों श्रद्धालु मोक्ष की कामना लेकर आते हैं और सागर-संगम में पुण्य की डुबकी लगाते है। कोरोना के कारण 2021 के मकर संक्रान्ति स्नान के अवसर पर यहां आने वाले लोगों की संख्या पहले की तुलना में कम ही रहेगी।

पहले गंगासागर जाना हर किसी के लिये सम्भव नहीं होता था। तभी कहा जाता था कि सारे तीरथ बार-बार गंगासागर एक बार। हालांकि यह पुराने जमाने की बात है जब यहां सिर्फ जल मार्ग से ही पहुंचा जा सकता था। आधुनिक परिवहन साधनों से अब यहां आना सुगम हो गया है। पश्चिम बंगाल के दक्षिण चौबीस परगना जिले में स्थित इस तीर्थस्थल पर कपिल मुनि का मंदिर बना हुआ हैं। जिन्होंने भगवान राम के पूर्वज और इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के 60 हजार पुत्रों का उद्धार किया था। मान्यता है कि यहां मकर संक्रान्ति पर पुण्य-स्नान करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। 

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गंगासागर में मकर संक्रांति से पन्द्रह दिन पहले ही मेला शुरू हो जाता है। मेले में दुनिया के विभिन्न भागों से तीर्थयात्री, साधु-संत आते हैं और संगम में स्नान कर सूर्यदेव को अर्ध्य देते हैं। मेले की विशालता के कारण लोग इसे मिनी कुंभ मेला भी कहते हैं। मकर संक्रान्ति के दिन यहा सूर्यपूजा के साथ विशेष तौर कपिल मुनि की पूजा की जाती है।

ऐसी मान्यता है कि ऋषि-मुनियों के लिए गृहस्थ आश्रम या पारिवारिक जीवन वर्जित होता है। भगवान विष्णु जी के कहने पर कपिलमुनी के पिता कर्दम ऋषि ने गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। उन्होने विष्णु भगवान से शर्त रखी कि भगवान विष्णु को उनके पुत्र रूप में जन्म लेंना होगा। भगवान विष्णु ने शर्त मान ली फलस्वरुप कपिलमुनी का जन्म हुआ जिन्हें विष्णु का अवतार माना गया। 

आगे चल कर गंगा और सागर के मिलन स्थल पर कपिल मुनि आश्रम बना कर तप करने लगे। इस दौरान राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ आयोजित किया। इस के बाद यज्ञ के अश्वों को स्वतंत्र छोड़ा गया। ऐसी परिपाटी है कि ये जहां से गुजरते हैं वे राज्य अधीनता स्वीकार करते है। अश्व को रोकने वाले राजा को युद्ध करना पड़ता है। राजा सगर ने यज्ञ अश्वों के रक्षा के लिए उनके साथ अपने 60 हजार पुत्रों को भेजा। 

अचानक यज्ञ अश्व गायब हो गया। खोजने पर यज्ञ का अश्व कपिल मुनि के आश्रम में मिला। फलतः सगर पुत्र साधनरत ऋषि से नाराज हो उन्हे अपशब्द कहने लगे। ऋषि ने नाराज हो कर उन्हे शापित करते हुये अपने नेत्रों के तेज से भस्म कर दिया। मुनि के श्राप के कारण उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिल सकी। काफी वर्षों के बाद राजा सगर के पौत्र राजा भागीरथ कपिल मुनि से माफी मांगने पहुंचे। कपिल मुनि राजा भागीरथ के व्यवहार से प्रसन्न हुए। उन्होने कहा कि गंगा जल से ही राजा सगर के 60 हजार मृत पुत्रों का मोक्ष संभव है। राजा भागीरथ ने अपने अथक प्रयास और तप से गंगा को धरती पर उतारा। अपने पुरखों के भस्म स्थान पर गंगा को मकर संक्रान्ति के दिन लाकर उनकी आत्मा को मुक्ति और शांति दिलाई। यही स्थान गंगासागर कहलाया। इसलिए यहां स्नान का इतना महत्व है। 

हिन्दू मान्यता के अनुसार साल की 12 संक्रान्तियों में मकर संक्रान्ति का सबसे महत्व ज्यादा है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य मकर राशिन में आता हैं और इसके साथ देवताओं का दिन शुरु हो जाता है। गंगासागर के संगम पर श्रद्धालु समुद्र को नारियल और यज्ञोपवीत भेंट करते हैं। समुद्र में पूजन एवं पिण्डदान कर पितरों को जल अर्पित करते हैं। गंगासागर में स्नान-दान का महत्व शास्त्रों में विस्तार से बताया गया है। मान्यतानुसार जो युवतियां यहां पर स्नान करती हैं। उन्हें अपनी इच्छानुसार वर तथा युवकों को स्वेच्छित वधु प्राप्त होती है। मेले में आये लोग कपिल मुनि के आश्रम में उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मन्दिर में गंगा देवी, कपिल मुनि तथा भागीरथ की मूर्तियां स्थापित हैं।

सुन्दरवन निकट होने के कारण गंगासागर मेले को कई विषम स्थितियों का सामना करना पड़ता है। तूफान व ऊंची लहरें हर वर्ष मेले में बाधा डालती हैं। इस द्वीप में ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां दलदल, जलमार्ग तथा छोटी छोटी नदियां, नहरें भी है। बहुत पहले इस स्थान पर गंगा जी की धारा सागर में मिलती थी। किंतु अब इसका मुहाना पीछे हट गया है। अब इस द्वीप के पास गंगा की एक बहुत छोटी सी धारा सागर से मिलती है। यह मेला पांच दिन चलता है। इसमें स्नान मुहूर्त तीन दिनों का होता है। यहां अलग से गंगाजी का कोई मंदिर नहीं है। मेले के लिये एक स्थान निश्चित है। कहा जाता है कि यहां स्थित कपिल मुनि का प्राचीन मंदिर सागर की लहरें बहा ले गयी थी। मन्दिर की मूर्ति अब कोलकाता में रहती है और मेले से कुछ सप्ताह पूर्व यहां के पुरोहितों को पूजा अर्चना के लिये मिलती है।

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गंगासागर वास्तव में एक टापू है जो गंगा नदी के मुहाने पर स्थित है। यहां बंगला भाषी आबादी रहती है। यह पूरी तरह से ग्रामीण ईलाका है। यहां आने वाले तीर्थयात्रियों के रहने के लिए यहां पर होटल, आश्रम व धर्मशालायें है। अब पूरे वर्ष लोग यहां लोगों का आवागमन लगा रहता है। कोलकाता से पूरे मार्ग में सडक बनी हुयी है मात्र 8 किलोमीटर पानी में नाव का सफर करना पड़ता है। गंगासागर में मकर संक्रांति के दिन 14 व 15 जनवरी को मुख्य मेला लगता है। जिसमें लाखों लोग स्नान और पूजा करने आते हैं। 

गंगासागर की कायापलट में जुटी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी गंगासागर के लिए मुरिगंगा में ब्रिज का निर्माण करवाने को प्रयासरत है। इस ब्रिज के बनने से श्रद्वालु सडक मार्ग से कचुबेरिया तक आ सकेगें। लोगों को यहां जल मार्ग से नहीं आना पड़ेगा। गंगासागर मेला किसी भी तरह कुम्भ मेले से कम नहीं है। यहां दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं। इस कारण गंगासागर मेले को भी कुंभ मेले जैसा दर्जा मिलना चाहिये। ताकि यहां के विकास के लिये कुम्भ मेले की तरह अलग से बजट उपलब्ध हो। जिससे इस क्षेत्र का समुचित विकास सम्भव हो पाये। 

रमेश सर्राफ धमोरा

स्वतंत्र पत्रकार







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