• Gyan Ganga: समुद्र लांघने की बात सुन कर क्यों निराश हो गये थे सभी वानर?

सुखी भारती Sep 23, 2021 16:31

सम्पाती ने कहा कि हे प्रिय वानरों! आप नहीं जानते। हम गिद्धों की दृष्टि अपार होती है। मैं तो सागर पार आराम से देख पा रहा हूँ, लेकिन तुम ऐसे नहीं देख सकते। वो तो मैं बूढ़ा हो चुका हूँ, अन्यथा मैं अवश्य तुम लोगों की ओर अधिक सहायता करता।

सम्पाती ने जब कहा कि अब मैं श्रीसीता जी का पता ठिकाना ढूंढ़ कर दिखाता हूँ। कारण कि गिद्ध की दृष्टि अपार होती है। हम बहुत दूर का देख लिया करते हैं। यह बात और है कि हम मुर्दा मांस को ही देखने के आदी और चाहने वाले हैं। पर अब हमारी दृष्टि दूर बैठे मुर्दे देखने के लिए नहीं, अपितु भीतर बैठे श्रीराम जी और श्रीसीता जी को देखने के लिए है। और यह कृपा श्रीराम जी की ही है, कि हमारा देखने का दृष्टिकोण बदल गया है। चलो मैं अब वह कार्य करूँ, जिससे कि आप सबका कार्य सफल हो। तब सम्पाती सागर के उस पार अपनी दूर दृष्टि से किसी अनंत की तरफ झांकने लगते हैं। अभी तक तो यही लग रहा था, कि वे केवल खोज ही रहे हैं। वानर भी एक टकाटक सम्पाती की और झांके जा रहे हैं। कि शायद अब या तब, या कब, श्रीसीता जी का पता लग जाने की खबर देते हैं। सम्पाती जी की खोज रही आँखों में अचानक एक चमक-सी उठी। मानो उनको अपने नेत्रों की मंजिल प्राप्त हो गई हो। जी हाँ! सम्पाती ने जो शब्द कहे, वे वाकई समस्त वानरों को सुकून देने के लिए ही बने थे-

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‘गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका।

तहँ रह रावन सहज असंका।।

तहँ असोक उपबन जहँ रहई।

सीता बैठि सोच रत अहई।।’

सम्पाती ने कहा कि मैं माता जी के दर्शन पूर्णतः स्पष्ट रूप से कर पा रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ कि त्रिकूट पर्वत पर लंका नगरी बसी हुई है। यहां स्वभाव से ही निडर रावण रहता है। फिर मैं देख पा रहा हूँ कि वहाँ अशोक नाम का एक उपवन है। जहाँ श्रीसीता जी रहती हैं और इस समय वे गहन सोच में मगन बैठी हैं। सागर के उस पार सम्पाती ऐसे देख रहे हैं, मानों बीस गज की दूरी पर देख रहे हों। वानरों ने भी उस पार देखने का प्रयास किया कि चलो तनिक हम भी दृष्टि घुमा कर देखते हैं। क्या पता हमें भी कुछ दिखाई पड़ जाए? कुछ वानर तो उछल कूद करके भी देखने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन उन्हें क्या दिखना था। जब उन्हें कुछ न दिखता तो वे सम्पाती की और झांकते कि भई सम्पाती देख पा रहा है, लेकिन हम क्यों नहीं। सम्पाती ने भी वानरों की यह उछल कूद देख ली थी। तो सम्पाती ने वानरों को कहा कि-

‘मैं देखउँ तुम्ह नाहीं गीधहि दृष्टि अपार।

बूढ़ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।’

सम्पाती ने कहा कि हे प्रिय वानरों! आप नहीं जानते। हम गिद्धों की दृष्टि अपार होती है। मैं तो सागर पार आराम से देख पा रहा हूँ, लेकिन तुम ऐसे नहीं देख सकते। वो तो मैं बूढ़ा हो चुका हूँ, अन्यथा मैं अवश्य तुम लोगों की ओर अधिक सहायता करता।

सम्पाती ने जो यह शब्द कहे कि मैं आप लोगों की ओर भी सहायता करता, यह शब्द बड़े सुंदर व मार्मिक हैं। मानो सम्पाती संसार को यह संदेश देना चाह रहे हों, कि प्रभु की सेवा करने का मन व संकल्प होना चाहिए। आप कैसे भी सेवा कर सकते हैं। प्रभु की सेवा करने के लिए ऐसा नहीं, कि आप प्रभु के समक्ष पहले ही रोने धोने लग जायें, कि हाय राम! हमारे पास तो पंख ही नहीं। भला हम आपकी सेवा कैसे कर लें। पहले हमें पंख प्रदान करो। हम सक्षम होंगे, तभी तो कुछ कर पायेंगे। वाह! क्या सुंदर भावना है। हमसे अच्छे तो हमें यह गिद्ध श्रेष्ठ प्रतीत हो रहे हैं। जिनकी दृष्टि भी अच्छी है, और सोच भी सात्विक। प्रभु के समक्ष कोई मांग नहीं, कोई नखरा नहीं, कोई शर्त नहीं कि हम सेवा तो प्रभु आपकी करेंगे, लेकिन पहले हमें आप संपूर्ण संसाधन तो प्रदान करें। प्रभु हमारी यह इच्छा भी पूर्ण कर देंगे। लेकिन क्या भरोसा है कि हम तब भी सेवा कार्य में लग सकेंगे अथवा नहीं।

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सुग्रीव को श्रीराम जी ने किष्किंधा नगरी का राज पाट व पत्नी सुख देकर संसाधन ही तो दिए थे। लेकिन क्या सुग्रीव राजपाट व अन्य सुख मिलते ही प्रभु की सेवा में संलग्न हो गए थे? नहीं न? इसलिए सम्पाती अपने जीवन चरित्र से हमें यही सिखाना चाहते हैं, कि प्रभु से अपने अभावों की पूर्ती के लिए न कहें। अपितु जो भी संसाधन आपके पास उपलब्ध हैं, बस उन्हीं को आधार बना आप सेवा में जुट जायें। तात्विक दृष्टि से देखें तो समस्त वानरों के पास भले ही कितना ही बल व सामर्थ्य क्यों न हो। लेकिन अब तक समस्त बल व साधन व्यर्थ सिद्ध हुए। लेकिन सम्पाती के पास मात्र दूर दृष्टि वाले दो नयन थे। और कमाल देखिए! कि जो दो नयन काम कर गए, वह वानरों की करोड़ों की सेना नहीं कर पाई थी। वानरों को सम्पाती ने जब कहा कि तुम लोग सागर के उस पार नहीं देख सकते। लेकिन मैं देख सकता हूँ। तो वानरों ने कहा कि भई हम नहीं देख सकते तो क्या, सागर के इस पार बैठे यूं ही टुकर-टुकर देखते रहेंगे क्या? तो सम्पाती ने क्हा कि न-न! मैंने कब कहा कि सागर के इस पार बैठने से काम चलेगा। तुम वानरों में से जो कोई भी इस सौ योजन का समुद्र लांघेगा और बुद्धिमान होगा, वही श्रीराम का कार्य कर पायेगा-

‘जो नाघइ सत जोजन सागर। 

करइ सो राम काज मति आगर।।’ 

वानरों ने जब यह सुना कि हमसे से जो कोई भी समुद्र लांघेगा, वह माता सीता जी से मिल पायेगा। लेकिन समुद्र लांघना कोई साधारण व साधने योग्य कार्य है क्या? सम्पाती जी ने बस कह दिया कि माता सीता से भेंट करनी है, तो समुद्र लांघना पड़ेगा। भई हम वानर हैं और वानरों की प्रभुता थल पर तो थोड़ी बहुत सिद्ध होती है। लेकिन जल में नहीं। हम भला कोई मच्छलियां हैं, जो तैर कर समुद्र पार कर जायेंगे। सभी वानर एक दूसरे की ओर झांकने लगे। मानो सभी को एक दूसरे से यही उत्तर मिल रहा हो कि भई! यह तो हमारे साथ यही हुआ कि ‘आस्माँ से गिरे और खजूर में अटके’ कितनी मुश्किल से रास्ता दिखता प्रतीत हुआ था। लेकिन वह भी मानों भ्रम-सा ही निकला। कारण कि हम वानर जाति के लिए समुद्र लांघना केवल मुश्किल ही नहीं, अपितु असंभव है। यह सोच सभी वानर निराश हो गए। क्या वानरों को समुद्र लांघने का रास्ता मिल पाता है, अथवा नहीं। जानेंगे अगले अंक में...(क्रमशः)...जय श्रीराम!

-सुखी भारती