बिहार के मतदाताओं का स्पष्ट संदेश- देशहित की राजनीति ही होगी पुरस्कृत

  •  डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र
  •  नवंबर 13, 2020   11:38
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बिहार के मतदाताओं का स्पष्ट संदेश- देशहित की राजनीति ही होगी पुरस्कृत

बिहार में सत्तासीन जेडीयू की सीटों का कम होना और आरजेडी का बढ़त लेना भी इस ओर संकेत करते हैं। कोरोना के संकटकाल में बिहार विधानसभा के पक्ष-विपक्ष की जो भूमिका बिहार की जनता ने देखी और अनुभव की उसी के अनुरूप परिणाम देकर उसने अपनी जागरूकता प्रमाणित की है।

बिहार चुनाव के परिणामों ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि देश की राजनीति राजनेताओं के वोट कबाड़ने वाले हथकंडों से उबरने का प्रयत्न कर रही है। यादव-मुस्लिम समीकरण, दलित-सवर्ण आकलन, दलों के गठजोड़ आदि फार्मूले भविष्य में सफल होने वाले नहीं हैं। जनता जनार्दन की आवश्यकताओं और अपेक्षाओं की अनदेखी करने वालों को भी अब जनसमर्थन मिलना कठिन है। जेडीयू की सीटों का घट जाना इसका प्रमाण है। चुनाव के समय किए जाने वाले लोकलुभावन झूठे वादे भी अब काम आने वाले नहीं हैं। आधारहीन आरोपों-आक्षेपों के प्रायोजित भ्रम दलीय दलदल में धंसे अन्ध समर्थकों से तो तालियां बटोर सकते हैं किंतु जनता के मन में बेईमानों-भ्रष्टों की ईमानदारी के प्रति विश्वास नहीं जगा सकते। प्रचार माध्यमों के प्रसार के कारण अब देश के सामाजिक-राजनीतिक शुभ-अशुभ का संपूर्ण चित्र पटल पर हैं, सहज दृष्टव्य है। जनता से सच छिपाया नहीं जा सकता, उसे बहकाया नहीं जा सकता। ऐसे दुष्प्रयत्न करके केवल अपनी ही छवि बिगाड़ी जा सकती है। कांग्रेस का गिरता ग्राफ इस स्थिति का साक्षी है। बिहार में सत्तासीन जेडीयू की सीटों का कम होना और आरजेडी का बढ़त लेना भी इस ओर संकेत करते हैं। कोरोना के संकटकाल में बिहार विधानसभा के पक्ष-विपक्ष की जो भूमिका बिहार की जनता ने देखी और अनुभव की उसी के अनुरूप परिणाम देकर उसने अपनी जागरूकता प्रमाणित की है। मध्य प्रदेश में भी विधानसभा की 28 सीटों के लिए हुए निर्वाचन में यही तथ्य रेखांकनीय है। समूचे मध्य प्रदेश के संसाधनों का अधिकतम समेटकर छिंदवाड़ा ले जाना, स्थानांतरण उद्योग का नवीनीकरण कर निरंतर पैसा कमाना और अपने-अपने पुत्रों की राजनीतिक ताजपोशी के फेर में पहले से प्रतिष्ठित युवा नेतृत्व को पार्टी छोड़ने की सीमा तक उपेक्षित करना कांग्रेस के तथाकथित दिग्गज नेताओं को भारी पड़ गया।

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भारतीय लोकतंत्र में अब ऐसी स्थितियां निर्मित हुई हैं जिनमें विपक्ष की विजय का द्वार सत्तापक्ष स्वयं खोल रहा है। विपक्ष में बैठे दल जीत नहीं रहे हैं, सरकार के बैठे लोगों का अहंकार, अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार उन्हें हरा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की जीत में यूपीए की घोर असफलता कारण बनी थी और 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेतृत्व वाली गठजोड़ शक्ति नहीं जीती, राज्यों में सत्तासीन भाजपा हारी। राजस्थान में सत्ताधारी दल का अंतर विग्रह, मध्य प्रदेश में अहंकार भरे बयान और छत्तीसगढ़ में जन अपेक्षाओं की उपेक्षा ने विपक्ष को सत्ता सौंपी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी बहुमत से वापसी उसकी देशहितकारी कार्यशैली के कारण हुई। आंतरिक विकास, सीमाओं की सुरक्षा, आतंक पर लगाम और पड़ोसी देशों के साथ यथोचित व्यवहार ने प्रधानमंत्री मोदी को इतना लोकप्रिय बना दिया कि ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारे सिरे से अस्वीकृत हो गए। नोटबंदी के कारण हुए कष्ट को भी जनता ने देशहित में आवश्यक समझकर सहज भाव से सह लिया विपक्षी दलों में प्रमुख कांग्रेसी नेतृत्व वाली यूपीए सर्जिकल स्ट्राइक, पुलवामा, चीनी घुसपैठ, कोरोना वायरस आदि बिंदुओं पर सरकार के विरुद्ध जितना अधिक दुष्प्रचार करती है उतनी ही कमजोर पड़ रही है क्योंकि प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक प्रचार माध्यमों के कारण सरकार की नीतियों-रीतियों का सच जनता के सामने उपस्थित है। अकेले मोदी की लोकप्रियता बिहार में एनडीए को विजयी बना लाई। उससे छिटकने वाली लोजपा 135 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 01 सीट पर सिमट कर रह गई। इससे स्पष्ट है कि भारतीय समाज की समग्रता, एकता और अखंडता को बल प्रदान करने की राजनीतिक दृष्टि ही भविष्य के भारत में स्वीकृत होगी। निजी लाभ-लोभ और सत्ता पर अधिकार करने के लिए जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि के नए विवाद उत्पन्न करके वोट-बैंक बनाने वाली कूटनीतियां धीरे-धीरे हाशिए पर जाती दिख रही हैं।

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राष्ट्रीय-हितों को सर्वोपरि मानकर कठोर निर्णय लेने का साहस दिखाकर भाजपाई नेतृत्व वाली एनडीए देश में निरंतर लोकप्रियता अर्जित कर रही है। यह उसके लिए और देश के लिए शुभ संकेत है फिर भी अभी एनडीए के लिए आत्ममुग्ध होने का समय नहीं है क्योंकि अभी भी राष्ट्रीय-हित के विचार को दरकिनार कर देश की सत्ता का उपभोग निजी स्वार्थों के लिए करने वाली शक्तियां कमजोर नहीं पड़ी हैं। बिहार विधानसभा में नई सरकार के लिए सामने आने वाले पक्ष-विपक्ष के मध्य केवल कुछ सीटों का ही अंतर है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता संतुलन की दृष्टि से तो यह सर्वथा उचित है किंतु सरकार की जनहितकारी योजनाओं में निजी हितों के लिए विपक्ष द्वारा व्यवधान उत्पन्न करने की दृष्टि से चिंतनीय भी है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यदि हमारी लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष अधिक सशक्त होता तो देश को खंडित करने वाली दुरभिलाषाओं की आधार भूमि धारा 370 का विलोपन कभी संभव नहीं हो पाता। अखंड, सशक्त और सुरक्षित भारत के लिए पक्ष-विपक्ष की एकजुटता भी आवश्यक है। इस आवश्यकता को पहचान कर ‘हम सबका साथ और सबका विकास’ के लिए ईमानदारी से सेवाभावी राजनीति करें, सत्तापक्ष देश-कल्याण के लिए नीतियां बनाएं और विपक्ष अपने दलगत हितों के लिए उनका विरोध करना बंद करें। इसी में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का शुभ भविष्य संभव है। यदि राष्ट्रहित में हमारे नेतृत्व ने कठोर निर्णय भी लिए तो देश उनका स्वागत करेगा। भारतीय राजनीति की यथार्थवादी निभ्रांत दृष्टि ही भविष्य के भारत का स्वर्णपथ प्रशस्त करेगी। अब काल्पनिक मान्यताओं और थोथे आदर्शों के लिए उसमें कोई स्थान नहीं है।

-डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र

विभागाध्यक्ष-हिन्दी

शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय 

होशंगाबाद म.प्र.







राहुल गांधी की एक बार फिर अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के लिए पूरी तरह तैयार है कांग्रेस

  •  अजय कुमार
  •  जनवरी 27, 2021   11:54
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राहुल गांधी की एक बार फिर अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के लिए पूरी तरह तैयार है कांग्रेस

कांग्रेस आलाकमान द्वारा भले ही जून में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव कराने की घोषणा की गई है, लेकिन इस पर किसी को विश्वास नहीं है। वैसे भी जून में चुनाव कराने का फैसला गांधी परिवार ने काफी दबाव में लिया है।

2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी एक बार फिर कांग्रेस की कमान संभालने के इच्छुक दिख रहे हैं। हालांकि इस सवाल पर अभी कोई कांग्रेसी सार्वजनिक रूप से अपनी जुबान खोलने को तैयार नहीं है, लेकिन कांग्रेसियों की भाव भंगिमा यही बता रही है कि पार्टी के नये अध्यक्ष की खोज पूरी हो गई है। राहुल गांधी ही कांग्रेस के अगले अध्यक्ष होंगे। यह सच है कि कांग्रेस को 2019 लोकसभा चुनाव में मिली ‘ऐतिहासिक’ हार के बाद तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नैतिकता के आधार पर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था और यहां तक कह दिया था कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा, लेकिन राहुल के इस्तीफे के तुरंत बाद ही सोनिया गांधी ने कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष पद संभाल कर यह साफ संकेत दे दिया कि गांधी परिवार कहता कुछ और करता कुछ और है।

   

उधर, सोनिया के अंतरिम अध्यक्ष बनने के करीब दो वर्ष के बाद भी कांग्रेस को नया गैर गांधी अध्यक्ष नहीं मिल पाया है। बल्कि तब से लेकर आज तक राहुल गांधी ही पर्दे के पीछे से पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। उनकी मर्जी के बिना कांग्रेस में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता है। अब तो राहुल गांधी के सुर भी बदल गए हैं। वह एक बार फिर यू-टर्न लेते हुए पार्टी की बागडोर संभालने को तैयार लग रहे हैं। परंतु इसके लिए वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं। इसीलिए कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव जून में कराए जाने की बात कहकर गांधी परिवार पांच राज्यों के चुनाव से अपना ‘पल्ला’ झाड़ने की कोशिश में लगा है। पांच राज्य जहां चुनाव होने हैं, उसमें पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केन्द्र शासित पुडुचेरी शामिल हैं, वहां कांग्रेस की स्थिति बिल्कुल भी अच्छी नहीं है। कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सहारे अपनी नैया पार लगाने की कोशिश में है। फिर भी कांग्रेस अपनी नाक और साख नहीं बचा पाई तो राहुल गांधी के अध्यक्ष होने के नाते हार का ठीकरा भी उनके सिर ही फूटेगा।

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बहरहाल, कांग्रेस आलाकमान द्वारा भले ही जून में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव कराने की घोषणा की गई है, लेकिन इस पर किसी को विश्वास नहीं है। वैसे भी जून में चुनाव कराने का फैसला गांधी परिवार ने काफी दबाव में लिया है। हकीकत में गांधी परिवार स्वयः चुनाव के लिए तैयार नहीं दिख रहा है कि कामचलाऊ व्यवस्था खत्म हो और पार्टी को नये गैर-गांधी अध्यक्ष के हाथों सौंप दिया जाए। कहा जाता है कि यदि पार्टी के 23 वरिष्ठ नेता बगावती अंदाज में कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव कराये जाने की बात पर अड़ते तो अध्यक्ष के लिए चुनाव की पहल इतनी भी आगे नहीं बढ़ी होती। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि पार्टी नेताओं का एक समूह नेतृत्व के मामले में कामचलाऊ व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है। यह समूह उन नेताओं का विरोध भी कर रहा है, जो संगठन के साथ अध्यक्ष के चुनाव जल्द से जल्द चाह रहे हैं। इसकी झलक कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में देखने को भी मिली थी, जब राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और चुनाव की मांग कर रहे वरिष्ठ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा में तीखी नोंकझोंक हो गई थी। हालात बिगड़ते इससे पहले राहुल गांधी ने दोनों वरिष्ठ नेताओं को समझा-बुझाकर शांत करा दिया।

दरअसल, कांग्रेस का भला हो इसकी चिंता पार्टी के भीतर कम ही नेताओं को दिखाई दे रही है। इसके उलट पार्टी में वह खेमा ज्यादा सशक्त है जो गांधी परिवार की चाटुकारिता में लगा रहता है। ये चाटुकार नेता अपने स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए यथास्थिति कायम रखना चाह रहे हैं, सबसे दुखद यह है कि जो नेता विधायिका का चुनाव तक नहीं जीत पाते हैं, वह गांधी परिवार के ‘तारणहार’ बने हुए हैं। इसकी पुष्टि इससे होती है कि कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल इस तरह के नेता पार्टी हित में कोई फैसला लेने की बजाय सब कुछ सोनिया गांधी पर छोड़ देते हैं। चाटुकार नेताओं को इस बात का अच्छी तरह से अहसास है कि गांधी परिवार की कथनी और करनी में काफी अंतर है। परिवार पार्टी की बागडोर अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाह रहा है। यहां तक कि सोनिया गांधी बेटी प्रियंका वाड्रा पर भी इतना भरोसा नहीं करती हैं कि उन्हें अध्यक्ष का पद सौंप दिया जाए, जबकि प्रियंका को अध्यक्ष बनाये जाने की मांग पार्टी के भीतर लंबे समय से चल रही है। क्या यह संभव है कि सोनिया और राहुल गांधी मन बना लें तो कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव न हो ? गांधी परिवार को भी यथास्थिति रास आ रही है। बस, इंतजार इस बात का है कि कहीं से चुनाव के नतीजे वैसे ही कांग्रेस के पक्ष में आ जाएं जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में आए थे, तब इन चुनावों में जीत का श्रेय राहुल गांधी को देते हुए उनकी कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी कर दी गई थी। इसीलिए कांग्रेस को पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से काफी उम्मीद है।

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अगर कांग्रेस की इच्छानुसार नतीजे नहीं आए तो यह कहना कठिन है कि कांग्रेस अध्क्षय का सवाल कब और कैसे सुलझेगा ? समस्या केवल यह नहीं है कि अध्यक्ष के चुनाव को टाला जा रहा है, बल्कि उन मुद्दों का कहीं कोई समाधान होता नहीं दिखता, जो 23 नेताओं ने अपनी चिट्ठी में उठाए थे। निःसंदेह कांग्रेस के लिए गांधी परिवार मजबूरी भी है और जरूरी भी, लेकिन यह भी सही है कि राजनीतिक दल का संचालन सरकारी विभाग की तरह नहीं किया जा सकता। बेहतर होगा कि गांधी परिवार कांग्रेस की कमजोर होती स्थिति का खुले मन से आकलन करें। अभी तो कांग्रेस को यही नहीं पता है कि उसे किस लाइन पर चलना है और कौन-सी लाइन को नहीं छूना है। कांग्रेस जब तक देशहित में फैसले लेने की जगह मोदी विरोध की आग में झुलसती रहेगी, तब तक कांग्रेस का उद्धार होने वाला नहीं है। लब्बोलुआब यह है राहुल गांधी पार्टी की कमान तो संभालना चाहते हैं, लेकिन मोदी के सामने अपने आप को कमजोर नहीं दिखाना चाहते हैं। उधर, राहुल जैसे ही अध्यक्ष पद संभालते हैं, कांग्रेस को मिली हार का ठीकरा भाजपाई राहुल गांधी के सिर फोड़ना शुरू कर देते हैं। इसीलिए मोदी से सामने से मोर्चा लेने की बजाए राहुल अपना चेहरा छिपा कर उनसे लड़ने को ज्यादा आतुर दिखते हैं।

-अजय कुमार







गुणतंत्र पर आधारित हमारी गणतांत्रिक प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत

  •  राकेश सैन
  •  जनवरी 26, 2021   08:54
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गुणतंत्र पर आधारित हमारी गणतांत्रिक प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत

आज इस गणतंत्र दिवस पर आओ हम इसी प्रजातांत्रिक भावनाओं को और मजबूत कर इनमें नए आयाम स्थापित करने का प्रण लें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी हम पर भी उसी भांति गौरव करें जैसे हम आज अपने महान पूर्वजों पर करते हैं।

देश आज अपने गणतंत्र होने की वर्षगांठ मना रहा है। हमारे संविधान निर्माताओं, नीति निर्धारकों, स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों ने देश के लिए जो सपने देखे उनकी पूर्ति करने का कार्य फलीभूत हुआ था आज के दिन। देश को कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था घोषित किया गया जिसका अर्थ है वह व्यवस्था जो जनता द्वारा चुनी गई, जनता द्वारा ही संचालित और जनसाधारण के कल्याण के लिए चलाई जाए। स्वतंत्रता प्राप्ति के इन सात दशकों से अधिक के कार्यकाल के परिणामों पर दृष्टिपात किया जाए तो कमोबेश यह व्यवस्था न्यूनाधिक सफल होती दिखाई भी दे रही है। इस अवधि में आम आदमी का जीवन स्तर ऊंचा हुआ है, सुख-सुविधा के साधन बढ़े, शिक्षा व रोजगार के अवसर बढ़े, साक्षरता दर में आशातीत सुधार हुआ, जीवन दर में सुधार हुआ, स्वास्थ्यांक सुधरा और कुल मिला कर आम देशवासियों का जीवन स्तर सुधरा है। हमारे लिए यह भी गौरव की बात है कि कल्याणकारी राज्य की अवधारणा चाहे दुनिया के लिए नई हो परंतु इसकी जड़ें हमारी संस्कृति में पहले से ही विद्यमान रही हैं। अतीत का अध्ययन करें तो पाएंगे कि चाहे हमारी राज्य व्यवस्था राजतांत्रिक हो परंतु उसका उद्देश्य गणतांत्रिक और जनकल्याण ही रहा है। राजा को ईश्वर का रूप बताया गया परंतु उसका धर्म प्रजापालन ही माना गया है। आदर्श गणतंत्र की जो व्याख्या जो देवर्षि नारद जी करते हैं वह किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक व गणतंत्र व्यवस्था के लिए आदर्श बन सकती है। धर्मराज युधिष्ठिर के सिंहासनरोहण के दौरान उन्होंने पांडव श्रेष्ठ से ऐसे प्रश्न पूछे जो आज आधुनिक युग में भी कल्याणकारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार बने हुए हैं।

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महाभारत सभा पर्व के 'लोकपाल सभाख्यान पर्व' के अंतर्गत अध्याय 5 के अनुसार राजा के उन सभी दायित्वों का वर्णन है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत राज्याध्यक्षों के वर्तमान युग में भी निर्धारित किये गये हैं। युधिष्ठिर से नारद जी बोले- राजन! क्या तुम्हारा धन तुम्हारे राजकार्यों व निजी कार्यों के लिए पूरा पड़ जाता है ? क्या तुम प्रजा के प्रति अपने पिता-पितामहों द्वारा व्यवहार में लायी हुई धर्मार्थयुक्त उत्तम एवं उदार वृत्ति का व्यवहार करते हो ? क्या तुमने दूसरे राज्यों से होने वाले हमलों व राज्य के अंदर समाज कंटकों (अपराधियों) से निपटने के लिए पर्याप्त सैनिक तैनात कर रखे हैं ? दुश्मन राज्यों पर तुम्हारी नजर है या नहीं ? तुम असमय में ही निद्रा के वशीभूत तो नहीं होते ? तुम्हारे राज्य के किसान-मजदूर आदि श्रमजीवी मनुष्य तुमसे अज्ञात तो नहीं हैं ? क्योंकि महान अभ्युदय या उन्नति में उन सब का स्नेहपूर्ण सहयोग ही कारण है। क्या तुम्हारे सभी दुर्ग धन-धान्य, अस्त्र-शस्त्र, जल, यन्त्र, शिल्पी और धनुर्धर सैनिकों से भरे-पूरे रहते हैं ?

भरत श्रेष्ठ! कठोर दण्ड के द्वारा तुम प्रजाजनों को अत्यन्त उद्वेग में तो नहीं डाल देते ? मन्त्री लोग तुम्हारे नियमों का न्यायपूर्वक पालन करते व करवाते हैं न ? तुम अपने आश्रित कुटुम्ब के लोगों, गुरुजनों, बड़े-बूढ़ों, व्यापारियों, शिल्पियों तथा दीन-दुखियों को धनधान्य देकर उन पर सदा अनुग्रह करते रहते हो न ? तुमने ऐसे लोगों को तो अपने कामों पर नहीं लगा रखा है जो लोभी, चोर, शत्रु अथवा व्यावहारिक अनुभव से शून्य हों ? चोरों, लोभियों, राजकुमारों या राजकुल की स्त्रियों द्वारा अथवा स्वयं तुमसे ही तुम्हारे राष्ट्र को पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है ? क्या तुम्हारे राज्य के किसान संतुष्ट हैं ? जल से भरे हुए बड़े-बड़े तालाब बनवाये गये हैं ? केवल वर्षा के पानी के भरोसे ही तो खेती नहीं होती है ? किसान का अन्न या बीज तो नष्ट नहीं होता ? तुम किसान पर अनुग्रह करके उसे एक रूपया सैकड़े ब्याज पर ऋण देते हो ? राजन! क्या तुम्हारे जनपद के प्रत्येक गाँव में शूरवीर, बुद्धिमान और कार्य कुशल पाँच-पाँच पंच मिल कर सुचारू रूप से जनहित के कार्य करते हुए सबका कल्याण करते हैं ? क्या नगरों की रक्षा के लिये गाँवों को भी नगर के ही समान बुहत-से शूरवीरों द्वारा सुरक्षित कर दिया गया है ? सीमावर्ती गाँवों को भी अन्य गाँवों की भाँति सभी सुविधाएँ दी गई हैं ? तुम स्त्रियों को सुरक्षा देकर संतुष्ट रखते हो न ? तुम दण्डनीय अपराधियों के प्रति यमराज और पूजनीय पुरुषों के प्रति धर्मराज सा बर्ताव करते हो ?

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'लोकपाल सभाख्यान पर्व' में नारद जी द्वारा पूछे गए प्रश्नों में से इन कुछ प्रश्नों को पढ़ कर ही पाठक स्वत: अनुमान लगा सकते हैं कि महर्षि ने युगों पहले ही कल्याणकारी गणतांत्रिक व्यवस्था को युधिष्ठिर के राज्य के रूप में मूर्त रूप प्रदान करने का प्रयास किया और युधिष्ठिर का राज्यकाल साक्षी भी है कि वह किसी भी रूप में रामराज्य से कम नहीं था। नारद जी के इन सिद्धांतों पर आएं तो हर राष्ट्र को सर्वप्रथम तो धन, अन्न व श्रम संपन्न होना चाहिए। इसके लिए राजा को सतत् प्रयास करने चाहिएं। किसानों को ऋण, सिंचाई के लिए जल, बीज, खाद, यंत्र की व्यवस्था करनी चाहिए। व्यापार की वृद्धि के लिए राज्य में चोरों, डाकुओं, ठगों का भय समाप्त करना चाहिए। प्रशासनिक अधिकारियों व राजा को अपने सगे-संबंधियों पर पैनी नजर रखनी चाहिए कि कहीं वह राजकीय शक्तियों का प्रयोग अपने स्वार्थ के लिए तो नहीं कर रहे। आवश्यकता पड़ने पर व्यापारियों का आर्थिक पोषण भी राज्य की जिम्मेवारी है। देश को बाहरी खतरों से सुरक्षित करने के लिए शक्तिशाली सेना का गठन करना चाहिए, दुर्गों को मजबूत करना चाहिए, सीमावर्ती ग्रामों को सर्वसुविधा संपन्न करना चाहिए ताकि यहां रह रहे लोग सुरक्षा पंक्ति के रूप में वहीं टिके रहें। देश के अंदर और बाहर गुप्तचरों का मजबूत जाल होना चाहिए। राज्य निराश्रित लोगों जैसे वृद्धों, बेसहारों, दिव्यांगों, परितक्याओं, विधवाओं के सम्मानपूर्वक जीवन की जिम्मेवारी राज्य को उठानी चाहिए। राजा को दुष्टों व अपराधियों के प्रति यमराज और सज्जनों के प्रति धर्मराज की जिम्मेवारी निभानी चाहिए। इस तरह हम पाएंगे कि गणतांत्रिक व्यवस्था चाहे 26 जनवरी, 1950 में हमारे देश में फलीभूत हुई परंतु यह अतीत में भी हमारे समाज में विद्यमान रही है। आज इस गणतंत्र दिवस पर आओ हम इसी प्रजातांत्रिक भावनाओं को और मजबूत कर इनमें नए आयाम स्थापित करने का प्रण लें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी हम पर भी उसी भांति गौरव करें जैसे हम आज अपने महान पूर्वजों पर करते हैं।

-राकेश सैन







हिन्दू समाज की उदारता का बेजा लाभ उठाने के लिए ही अक्सर होते हैं 'तांडव'

  •  ललित गर्ग
  •  जनवरी 25, 2021   12:29
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हिन्दू समाज की उदारता का बेजा लाभ उठाने के लिए ही अक्सर होते हैं 'तांडव'

भारत विभिन्न धर्मों, जातियों, संस्कृतियों और भाषा-भाषियों का एक विराट इन्द्रधनुषी राष्ट्र है तो इसका कारण हिन्दू समाज की उदारता ही है, उसकी उदारता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि विरल विशेषता है। इसलिये बेजा लाभ उठाने की धृष्टता करने वालों को समझने की जरूरत है।

देश में लगातार हिन्दू धर्म एवं उसके देवताओं का उपहास उडाया जाता रहा है, जबकि दूसरे धर्म एवं उनके देवताओं के साथ ऐसा होने पर उसे लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन करार दिया गया, यह विरोधाभास एवं विडम्बना आखिर हिन्दू समाज कब तक झेले? एक बार फिर वेब सीरीज तांडव में हिंदू देवताओं का उपहास उड़ाया गया है। भले ही उसके निर्देशक एवं टीम ने सार्वजनिक माफी मांग ली है। माफी तो जरूरत थी, क्योंकि करोड़ों भारतीयों की भावनाएं इससे आहत हुई थीं। लेकिन प्रश्न है कि भविष्य में ऐसे किसी के सृजन कर्म से बहुसंख्य लोगों की भावनाएं आहत न होंगी, इसकी क्या गारंटी है। इस माफी के बाद अब विवाद का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। लेकिन एक बड़ा प्रश्न फिर भी खड़ा है कि फिल्मों, धारावाहिकों, वेब धारावाहिकों के दुराग्रह एवं पूर्वाग्रहपूर्ण विचारों एवं फिल्मांकन की अभिव्यक्ति के नियमन पर भी गौर करने की जरूरत है।

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भारत विभिन्न धर्मों, जातियों, संस्कृतियों और भाषा-भाषियों का एक विराट इन्द्रधनुषी राष्ट्र है तो इसका कारण हिन्दू समाज की उदारता ही है, उसकी उदारता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि विरल विशेषता है। इसलिये उसका बेजा लाभ उठाने की धृष्टता करने वालों को समझने की जरूरत है। भारत की सहिष्णु संस्कृति एवं उदार जनविचारधारा वाले लोगों से भी अपेक्षा यही है कि संवाद के जरिए हरेक विवाद सुलझाएं जाएं, ताकि कानून-व्यवस्था के लिए कोई मसला न खड़ा हो, राष्ट्रीयता अक्षुण्ण रहे और समाज के ताने-बाने को नुकसान न पहुंचे। भारत जैसे बहुलवादी देश में तो संवादों की अहमियत और अधिक है। अफसोस की बात यह है कि हमारा जो समाज अब तक अलग-अलग विचारों का संगम रहा है और यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती रही है, उसमें अब अभिव्यक्तियों की स्वतंत्रता एवं

मौलिक अधिकारों के नाम पर जानबूझकर बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने के प्रयास रह-रह कर होते रहते है, जिन्हें किस तरह से जायज माना जाए?

तांडव जैसी फिल्में एवं धारावाहिक बनाने वाले दो और दो चार नहीं बल्कि पांच की गिनती करने वाले होते हैं। दो को जोड़ें तो भी और गुणा करें तो भी चार ही होते हैं, फिर यह पांच कैसे? दो व्यक्ति किन्हीं दो व्यक्तियों से मिलते हैं तब भी चार ही होते हैं, तो यह पांचवां कौन होता है? किसी जमाने में जहां पांच होते थे और पंचों को परमेश्वर कहा जाता था। वे न्याय करते थे, निष्पक्ष होते थे। सही बात कहते थे, सही करते और करवाते थे। उनकी समाज में एक प्रतिष्ठा होती थी, उन्हें आदर और विश्वास भी प्राप्त होता था। अब पांचवां अकेला होता है जो समाज को जोड़ता नहीं, तोड़ता है, अन्याय करता है।

आज जहां भी चार लोग एकत्रित होते हैं तो पांचवां भी उपस्थित रहता है। वह अदृश्य होते हुए भी उपस्थित रहता है। वह चारों को बांटता है। यह पांचवां व्यक्ति नहीं, नीति है, कूटनीति, अवसरवादिता। पांचवां अल्पमत में होता है पर विध्वंस एवं बिखराव का जनक होता है। वह हांकने वाला होता है क्योंकि वह लकड़ी हाथ में उठा लेता है। वह नीचे की कंकरी निकालने वाला होता है क्योंकि वह तोड़ने में विश्वास रखता है। वह पीठ में छुरा मारने वाला होता है क्योंकि गले लगाना उसे आता ही नहीं। हमें इस पांचवें से सावधान रहना होगा, क्योंकि राष्ट्रीय एकता का सबसे बड़ा दुश्मन एवं लोकतंत्र की सबसे बड़ी बाधा है। क्योंकि यह तुष्टीकरण को प्राथमिकता देता है। यह गलत मूल्यों की मुखरता का प्रतीक है। आवश्यकता है ऐसे पांचवें को संरक्षण नहीं मिले। उसे डराओ मत पर उससे डरो भी मत। उससे घृणा मत करो पर दोस्ती भी मत करो। अपने स्थान पर डटे रहो और उसे भी अपना सही स्थान बता दो। ऐसा होगा तभी ‘दो और दो कभी नहीं होंगे पांच’ और सांच पर कभी नहीं आएगी आंच’। तांडव जैसे हिन्दू धर्म-संस्कृति विरोधी षड्यंत्र औंधे मुंह गिरेंगे।

देशभर में तांडव को लेकर विरोध का वातावरण बनने के कारणों एवं कई जगहों से इस मसले पर प्राथमिकी दर्ज कराने की खबरों को देखते हुए इसकी गंभीरता एवं संवेदनशीलता को समझना होगा। उत्तर प्रदेश की पुलिस सिरीज के निर्देशक और लेखक के घर पूछताछ के लिए पहुंची और नहीं मिलने पर नोटिस चिपका दिया। गौरतलब है कि ‘तांडव’ के कुछ दृश्यों को लेकर कुछ संगठनों ने यह आपत्ति जताई कि इससे उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची है। दरअसल, किसी फिल्म के कुछ दृश्यों से आस्था के आहत होने या धार्मिक भावना के चोट पहुंचने का यह कोई नया मामला नहीं है। लेकिन इस बार इस तरह के मौके पर यह सोचने की जरूरत महसूस होती है कि कला माध्यमों में किसी धर्म विशेष के उजालों पर कालिख पोतने की स्वतंत्रता कैसे दी जा सकती है? ऐसे लोग या संगठन जो स्वभाव से ही हिन्दू धर्म की प्रगति को सहन नहीं कर सकते, बिना कारण जो उसकी बदनामी करना चाहते है या एक जीवंत संस्कृति को झुठलाने के उपक्रम करते हैं, वे मात्सर्य भावना एवं राजनीतिक हितों एवं भावनाओं से प्रेरित होकर ऐसे कुकृत्य करते हैं। जिन्हें कला एवं संस्कृति के नाम पर जायज ठहराने की वकालत हर दृष्टिकोण से बुद्धि का दिवालियापन है।

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सदियों से चलने वाला हिन्दू समाज अपनी गरिमामय आभा से आज भी गौरवान्वित है, उसके नायक देवी-देवता भी असंख्य लोगों की आस्था के केन्द्र है। इस गौरवमय परम्परा एवं संस्कृति पर कालिख पोतने एवं उसे धुंधलाने के प्रयास लोकतांत्रिक मर्यादाओं एवं आधारों के नाम पर लगातार होते रहे हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में इस तरह के किसी भी अतिश्योक्तिपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थितियों के विवाद को व्यापक बनते देर नहीं लगती। कौन क्या लिखता है, क्या प्रस्तुति देता है, जीवंत संस्कृति एवं तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, अपने विवेक को गिरवी रखकर या जानबूझकर अधिसंख्य भावनाओं को आहत करने के लिये इस्तेमाल करता है, फिर इससे उत्पन्न विवादों से कमाई की प्रवृत्ति धार्मिक उदारता का फायदा उठाने को उकसाने में लगती है, इस तरह की प्रवृत्ति एवं मानसिकता एक आदर्श लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती है। इससे ईमानदार कलाकारों व कला प्रेमियों का भी अहित होता है। उनकी रचनाधर्मिता भी निशाने पर आ जाती है। यह अच्छी बात है कि तांडव के विवाद में सूचना-प्रसारण मंत्रालय तुरंत हरकत में आ गया और उसने प्रभावी कदम उठाये।

निस्संदेह, अभिव्यक्ति की आजादी एक बड़ा लोकतांत्रिक मूल्य है, और इससे कोई समझौता नहीं किया जा सकता, पर हर आजादी जिम्मेदारियों से पोषित होती है। यह बात कला जगत के लोगों को भी समझनी पड़ेगी और इसके लिये जागरूक भी होना होगा। जागरूकता का अर्थ है आत्म-निरीक्षण करना, अपने आपको तोलना, अपनी कोई खामी या त्रुटि लगे तो उसका परिष्कार करना और जनता को भ्रांत होने से बचाना। भूल से होने वाले खामियों के लिये क्षमा का प्रावधान हो, लेकिन जानबूझकर षड्यंत्रपूर्वक की जाने वाली गलतियों के लिये सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। अन्यथा ऐसे निषेधात्मक कृत्यों से लोकतंत्र कमजोर होता रहेगा, समाज में विद्रोह एवं विवाद के वातावरण को पनपने के अवसर मिलते रहेंगे। आने वाला समय आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी के कारण अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि स्मार्टफोन और इंटरनेट का दायरा जैसे-जैसे बढ़ता जाएगा, ओवर द टॉप मीडिया सर्विसेज यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म की लोकप्रियता भी बढ़ेगी। इसलिए सरकार को इस पर प्रसारित सामग्रियों को लेकर गंभीर होना पड़ेगा। इसी तरह, हरेक सफल लोकतंत्र अपने नागरिकों से भी कुछ अपेक्षाएं रखता है। देश के रचनात्मक माहौल को ऐसे विवादों से कोई नुकसान न पहुंचे, यह सुनिश्चित करना नागरिक समाज की बड़ी जिम्मेदारी है। एक खुले और विमर्शवादी देश-समाज में ही ऐसी संभावनाएं फल-फूल सकती हैं। तांडव से उपजे विद्रोही परिवेश में व्यवस्था एवं समाजगत शांति एवं सौहार्द केवल एक वर्ग की उदारता से संभव नहीं है, उसके जिम्मेदार पक्ष में भी अनुशासन एवं विवेक अपेक्षित है।

-ललित गर्ग

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)







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