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न्यायपालिका को राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा न बनाएं

By लोकेन्द्र सिंह | Publish Date: Apr 23 2018 10:50AM

न्यायपालिका को राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा न बनाएं
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देश में राजनीतिक विरोध का ऐसा माहौल पहले कभी नहीं देखा गया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के बीच अपनी राजनीतिक लड़ाई हारे हुए समस्त विपक्षी दल अब भाजपा और केंद्र सरकार को घेरने के लिए संवैधानिक संस्थाओं को भी निशाना बनाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले में जाँच की माँग को जब सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों एवं उनके समर्थक कथित बुद्धिजीवियों ने जिस प्रकार न्यायपालिका पर अविश्वास जताया है, वह घोर आश्चर्यजनक तो है ही, निंदनीय भी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर अन्य प्रमुख नेताओं ने न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने का प्रयत्न किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं यह माना है कि इस प्रकरण के माध्यम से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर हमला बोला गया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह कथन कांग्रेस नेताओं के वक्तव्यों ने सही साबित कर दिया।

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो यह कह कर एक तरह से सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना ही की है कि अमित शाह का सच देश की जनता जानती है। उनके इस कथन का स्पष्ट संदेश है कि उन्हें सर्वोच्च न्यायालय पर भरोसा नहीं है। यह पहली बार नहीं है, जब कांग्रेस ने सबसे विश्वसनीय संवैधानिक संस्था 'न्यायपालिका' पर अविश्वास जताया है, उसे कठघरे में खड़ा किया है। महात्मा गांधी की हत्या से लेकर हिंदू आतंकवाद और जज लोया के प्रकरण में कांग्रेस का व्यवहार न्यायपालिका की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाने का रहा है। हाल ही में जब एनआईए की अदालत ने मक्का मस्जिद बम धमाके के मामले में असीमानंद सहित सभी आरोपियों को बरी किया, तब भी कांग्रेस के नेताओं के बयान न्यापालिका की विश्वसनीयता और स्वतंत्रता को धक्का पहुंचाने वाले थे।
 
दरअसल, कांग्रेस के इस व्यवहार के लिए उनकी नीयत जिम्मेदार है। उसे सच में यकीन नहीं है। जनता के बीच में लोकतांत्रिक लड़ाई हार रही कांग्रेस अब अपनी राजनीति न्यायपालिका के माध्यम से करना चाहती है। इसलिए जब उसे न्यायालय में भी मुंह की खानी पड़ती है, तो न्यायालय के बाहर कांग्रेस के नेता अपनी भड़ास निकालते हैं। सोहराबुद्दीन एनकाउंटर प्रकरण से जुड़े जज बीएच लोया की कथित संदिग्ध मौत के मामले में जाँच की माँग को ठुकराते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही कहा- 'देखने में आ रहा है कि बिजनेस और राजनीतिक हित साधने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिकाएं दाखिल की जा रहीं हैं। ऐसी जनहित याचिकाओं पर विचार करने में न्यायपालिका का काफी वक्त बर्बाद होता है, जिससे दूसरे मामलों में न्याय देने में देरी होती है। जिन मुद्दों को लेकर बाजार या चुनाव में लड़ाई करनी चाहिए, उन मुद्दों को लेकर सुप्रीम कोर्ट को अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए।'
 
प्रत्येक अवसर पर भाजपा, आरएसएस और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध खड़े रहने वाले वकील इंदिरा जयसिंह, दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण को फटकार लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- 'आप लोगों ने इस केस के बहाने न्यायपालिका पर सीधा हमला करना शुरू कर दिया। यह कहकर कि नागपुर गेस्ट हाउस में जज लोया के साथ ठहरने वाले चार न्यायिक अधिकारियों की बात पर भरोसा न किया जाए, जिन्होंने हार्ट अटैक से मौत की बात कही।' अपनी राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए कांग्रेस ही नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट लेखक एवं बुद्धिजीवी भी संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करने में सबसे आगे खड़े रहते हैं। कहना होगा कि कई मौकों पर कांग्रेस की दिशा भी कम्युनिस्ट ही तय कर रहे हैं, चाहे वह चुनाव आयोग का मामला हो या न्यायपालिका का। सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं और उक्त वकीलों के व्यवहार पर गहरी निराशा व्यक्त की है। न्यायालय का कहना था कि याचिकाकर्ताओं और उनके वकीलों को न्यायपालिका की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए था, लेकिन इन लोगों ने उसको तार-तार कर दिया। 
 
कम्युनिस्ट भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमले करने के लिए मुद्दों की ताक में न केवल बैठे रहते हैं, अपितु खोज और खोद कर भी लाते हैं। जज लोया का प्रकरण भी ऐसा ही उदाहरण है। चूँकि जज लोया सोहराबुद्दीन शेख एनकांउटर मामले की सुनवाई कर रहे थे, इस प्रकरण में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का नाम भी शामिल है, इसलिए कम्युनिस्ट और कांग्रेस नेता इस मुद्दे पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन, हुआ क्या, उनके ही हाथ जल गए।
 
जज लोया प्रकरण की सुनवाई के बाद जाँच की माँग को खारिज करते समय सर्वोच्च न्यायालय ने जिस प्रकार की टिप्पणियाँ की हैं, वह सदैव याद रखी जाएंगी। सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन विषयों पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। जिस समय भारत ही नहीं, अपितु पूरी दुनिया में 'फेक न्यूज' ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है, उस समय में इस मामले को लेकर की गई रिपोर्टिंग को भी न्यायालय ने प्रश्नांकित किया है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि लोया केस जब अदालत के सामने पेश किया गया तो एक पत्रिका और समाचार-पत्र में न्यायपालिका की छवि को खराब करने वाली प्रायोजित रिपोर्ट्स छपी थीं। हम सब जानते हैं कि उस पत्रिका और समाचार-पत्र के साथ ही उनकी रिपोर्ट के आधार पर प्रोपोगंडा को आगे बढ़ाने वाले समाचार चैनल और वेबसाइट किस पक्ष के प्रभाव में काम कर रहे हैं। यह मीडिया ट्रायल का भी उदाहरण बनेगा। जज लोया मामले में जितना भी भ्रम उत्पन्न हुआ है, उसके पीछे मीडिया ट्रायल की भूमिका है। जबकि जज लोया का परिवार भी यह मान चुका है कि उनकी मृत्यु प्राकृतिक थी। परंतु, कुछ लोगों को इस मसले में राजनीतिक स्वार्थ नजर आ रहे थे, इसलिए वह मामले पर अब तक प्रोपोगंडा फैला रहे हैं।
 
बहरहाल, हमारे नेताओं और कथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को समझना चाहिए कि न्यायपालिका में देश के करोड़ों लोगों की आस्था है। उन्हें न्यायपालिका पर भरोसा है। यहाँ उन्हें न्याय की उम्मीद रहती है। यदि हमारे नेता अपनी राजनीतिक और वैचारिक हित साधने के लिए 'न्याय के मंदिर' को भी संदेहास्पद बना देंगे, तो समाज में सबदूर अविश्वास का वातावरण बन जाएगा। अराजकता फैल जाएगी। हर वह व्यक्ति न्यायपालिका पर संदेह करेगा, जिसके पक्ष में निर्णय नहीं आएगा। इसलिए, महानुभावों न्यायपालिका को अपनी राजनीतिक और वैचारिक लड़ाई का अखाड़ा मत बनाओ।
 
-लोकेन्द्र सिंह
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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