शिक्षक बनते ही पढ़ना लिखना कम कर देंगे तो शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा

शिक्षक बनते ही पढ़ना लिखना कम कर देंगे तो शिक्षा का स्तर कैसे सुधरेगा

वास्तविकता यह भी है कि अधिकांश शिक्षक एक बार सीखने−सिखाने के क्षेत्र में आ जाते हैं उसके बाद पढ़ना−लिखना लगभग कम हो जाता है। यही वे स्तर हैं जहां से शिक्षक फिसलने लगते हैं। हर व्यवसाय की अपनी कुछ मांगें होती हैं।

एक हाथ रिक्शा खींचने वाला किस मुश्किल दौर से गुज़र रहा है इसकी समझ इस तरह से बनाई जा सकती है कि वह अपना पेट पालने के लिए कर्ज़ लेकर या किराए पर ई-रिक्शा चलाने का कौशल सीख रहा है। ताकि घर−परिवार चला पाए। ठीक उसी तरह हर पेशे में समय समय पर नई तकनीक और व्यावसायिक दक्षता सीखने की आवश्यकता पड़ती है। यदि कोई व्यवसायी ऐसा नहीं करता तो वह अपने पेशे में पिछड़ जाता है। शिक्षण−प्रशिक्षण भी एक ऐसा पेशा है जो समय समय पर सीखे हुए कौशल को बारंबार मांजने की वकालत करता है। हक़ीकत है कि शिक्षक एक बार एनटीटी, बी.एड करने के बाद अपने औज़ारों को मांजना और धारदार बनाने के प्रति बहुत ज़्यादा सचेत और सक्रिय नज़र नहीं आता। इन तमाम वास्तविकताओं के बावजूद अभी भी ऐसे शिक्षक हैं जो लगातार विभिन्न सेमिनारों, गोष्ठियों, कार्यशालाओं में जाकर अपनी शिक्षण समझ और ज्ञान को पुनर्नवा करते हैं। समस्त भारतवर्ष में वर्ष में दो बार अध्यापक शिक्षण−प्रशिक्षण कार्यशालाओं के मुख्य महाकंभ लगा करते हैं। इसे मई−जून और दिसंबर−जनवरी माह में लगने वाले महाकुंभ के नाम से पुकार सकते हैं। इस महाकुंभ में कई बार आदेशानुसार स्नानार्थी भाग लेते हैं तो कुछ स्वेच्छा से डुबकी लगाया करते हैं। जो स्वेच्छा से आते हैं उन्हें कई बार खाली हाथ लौट जाना पड़ता है उन्हीं कक्षाओं में जहां उनकी कर्मस्थली है। अपनी ओर पूरी कोशिश करते हैं कि वे अपनी कक्षाओं में बदलाव घटा सकें।

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हमने कार्याशालायी शिक्षक−प्रशिक्षण कुंभ की बात की। इन कुंभों में जिस प्रकार से रिसोर्स पर्सन का चयन होता है, विषयों का बंटवारा किया जाता है उसे गहराई से समझने की कोशिश करें तो पाएंगे कि कई बार रिसोर्स पर्सन को एक दिन पूर्व संपर्क किया जाता है कि कल कार्यशाला है आपको सत्र लेना है। एक गंभीर रिसोर्स पर्सन पूछता है और पूछना ही चाहिए कि कल की कार्ययोजना क्या है? क्या उद्देश्य है आदि तो तब महसूस होता है कि किस लचर तरीके से इस महाकुंभ की तैयार की जाती है। दिलचस्प तो यह जानना भी है कि इस महाकुंभ में आने वाले प्रतिभागी आते−जाते, सोते−जगते, अंदर−बाहर करते वक़्त काट दिया करते हैं। उन्हें भी पिछले कई सालों का अनुभव है कि वास्तव में समय 9.30 का है लेकिन 10.30 या 11.00 बजे से पहले शुरू नहीं होगा। शुरू हो भी गया तो रिसोर्स पर्सन अपने निजी अनुभवों की पोटली खोल कर कुछ चूरन बांटेंगे। जिन्हें प्रसाद मिल रहा है वो भी और देने वाला भी जानता है कि इन चूरनों से कक्षा में पढ़ाना और सीखना−सिखाना नहीं हो सकता। लेकिन फिर भी चूरन का वितरण होता है।

पिछले दिनों एक राष्ट्रीय स्तर की दो दिवसीय कार्यशाला 'अध्यापक प्रशिक्षक अध्यापकीय व्यावसायिक दक्षता विकास' पर शिक्षा के विभिन्न सहयोगियों जिसमें शिक्षक, शिक्षक प्रशिक्षक, एनजीओ, सीएसआर आदि शामिल थे। सबने एक से एक नायाब सुझाव और आंकड़ों के पहाड़ खड़े किए। आरोपों−प्रत्यारोपों के दौर से पूरी सभा सन्न थी। शिक्षक, प्राध्यापक सब के सब खामोश और खिन्न थे। सबकी नज़र अंत में शिक्षक पर ही पड़ी। शिक्षक समुदाय बौखला उठे। उनका तर्क था कि सबसे पहले और प्रमुखता से शिक्षक पर सारी कमियों की गठरी डाल दी जाती है। सवाल यह है कि यदि शिक्षक शिक्षण के लिए है तो एसे पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त शिक्षा−साहित्य और रिपोर्ट आदि भी पढ़ने चाहिए ताकि उसकी समझ और ज्ञान अधुनातन रह सके। हालांकि यह सामान्यीकृत वक्तव्य के रूप में लेने की वजह से शिक्षक समुदाय बचाव के पक्ष में खड़ नजर आते हैं।

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वास्तविकता यह भी है कि अधिकांश शिक्षक एक बार सीखने−सिखाने के क्षेत्र में आ जाते हैं उसके बाद पढ़ना−लिखना लगभग कम हो जाता है। यही वे स्तर हैं जहां से शिक्षक फिसलने लगते हैं। हर व्यवसाय की अपनी कुछ मांगें होती हैं जिन्हें यदि जिम्मदारी से न निभाया तो व्यक्ति अपने कर्म व पेशे के साथ न्याय नहीं कर पाता। उक्त विमर्श में विभिन्न क्षेत्रों के अनुभव रखने वाले लोग शामिल थे। उनमें प्रथम, क्राई, एनसीईआरटी और टेक महिन्द्रा फाउंडेशन थे। हर किसी ने अपने अपने खास क्षेत्र के अनुभव साझा किए। टेक महिन्द्रा फाउंडेशन के कौशलेंद्र प्रपन्न ने बताया कि सेवापूर्व शिक्षक प्रशिक्षण किस प्रकार सेवारत् में तब्दील होता है तब किस प्रकार की दुश्वारियां सामने आती हैं। एक बार सेवापूर्व प्रशिक्षण लेकर आए शिक्षक ज्यादा लंबे समय तक कक्षायी चुनौतियों के सामने खड़े नहीं हो पाते। उन्हें बीच-बीच में अपनी औजार मांजने और धार चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इसमें सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान आदि के अंतर्गत वर्ष में दो बार कार्यशालाओं में शिक्षकों को बुलाया जाता है। इन कार्यशालाओं में आने वाले शिक्षक और रिसोर्स पर्सन आदि जिनका जिक्र ऊपर किया गया, बहुत अधिक लाभकारी नहीं मानते। क्योंकि जिस प्रकार से प्रशिक्षण कार्यशालाओं की रूपरेखा तैयार की जाती है उसे कार्यान्वित कराने में कई स्तरों पर अड़चनें आती हैं। इन्हें बिना दूर किए हम सिर्फ और सिर्फ आंकड़ों के पहाड़ तो खड़े कर सकते हैं किन्तु गुणवत्तापूर्ण कार्यशाला की उम्मीद नहीं कर सकते। इस क्षेत्र में टेक महिन्द्रा फाउंडेशन पिछले छह वर्षों से पूर्वी दिल्ली नगर निगम में अंतःसेवाकालीन अध्यापकों के साथ प्रशिक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।

केंद्रीय शिक्षा संस्थान, शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित इस राष्ट्रीय गोष्ठी में देश के विभिन्न शिक्षा−शिक्षण संस्थानों के शिक्षक−प्रशिक्षक एवं शोधार्थी शामिल थे। इन पंक्तियों के लेखक ने साझा किया कि एक अच्छा शिक्षक−प्रशिक्षक कैसे और किन व्यावसायिक दक्षता के आधार पर श्रेष्ठ शिक्षक−प्रशिक्षक आदि बन सकता है। यदि हमारा शिक्षक−प्रशिक्षक कक्षायी व स्कूली परिवेश में बच्चों की गलतियों को स्वीकार करे और उसे गलती के तौर पर रेखांकित करने की बजाए सीखने−सिखाने की प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा के तौर पर स्वीकार करे। दूसरा, एक अच्छा शिक्षक यदि कक्षायी विविधताओं को अस्वीकार करने की बजाए उन्हें स्वीकार कर अपनी शिक्षक विधियों में उन्हें स्थान दे तो वह शिक्षक निश्चित ही श्रेष्ठ शिक्षक−प्रशिक्षक बन सकता है। तीसरी कड़ी है, बच्चों व अन्य अवलोकनकर्ताओं के सुझाव को कमियों के तौर पर न लेकर एक शुभेच्छा के तौर पर स्वीकार कर उन पर अभ्यास कर दूर कर सके तो वह शिक्षक−प्रशिक्षक श्रेष्ठता की ओर बढ़ सकता है। चौथा और प्रमुख अपने और बच्चों की गतिविधियों, कार्यों आदि की रणनीति एवं गति का मूल्यांकन करते हुए आगे और अगले दिन, माह की रणनीति तैयार करे।

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शिक्षक−प्रशिक्षकों की एक बड़ी तदाद ऐसे लोगों की है जिनमें रूचि, उद्देश्य, अभ्यास और उम्मीद आदि की कमी दिखाई देती है। इतना ही नहीं बल्कि कई बार कई अन्य अध्ययनों से मालूम होता है कि शिक्षकों का बड़ा धड़ा अरूचि, उद्देश्यहीनता और नाउम्मीदी में जी रहा है। यदि अस्सी और बीस सिद्धांत की मानें तो अस्सी फीसदी वे लोग हैं जिन्हें शायद किसी और व्यवसाय में होना था, लेकिन किसी दबाव की वजह से शिक्षण में आ गए। महज बीस फीसदी के कंधों पर पूरी शिक्षा की जिम्मदारी खड़ी है। ये वो बीस फीसदी शिक्षक हैं जो कहीं न कहीं से अपनी अंतर प्रेरणा को बचाए रखने में सफल रहते हैं।

-कौशलेंद्र प्रपन्न

(भाषा एवं शिक्षा शास्त्र विशेषज्ञ)