दुनिया के लिए प्रेरक बनता भारत का चुनावी तंत्र

Gyanesh Kumar
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जिस वक्त घरेलू मोर्चे पर भारतीय चुनाव प्रणाली और मशीनरी सवालों के घेरे में है, उसी वक्त भारतीय चुनाव आयोग को इस प्रतिष्ठित संस्था की अगुआई मिली है। घरेलू मोर्चे पर विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग पर कभी वोट चोरी का आरोप लगाया जाता है तो कभी नकारा बताया जाता है।

स्वाधीनता के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को हमने अपनाया, वह हमारी अपनी नहीं, पश्चिम से आयातित है। दिलचस्प है कि आज यही व्यवस्था दुनियाभर में शासन की बेहतर प्रणाली के रूप में स्वीकार्य है। इसकी बुनियाद में इंग्लैंड की सन् 1215 में हुई मैग्नाकार्टा की संधि है। आज का लोकतंत्र इसी संधि से निकले कानूनों और परंपराओं से विकसित हुआ है। जबकि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल में भारतीय दिलों की पारंपरिक लोकतांत्रिक सोच है। दुर्भाग्य से भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली की महत्ता को दुनिया हाल तक स्वीकार करने से हिचकती रही है। ऐसे माहौल में अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक एवं चुनावी सहायता संस्थान की अगुआई भारत को मिलना मामूली बात नहीं है। अंग्रेजी में इस संस्थान को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेटिक एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस यानी आईडीईए के नाम से जाना जाता है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारतीय लोकतंत्र की अहमियत वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य हो रही है।

वैश्विक लोकतांत्रिक परिदृश्य के लिहाज से भारत को मिली अगुआई ऐतिहासिक है। 1995 में 14 देशों द्वारा स्थापित इस संगठन के सदस्य देशों की संख्या अब 37 हो चुकी है। संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान स्थायी पर्यवेक्षक के तौर पर इस संगठन में शामिल हो चुके हैं। करीब आठ अरब जनसंख्या वाली दुनिया के करीब दो अरब बीस करोड़ पंजीकृत मतदाता इसी संगठन के सदस्य देशों के पास हैं। जिसमें भारत की हिस्सेदारी 99 करोड़ 10 लाख से ज्यादा है। आंकड़ों से साफ है कि सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत है। इस लिहाज से देखें तो भारत की अध्यक्षता उसके लिए औपचारिक दायित्व से कहीं ज्यादा वैचारिक नेतृत्व का अवसर हो सकती है। इस संगठन में सदस्य देशों के चुनाव आयोग या चुनाव कराने वाली संस्थाएं ही शामिल होती हैं, लिहाजा  भारतीय चुनाव आयोग इस संस्था का सदस्य है। जाहिर है कि इसी नाते अध्यक्षता भी आयोग के ही पास है। 

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जिस वक्त घरेलू मोर्चे पर भारतीय चुनाव प्रणाली और मशीनरी सवालों के घेरे में है, उसी वक्त भारतीय चुनाव आयोग को इस प्रतिष्ठित संस्था की अगुआई मिली है। घरेलू मोर्चे पर विपक्षी दलों की ओर से चुनाव आयोग पर कभी वोट चोरी का आरोप लगाया जाता है तो कभी नकारा बताया जाता है। ऐसे वातावरण में चुनाव आयोग को आईडीईए की अध्यक्षता मिलना सामान्य बात नहीं, बल्कि भारतीय चुनाव प्रणाली की वैश्विक स्वीकृति और प्रतिष्ठा का प्रतीक है। दुनिया अब तक लोकतंत्र को “पश्चिमी मॉडल” के चश्मे से ही देखती रही है। जबकि इसके मूल में लोकतांत्रिक आत्मा नहीं, बाजार केंद्रित राजनीतिक ढांचा है, जहां व्यक्ति की बजाय संस्थाओं की स्वाधीनता और संसदीय परंपराओं पर जोर है। संचार और सूचना क्रांति एवं आर्थिक बदलावों के चलते आज का मतदाता बेहद जागरूक हो चला है। वह अपनी निजी राय की अहमियत की भी चाहत रखता है। इस वजह से पश्चिमी मॉडल वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सोच बदली है। भारतीय लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था अगर तनकर खड़ी है, तो उसके पीछे इन वैचारिक बदलावो का बड़ा योगदान है। एक अरब की भारी-भरकम मतदाता संख्या वालेभारतीय चुनावी तंत्र में भागीदारी बढ़ना मामूली बात नहीं है। इसे भारतीय चुनावी तंत्र की लचीली किंतु मजबूत व्यवस्था की सफलता के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

भारतीय चुनावी प्रबंधन में बढ़ते नवाचार, डिजिटल चुनावी प्रबंधन पर जोर, दिव्यांग और दूरस्थ मतदाताओं तक बढ़ती पहुँच, के लिए चुनाव आयोग की सोच ज्यादा जिम्मेदार है। चुनावी साक्षरता बढ़ाने को लेकर चुनाव आयोग ने जितने प्रयोग किए हैं, वैसा उदाहरण कहीं और नहीं दिखता। विपक्षी सवालों के बावजूद चुनावों में अगर मतदाता भागीदारी बढ़ी है, तो माना जा सकता है कि चुनाव आयोग के प्रति भरोसा कम नहीं हुआ है। इस लिहाज से देखें तो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहुंच पुस्तकालयों और विमर्श के संस्थागत मंचों की बजाय बूथ और अंतिम व्यक्ति तक बढ़ी है। इस संदर्भ में चुनाव आयोग की अध्यक्षता में 21 से 23 जनवरी के बीच आईडीईए देशों के चुनाव प्रमुखों और अधिकारियों की होने जा रही बैठक बेहद अहम हो जाती है। माना जा रहा है कि आयोग से दुनियाभर के अधिकारी जानना चाहेंगे कि मतदाताओं की भारी संख्या के बावजूद आयोग उन तक कैसे पहुंचता है और चुनाव प्रणाली की पवित्रता कैसे बरकरार है।

चुनावी पवित्रता की नाभि-नाल पारंपरिक लोकतांत्रिक प्रणाली से जुड़ी है। प्राचीन भारत का बज्जि गणतंत्र आधुनिक प्रणाली से कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक और लोकोन्मुखी था। दक्षिण भारत के दसवीं सदी के चोल शासकों ने ग्रामीण शासन व्यवस्था के लिए जो व्यवस्था अपना रखी थी, उसे आधुनिक राजनीति विज्ञानी भी बेहतरीन प्रणाली मान रहे हैं। मैग्नाकार्टा के कुछ साल पहले कर्नाटक में लिंगायत संप्रदाय के संस्थापक संत बसवेश्वर ने जिस अनुभव मंडपम् की स्थापना की थी, उसमें समाज के हर वर्ग के लोग धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते थे और एक परिणति तक पहुंचते थे।  राजनीति शास्त्री इसे आधुनिक संसद का प्रथम स्वरूप मानते हैं। आज हमारी चुनाव प्रणाली मजबूत है तो इसकी एक वजह हमारी यह परंपरा भी है। 

वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक राष्ट्रों के समक्ष चुनौतियां बढ़ी हैं। जिनके लिए भारत का अनुभव प्रेरक हो सकता है। वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र के लिए ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार और साइबर हस्तक्षेप, चुनावी धन में पारदर्शिता की कमी एवं युवाओं की घटती रुचि खतरा बन रही हैं। इसमें जनमत को प्रभावित करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल ने कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। ऐसे माहौल में भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर चुनावी लिहाज से अपने सफल मॉडल आधारित अनुभव से  लोकतांत्रिक राष्ट्रों की चुनाव प्रणाली के लिए प्रेरक हो सकता है। 

भारत को इन देशों की अगुआई इस बात का भी प्रतीक है कि हमारे लोकतंत्र की ताकत सिर्फ चुनाव में नहीं, बल्कि हर वोट को मिली अहमियत से है। इसी वजह से विविधरंगी समाज, भाषा, धर्म और असमानता के बावजूद भारतीय चुनाव प्रणाली शांतिपूर्ण बनी हुई है। साफ है कि विशाल और बहुलवादी समाज भारतीय लोकतंत्र की बाधा नहीं, ताकत है। पश्चिमी और ग्लोबल साउथ देशों की लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों के मद्देनजर भारतीय चुनाव प्रबंधन कहीं ज्यादा उपलब्धि भरा है। अमेरिका और यूरोप में जहां मतदाता भागीदारी लगातार कम हो रही है, वहीं अविश्वास और आपसी सामाजिक टकराव जैसी चुनौतियां भी बढ़ी हैं। इसके बरक्स विविधता के बावजूद हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था समस्या समाधान का शांतिपूर्ण हथियार बनी हुई है। इसमें महिलाओं, दिव्यांगजनों और युवा मतदाताओं के साथ बढ़ी मतदाता भागीदारी ने लोकतांत्रिक जड़ों को गहरा ही किया है। आमजन की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति जारी विश्वास भी इसी का प्रतीक है। आज मौका मिलते ही सरकारें बदलने और दूसरी पार्टी को मौका मिलती है तो इसकी वजह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को लेकर बढ़ती जागरूकता और उसके प्रति अटूट भरोसा है। विविधरंगी, अलग सामाजिक पहचान, जाति, धर्म और भाषा, क्षेत्रीय भिन्नताएं अलग होने के बावजूद अगर भारत में पश्चिम की तरह टकराव नहीं है तो उसकी वजह लोकतांत्रिक और चुनाव प्रक्रिया में अटूट भरोसा ही है। साफ है कि विविध सामाजिक पहचान के साथ सामुदायिक संतुलन और सहअस्तित्व भारतीय लोकतंत्र की स्थिरता की गारंटी बना हुआ है। इसके पीछे चुनाव आयोग की सोच भी है। आज चुनावी नवाचार में भारत अगुआ है। ईवीएम, वीवीपैट, महिलाओं एवं दिव्यांग संचालित एवं थीम आधारित मतदान केंद्र, पोस्टल बैलेट, सूचना एवं प्रोद्योगिकी  आधारित मतदाता सेवाएँ और स्वीप जैसी जागरूकता पहल तेज़ी और व्यापक तरीके से लागू की जा रही हैं। इनके चलते भारत में लोकतंत्र का भविष्य पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक विस्तारित, स्थायीत्व और जनभागीदारी के साथ आगे बढ़ रहा है। इसकी वजह से वैश्विक विमर्श में “भारतीय चुनाव मॉडल“ प्रेरक बन चुका है। दुनिया में लोकतंत्र की दिशा तय करने वाले केंद्र बहुध्रुवीय होते गए हैं। लोकतंत्र का भविष्य उन्हीं देशों में सुरक्षित है, जो विपरीत हालात में भी नागरिक भागीदारी और विश्वास बनाए रखने में सफल हैं। पश्चिमी देशों के साथ भारत, इंडोनेशिया, ब्राज़ील, मेक्सिको, दक्षिण अफ़्रीका और मॉरीशस जैसे देशों में यह प्रवृत्ति तेजी से विकसित हुई है। ऐसे में भारत की सफलता तभी मानी जाएगी, जब उसकी अगुआई में आईडीईए सिर्फ विमर्श का मंच न रहकर, दुनिया में लोकतंत्र को अधिक सहभागी, अधिक समावेशी, अधिक तकनीक-सक्षम और अधिक मानवीय बनाने का मोर्चा बन सके।

-उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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