भारत चीन व्यापार में भयानक असंतुलन को दूर करना समय की माँग

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तरुण विजय । Jun 28, 2019 11:26AM
भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हमारे द्विपक्षीय संबंध बराबरी और भारत हित सुरक्षित करते हुए दृढ़ता के आधार पर नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। गत वर्ष वुहान में अनौपचारिक शिखर वार्ता को दोनों देशों के मध्य एक मील का पत्थर माना जाता है।

गत सप्ताह चीन में विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अकादमियों में मुझे तीन व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया था जिनका मुख्य विषय दोनों देशों के मध्य गतिशील सांस्कृतिक संबंधों पर केंद्रित था। भारत-चीन संबंध महाभारतकालीन हैं, यह तो प्रमाणित है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी चीन के रेशम का जिक्र है। हजार साल पहले चीन के राजगुरु के नाते भारत के बौद्ध भिक्षु कुमारजीव (चीनी भाषा में चोमोलिशु) प्रतिष्ठित किए गए थे। हर भारतीय दिन में अनेक बार जिस दानेदार शक्कर का इस्तेमाल करता है वह चीन से ही आयी थी और इसीलिए उसे हम चीनी कहते हैं। 1962 का अपवाद छोड़ दें, जो चीन के अध्यात्म के विपरीत साम्यवादियों की सत्ता के बाद हुआ तो भारत-चीन आध्यात्मिक संबंध हमेशा अच्छे ही रहे हैं। लेकिन क्या वर्तमान भारत-चीन संबंध उस वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत के परिदृश्य में व्याख्यायित किए जा सकते हैं?

भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हमारे द्विपक्षीय संबंध बराबरी और भारत हित सुरक्षित करते हुए दृढ़ता के आधार पर नये दौर में प्रवेश कर चुके हैं। गत वर्ष वुहान में अनौपचारिक शिखर वार्ता को दोनों देशों के मध्य एक मील का पत्थर माना जाता है। चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग चीन के इतिहास में ऐसे पहले राष्ट्रपति बने जो किसी विशेष विदेशी मेहमान की अगवानी के लिए राष्ट्रीय राजधानी बीजिंग से बाहर किसी नगर में पहुंचे और तीन दिन व्यक्तिगत गर्मजोशी के साथ नरेंद्र मोदी की मेहमाननवाजी की। मसूद अजहर के मामले में भी अंततः चीन को भारत की बात माननी पड़ी तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में उसे आतंकी घोषित करने में भारत को सफलता मिली। पर इसके साथ ही अन्य अनेक विषय रहते हैं जो असहमति के बिंदु हैं जैसे भारत-चीन व्यापार में भयानक असंतुलन। सत्तर प्रतिशत से अधिक व्यापार चीन के पक्ष में है। भारत की दवाएं अभी भी बड़ी मात्रा में चीन के बाजार में प्रवेश नहीं कर पा रही हैं। भारत का पेंस्लिन दवाओं तथा इंजेक्शनों की आपूर्ति करने वाला चीन सबसे बड़ा देश बना जो इन दवाओं के निर्माण के मूल तत्व भेजता है और जो कारखाने में भारत में इनका निर्माण कर रहे थे वे चीन की अतिशय आपूर्ति के दबाव में बंद हो चुके हैं। इस्पात के क्षेत्र में भी चीन भारत से कच्चा माल यानि लौह अयस्क भारी मात्रा में ले रहा है और उसका भारत के स्टील निर्माण पर खराब असर पड़ा है।

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मैं दिल्ली का हाल बताऊं तो यहां की खिलौना दुकानें तथा खिलौना निर्माता या तो सिर्फ चीन का सामान बेच रहे हैं या उनके यहां ताले लग गए हैं। पंचकुइयां रोड़ और कीर्ति नगर की लक्कड़ मंडियां कभी भारतीय कारीगरों, भारतीय लकड़ी और उससे निर्मित सामान का देश का बड़ा बाजार हुआ करती थीं, आज वह सब बंद हो चुका है और जो पहले निर्माण के केंद्र हुआ करते थे वहां अब सिर्फ चीन से आयातित लकड़ी के फर्नीचर तथा अन्य सजावटी सामानों का व्यापार होता है। भारत की वर्तमान सरकार यह स्थिति बदलने के लिए पूरी गंभीरता से काम कर रही है। हर देश को अपने नागरिकों की पूंजी और निर्माण क्षमता की रक्षा का अधिकार है।

चीन में ऐसे साम्यवाद का शासन है जिसके लिए देशभक्ति तथा 'चीन प्रथम' की नीति सर्वोपरि है। भारत के साम्यवादी देशभक्ति को पाप और अपराध मानते हैं तथा उनके लिए विदेश निष्ठा ही राजनीतिक मजहब है। पर चीन में देशभक्ति बहुत पवित्र और सरकार की आधारभूत निष्ठा का प्रतीक है। वे चीन के प्राचीन सम्राटों एवं बौद्ध संतों का सम्मान के साथ अपने साहित्य में उल्लेख करते हैं। भारत से गये बौद्ध भिक्षु जैसे कुमारजीव, समंतभद्र, मातंग और कश्यप वहां के ऐतिहासिक महापुरुष माने जाते हैं। सांस्कृतिक क्रांति के दौरान विध्वंस और तबाही के बाद चीन बौद्ध मत के संरक्षण और प्रसार के लिए विशेष रूचि दिखा रहा है तथा सभी बौद्ध मठों में एक पुस्तकालय और शाकाहारी भोजनालय होता ही है।

अब इस दौर में चीन में भारत को नेहरूवादी और वामपंथी चश्मे से देखने की बजाए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के दर्पण में देखने की प्रवृत्ति बढ़ी है। वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सकारात्मक दृष्टि से एक पुस्तक प्रकाशित करने की भी योजना बनी है।

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इस परिदृश्य में मुझे कुनमिंग (कोलकाता से दो घंटे की उड़ान) की यूनान सोशल साइंस अकादमी और सिचुआन विश्वविद्यालय (चीन का दूसरे क्रमांक का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय) में छात्रों व अध्यापकों के समक्ष भारत-चीन सांस्कृतिक संबंधों पर बोलने का अवसर मिला। कुनमिंग में बीसीआईएम अर्थात् बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार के मध्य गठबंधन और उसके द्वारा आपसी संपर्क मार्गों और अन्य संबंधों को स्पर्श करना था जबकि सिचुआन में विचारधारा का विषय प्रभावी था। वहां के वैचारिक नेताओं में यह जानने की बहुत उत्कंठा थी कि नरेंद्र मोदी की सफलता के पीछे किस विचारधारा का प्रभावी योगदान है। मुझे जानकर  आश्चर्य हुआ कि अभी तक चीन के पुस्तकालयों में इतनी बड़ी मात्रा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का साहित्य पहुंचना चाहिए था वह अभी तक कम ही दिखता है। इसका एक कारण चीन के वैचारिक क्षेत्र में नेहरूवादी और वामपंथी प्रभाव का प्राबल्य ही कहा जा सकता है।

चीन नये भारत की जड़ में जिन विचारधाराओं का योगदान है उसे समझे बिना भारत को समझ नहीं सकता। पूंजीवाद और साम्यवाद के सामने एकात्म मानववाद का दर्शन नवीन भारत की सत्ता नीति का एक आधारभूत हिस्सा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय अर्थात् समाज के अंतिम व्यक्ति के उत्थान को सर्वोच्च वरीयता दी थी और सामाजिक समता और समरसता एकात्म मानव दर्शन का आधार है। चीन के लिए यह समझना बेहत जरूरी है कि भारत पूंजीवाद और साम्यवाद को अस्वीकार करने वाली विचारधारा पर चल रहा है जिसे एकात्म मानवदर्शन कहते हैं और जिसके लिए हिंदू जीवन पद्धति या हिंदुत्व सम्मान और गौरव का विषय है, क्षमा भाव या हीनता का नहीं। चीन के विद्वानों और छात्रों ने मेरे तीनों व्याख्यान ध्यान से सुने तथा दीनदयाल जी और डॉ. मुखर्जी का साहित्य अपने पुस्तकालयों में लाने का आश्वासन दिया, यह संतोष का विषय है।

-तरूण विजय

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