आजादी दिलाने का श्रेय तो कांग्रेस अकेले लेना चाहती है, मगर यह तो बताए कि विभाजन का दोष किसे दें?

Partition Horrors Remembrance Day
Prabhasakshi
भारत को 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिली। हालाँकि, स्वतंत्रता की मिठास के साथ-साथ देश को विभाजन का आघात भी सहना पड़ा था। नए स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र का जन्म विभाजन के हिंसक दर्द के साथ हुआ था जिसने लाखों भारतीयों पर पीड़ा के स्थायी निशान छोड़े।

भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। इस दौरान देश के हर कोने में जश्न का माहौल है। जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां 15 अगस्त 2022 की ओर बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे लोगों का हर्षोल्लास बढ़ता जा रहा है। लेकिन इस खुशी के मौके पर हमें अपने उन देशवासियों की भी याद करनी चाहिए जिन्हें राष्ट्र के विभाजन के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी थी। भारत के विभाजन के समय हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान जो लाखों लोग मारे गये और जिन लाखों लोगों को अपनी जड़ों से विस्थापित होना पड़ा, राष्ट्र उन्हें आज विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाकर श्रद्धांजलि दे रहा है। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल ऐलान किया था कि हर साल 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाया जायेगा। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने की घोषणा के पीछे उद्देश्य यह था कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ी विभाजन के दौरान लोगों द्वारा झेले गए दर्द और पीड़ा को जाने। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस हमें भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को खत्म करने के लिए न केवल प्रेरित कर रहा है बल्कि इससे देश की एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाएं भी मजबूत होंगी।

इन 75 वर्षों के सफर में भारत यकीनन बहुत आगे बढ़ गया है और दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र तथा तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। लेकिन देश के विभाजन के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। अपनी आजादी का जश्न मनाते हुए एक कृतज्ञ राष्ट्र, मातृभूमि के उन बेटे-बेटियों को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर नमन कर रहा है, जिन्हें हिंसा के उन्माद में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी थी। देखा जाये तो आजादी के आंदोलन में हर किसी का योगदान सराहनीय रहा लेकिन सियासी सेनानियों ने कुछ ऐसी गलतियां भी कीं जिसकी बड़ी कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ी थी। इसलिए सवाल उठता है कि जो लोग भारत की आजादी का श्रेय अकेले लेना चाहते हैं वह यह बताएं कि भारत के विभाजन के लिए किसे दोषी ठहराया जाये?

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उल्लेखनीय है कि भारत को 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिली। हालाँकि, स्वतंत्रता की मिठास के साथ-साथ देश को विभाजन का आघात भी सहना पड़ा था। नए स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र का जन्म विभाजन के हिंसक दर्द के साथ हुआ था जिसने लाखों भारतीयों पर पीड़ा के स्थायी निशान छोड़े। देखा जाये तो भारत का विभाजन मानव इतिहास में सबसे बड़े विस्थापनों में से एक है, जिससे लगभग 20 से 25 लाख लोग प्रभावित हुए। लाखों परिवारों को अपने पैतृक गांवों, कस्बों और शहरों को छोड़ना पड़ा था और शरणार्थी के रूप में एक नया व संघर्षमय जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ा था। खास बात यह कि विभाजन के समय भड़के सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए उस वक्त महात्मा गांधी बंगाल के नोआखली में अनशन पर बैठ गए थे और स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी शामिल नहीं हुए थे।

15 अगस्त 1947 की सुबह जहां आजादी लेकर आई थी और सभी के चेहरों पर खुशी थी वहीं यह भी दृश्य देखने को मिल रहे थे कि लोग ट्रेनों, बैलगाड़ियों, घोड़ों या खच्चरों पर बैठकर या फिर पैदल ही सर पर सामान लादे हुए और अपने बच्चों का हाथ पकड़े हुए अपनी मातृभूमि को छोड़कर अलग-अलग बन चुके देश की ओर रवाना हो रहे थे। भारत के विभाजन के समय भड़के सांप्रदायिक दंगों में लोगों की मौत का आंकड़ा 20 लाख तक बताया जाता है। ना जाने उन दंगों में कितने परिवार बिछड़ गये, कितनी महिलाओं को अपनी इज्जत से हाथ धोना पड़ा, कितने लोगों के शरीर के टुकड़े कर दिये गये, कितने लोगों के घर लूट लिये गये या फूंक दिये गये...तत्कालीन सरकार और प्रशासन बस शांति की अपील करता रह गया। तत्कालीन राजनेताओं की यह सबसे बड़ी नाकामी थी कि ना तो वह देश का विभाजन रोक पाये और ना ही कत्लेआम। 

अंग्रेज भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर करने में सफल रहे थे। बहुत से विद्वान मानते हैं कि उस समय कांग्रेस ने सत्ता लोलुपता ना दिखाई होती और अंग्रेजों के आगे घुटने नहीं टेके होते तो ना तो देश का विभाजन होता ना ही लोगों को विस्थापित होना पड़ता। अंग्रेजों ने कांग्रेस की किसी भी कीमत पर सत्ता पाने की आतुरता को भांप लिया था इसलिए योजनाबद्ध तरीके से स्वतंत्रता की घोषणा पहले और विभाजन की घोषणा बाद में की थी। इससे भारत और पाकिस्तान की नयी सरकारों के सर पर एकदम से शांति कायम रखने की जिम्मेदारी आ गयी। जाहिर तौर पर दोनों ही सरकारें शांति व्यवस्था कायम करने के लिए तैयार नहीं थीं। इस वजह से हालात बिगड़ते चले गये। देखते-देखते दंगे भड़कते गये और जब पाकिस्तान से ट्रेनों में भरकर हिंदुओं और सिखों की लाशें आने लगीं तो यहां भी लोग उन्मादी हो गये।

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बहरहाल, आजादी के समय हुए नरसंहार के लिए तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को ही जिम्मेदार कहा जायेगा क्योंकि उसकी अदूरदर्शिता की वजह से कई गलत निर्णय हुए थे। महात्मा गांधी धर्म के आधार पर देश के विभाजन के विरोधी थे इसलिए वह आजादी के जश्न में भी शामिल नहीं हुए थे। यह वह आजादी नहीं थी जिसके लिए महात्मा गांधी ने लड़ाई लड़ी थी। महात्मा गांधी ने शांति और अमन चैन वाली पूर्ण आजादी की मांग की थी लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं की वजह से उन्हें अपने उद्देश्य में आधी-अधूरी ही कामयाबी मिली थी। खैर...आज जब हम आजादी का जश्न मना रहे हैं तो देश के विभाजन और हिंसा का दर्द भी हमें सता रहा है।

- नीरज कुमार दुबे

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