तारिक की BNP नहीं उस पार्टी का अब होगा शासन! जो नहीं चाहती थी की बांग्लादेश अलग मुल्क बने

बड़े प्लेयर्स के रूप में बीएनपी और जमात। बीएनपी के नेता तारिक उस राजनीतिक परिवार से हैं जिसने दशकों दशक बांग्लादेश की राजनीति पर गहरी पकड़ बनाकर रखी है। दूसरी तरफ हैं 67 साल के डॉ. शफीक उर रहमान। इनकी राजनीति बिल्कुल अलग है।
12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में चुनाव हो रहे हैं। 2024 में शेख हसीना के जाने के बाद यह बांग्लादेश में होने वाला पहला चुनाव है। शेख हसीना जैसे आपको पहले भी पता है वहां पे जब हलचल हुई तो उसके बाद उन्हें हिंदुस्तान आना पड़ा। आवामी लीग बांग्लादेश में बैन है। क्योंकि ये कहा गया कि बांग्लादेश का युवा एक नया सिस्टम चाहता था। नया चेहरा चाहता था। लेकिन चुनावी मैदान में दो पुरानी पार्टियां ही अभी दिख रही हैं। बड़े प्लेयर्स के रूप में बीएनपी और जमात। बीएनपी के नेता तारिक उस राजनीतिक परिवार से हैं जिसने दशकों दशक बांग्लादेश की राजनीति पर गहरी पकड़ बनाकर रखी है। दूसरी तरफ हैं 67 साल के डॉ. शफीक उर रहमान। इनकी राजनीति बिल्कुल अलग है। इन्होंने एक भी महिला उम्मीदवार को चुनाव में नहीं उतारा है। बांग्लादेश में आम चुनाव और जनमत संग्रह कई मायनों में ऐतिहासिक और असाधारण माने जा रहे हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है, जब इस पड़ोसी देश की पारंपरिक राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। दो दशकों तक सत्ता में रहीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना देश से बाहर है और उनकी पार्टी अवामी लीग के चुनाव लड़ने पर रोक है। वहीं, बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) की नेता और पूर्व पीएम खालिदा जिया का निधन हो चुका है। इन चुनावों में मौजूद 51 राजनीतिक दलों में मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच है। इन दोनों ही दलों ने कई छोटे-छोटे दलों के साथ चुनावी गठजोड़ किए हैं। जमात-ए-इस्लामी 11 दलों के गठबंधन की अगुआई कर रही है। इसमें छात्र के समर्थन से बनी नैशनल सिटिजन पार्टी भी शामिल है, जो शेख हसीना के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों से निकली है। स्थानीय सर्वे में बीएनपी जीत सकती है। हालांकि जमात को भी काफी लोकप्रिय बताया जा रहा है। 170 मिलियन 17 करोड़ की आबादी वाला ये देश 12 फरवरी को वोट देने वाला है। 300 सीटों पर चुनाव होगा और लगभग 2000 उम्मीदवार इन सीटों पर लड़ रहे हैं। लेकिन मुकाबला काटे का है।
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बीएनपी के अपने दावे
देश की राजधानी ढाका में 9 फरवरी को चुनावी माहौल पूरी पीक पर था अपने शहर में हजारों लोग झंडे लहराते हुए रैलियों में पहुंचे। हर पार्टी जनता के उस आंदोलन को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही थी जिसने कभी शेख हसीना को राजनीति से बाहर किया। 17 साल के इंसाइल के बाद तारीख दिसंबर में देश लौटे हैं। उनके उनकी पार्टी के चुनावी वादे काफी स्ट्रेट हैं। जैसे गरीब परिवारों को पैसे की मदद देना, कोई भी नेता 10 साल से ज्यादा प्रधानमंत्री ना रहे। ऐसी बात करना, विदेशी निवेश लाकर देश की इकॉनमी सुधारना और भ्रष्टाचार पर सख्ती। तारिक रहमान का कहना है कि सिर्फ बीएनपी के ही पास देश चलाने का एक्सपीरियंस है। रैलियों में अपने माता-पिता यानी जिया उर रहमान और खालिदा जिया का जिक्र कई बार किया यह कहते हुए कि दोनों ही देश चला चुके हैं और बाकी पार्टियों के पास ऐसा एक्सपीरियंस तो नहीं है जो बीएनपी के पास है।
जमात से सबसे बड़ा मुकाबला
तारिक रहमान की पार्टी का सबसे बड़ा मुकाबला जमात इस्लामी से है। जमात इस्लामी बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामिस्ट पार्टी है। इसके लीडर हैं शफीक उर रहमान। शफीक उर रहमान एक अलग तरह की राजनीतिक छवि रखते हैं। पेशे से सरकारी वो डॉक्टर रह चुके हैं और 2019 में उस वक्त जमात के चीफ बने थे जब पार्टी पर बैन था। दिसंबर 2022 में उन्हें रात के वक्त आतंकवाद से जुड़े इल्जामों में गिरफ्तार किया गया और 15 महीने बाद जमानत पर रिहा किया गया। इसके बाद मार्च 2025 में जब मोहम्मद यूनुस की अगुवाई में अंतरिम सरकार बन गई तो उस केस से शफीक उर रहमान का नाम हटाया गया। इसके बाद से उनके भाषण और रैलियां लगातार सुर्खियों में रहते हैं। पिछले साल ढाका की एक बड़ी रैली में गर्मी के कारण मंच पर दो बार बेहोश हो गए थे। लेकिन डॉक्टरों की सलाह के बावजूद उठे और उन्होंने अपना भाषण पूरा किया। कहा जब तक अल्लाह मुझे जिंदगी देगा मैं लोगों के लिए लड़ता रहूंगा। अगर जमात सत्ता में आई तो हम हुक्मरान नहीं जनता के सेवक होंगे। कोई मंत्री जमीन या टैक्स फ्री गाड़ी लेकर नहीं चलेगा। ना वसूली होगी ना भ्रष्टाचार। मैं युवाओं से साफ कहना चाहता हूं हम आपके साथ हैं। शेख हसीना के दौर में कई साल तक जमात पर बैन रहा। लेकिन 2024 में आंदोलन के बाद जब हसीना की सरकार गिर गई तो जमात फिर से पॉलिटिक्स में लौट आया। जमात के साथ नेशनल सिटीजन पार्टी है। इसे उन्हीं युवाओं ने बनाया है जिन्होंने हसीना को सत्ता से हटाने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
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बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का किया था विरोध
जमात ने 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम का विरोध किया था। पार्टी के बहुत से नेताओं को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के दौर में मुकदमा चलाने के बाद फांसी की सजा दी गई थी। हसीना के शासन में 2013 में पार्टी पर प्रतिबंध भी लगा कई सालों के बाद अब बाजी पलट गई है। राजनीतिक बदलाव जमात के पक्ष में है। पार्टी ने किसी महिला को उम्मीदवार नहीं बनाया है और देश का प्रगतिशील वर्ग काफी ज्यादा असहज है।
प्रचार में भारत पर कैसा रुख?
पूर्व में खालिदा की अगुआई वाली बीएनपी सरकार से भारत के रिश्ते बहुत सहज नहीं रहे। इस दल की कमान अब उनके बेटे तारिक रहमान के हाथ है, जिन्होंने लौटते ही 'समावेशी बांग्लादेश' का संदेश दिया था। खालिदा के अंतिम संस्कार में भारत से विदेश मंत्री जयशंकर की मौजूदगी से रिश्तों की नई झलक दिखी थी। लेकिन इनके मैनिफेस्टो में 'बांग्लादेश फर्स्ट के साथ पया तीस्ता नदियों के पानी के उचित हिस्से का उल्लेख आक्रामक रुख दिखाता है। वहीं, जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने भारत से संबंधों पर सांकेतिक जवाब दिया, जिसका अर्थ निकाला जा रहा है कि अगर उनका दल सत्ता में आता है, तो भारत के प्रति रुख में नरमी ही होगी।
जनमत संग्रह पर क्यों टिकी हैं निगाहें
संसदीय चुनाव की तरह जनमत संग्रह भी बैलट पेपर से होगा। सवैधानिक सुधारों से जुड़े बीती जुलाई के नैशनल चार्टर पर लोगों को 'हा' या 'ना' में जवाब देना है। अगर जनमत संग्रह पास हुआ तो नवनियुक्त ससद सविधान सभा की तरह काम करेगी और संविधान में बदलाव करेगी। चार्टर के तहत संसद में 100 सदस्यों का उच्च सदन भी बनेगा। पीएम के लिए दो कार्यकाल की सीमा (अधिकतम 10 साल) तय होगी। तटस्थ सरकार के तहत चुनाव कराने, सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया और भ्रष्टाचार विरोधी आयोग का भी प्रस्ताव है। यह सब पहले 270 दिनों में करना होगा।
भारत सभी पक्षों के संपर्क में
अल्पसख्यकों पर हमलों और पाक से बढ़ती नजदीकी के बीच भारत के लिए बाग्लादेश बड़ी चुनौती से कम नहीं है। शेख हसीना के विरोध को भापने में नाकाम रहा भारत अब पहले से ही वहां सभी पक्षों से संपर्क में है। वहां का राजनीतिक नेतृत्व भी समझता है कि सामान्य संबंधों में ही सबका भला है।
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