अर्थव्यवस्था को तेजी से उबारना है तो एमएसएमई क्षेत्र पर सर्वाधिक ध्यान देना होगा

Nirmala Sitharaman
वर्तमान समय में महंगाई सामाजिक क्षेत्र में कुछ विसंगतता और विडंबना पैदा कर रही है, जिसके कारण गरीब एवं आम आदमी कई आर्थिक समस्याओ का सामना कर रहा है। यहां तक कि सामान्य नौकरी करने वाले लोग अपने परिवार का उचित ढंग से पालन नहीं कर पा रहे हैं।

एनडीए की सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विभिन्न अभियानों, कार्यक्रमों और सुधारवादी उपायों के माध्यम से देश की आर्थिक व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, ईज ऑफ डूइंग बिजनस, सिम्पलीफिकेशन ऑफ प्रॉसेस, स्किल इंडिया, स्वच्छ भारत अभियान, इनोवेशन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, वोकल फॉर लोकल जैसे विकासशील कार्यक्रम राष्ट्र के हित में दिए हैं। जिसके कारण भारत की आर्थिक प्रणाली और देश की संपूर्ण जनता के विकास को बढ़ावा मिला है, जो देश के नागरिकों के स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक-आर्थिक विकास के रूप में देखने को मिल रहा है। आज देश का प्रत्येक नागरिक श्रेष्ठ बनने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है। इसी कड़ी में ऑल इण्डिया एमएसएमई फेडरेशन के प्रमुख मगनभाई एच. पटेल ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक कदमों पर गंभीरता से विचार करके भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ प्रश्न और दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं।

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भारत में 6.7 करोड़ से अधिक MSME को चीन निर्मित सामानों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। कई व्यावसायिक तथा उद्योगकारों की जानकारी के अनुसार चीन अपने माल को निर्यात करने के कई तरीके आजमा रहा है जैसे कि:

- माल के अंडर-इनवॉइस के तहत। उदाहरण के लिए, यदि सामान 100 रुपये का है तो बिल केवल 25 से 30 रूपये का बता कर शुल्क में चोरी करना।

- शुल्क से बचने के लिए निर्यात किए गए चाइनीज़ माल को अलग-अलग नामों से वर्गीकृत करके और विदेश में भुगतान किए जाने वाले शुल्क में चोरी करना।

- अंडर-इनवॉइस किए गए माल के भुगतान को चीन में आंगडिया फर्म द्वारा ट्रांसफर किया जाता है। इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचता है।

- जब चीन से इस तरह के माल के प्रत्यक्ष आयात की अनुमति नहीं होती है, तब भारतीय व्यापारी / आयातकार सिंगापुर और ऐसे अन्य बंदरगाहों / देशों के माध्यम से अप्रत्यक्ष आयात करते हैं।

एक अनुमान के अनुसार, चीन के व्यापारियों द्वारा आंगडिया के माध्यम से एक महीने में हजारों करोड़ रुपये का व्यव्हार किया जाता है, जो भारत की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन परिस्थितियों में भारतीय MSME निर्माताओं के लिए चीन से डम्प किए जा रहे तैयार माल का मुकाबला करना बहुत मुश्किल हो जाता है, इसलिए ऐसी वस्तुओं / माल पर सख्त एंटी-डम्पिंग शुल्क लगाया जाना चाहिए। देश में उत्पादन करने वाली एमएसएमई इकाइयां चीन में उत्पादित वस्तुओं से प्रतिस्पर्धा में सक्षम होती नहीं हैं। इस तरह के गैर कानूनी व्यवहार / व्यापार के रोकथाम के लिए वाणिज्य विभाग को सख्त कदम उठाने चाहिए जो अब तक नहीं उठाये गये हैं।

कुछ व्यापारी चीन से माल आयात करते हैं और अवैध प्रकार से चीनी मुद्रा में भुगतान करते हैं। इस प्रकार के अवैध व्यापार और भुगतान को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर उपाय किये जाने चाहिए। सरकार ने चीन से आयात करने के लिए कई दंडात्मक नीतियां बनाई हैं फिर भी देश को आर्थिक नुकसान पहुंचाने के लिए कई लोग अवैध रूप से पिछले दरवाजे से आयात करते हैं।

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कोरोना महामारी में लोकडाउन के बाद आर्थिक गतिविधियां सामान्य हो गई हैं, जबकि देश में विभिन्न कच्चे माल की कीमतों में 25% से 40% तक की बढ़ोतरी हुई है। विशेष रूप से महत्वपूर्ण कच्चे माल जैसे कि आयरन और स्टील, नॉन फेरस मेटल, प्लास्टिक, खनिज और पेट्रोलियम महंगे हो गए हैं। इसका सीधा असर देश के एमएसएमई सेक्टर पर पड़ेगा। देश की MSME पर कम से कम दो महीने का बोझ पड़ेगा और आखिरकार इसका बोझ देश के 125 करोड़ नागरिकों पर पड़ेगा। सरकार इसके दूरगामी प्रभाव की कल्पना के बारे में गंभीर नहीं है अन्यथा इन कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक कदम उठाए गए होते। MSME क्षेत्र वास्तव में एक उत्पादक क्षेत्र है इसलिए सरकार को MSME के अवरोधक कच्चे माल की मूल्य वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए।

वर्तमान समय में महंगाई सामाजिक क्षेत्र में कुछ विसंगतता और विडंबना पैदा कर रही है, जिसके कारण गरीब एवं आम आदमी कई आर्थिक समस्याओ का सामना कर रहा है। यहां तक कि सामान्य नौकरी करने वाले लोग अपने परिवार का उचित ढंग से पालन नहीं कर पा रहे हैं। इस प्रकार मध्यमवर्ग भी महंगाई और आर्थिक समस्याओं से पीड़ित है।

रियल एस्टेट बिल्डरों ने आवासीय फ्लैटों की कीमतों में भी 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। यहां तक कि 1 लाख रुपये का वेतन पाने वाला एक मध्यम वर्ग का आदमी भी 50 लाख रुपये का दो बेडरूम-किचन वाला फ्लैट कैसे खरीद पायेगा ये सोचने वाली बात है। इस तरह एक फ्लैट खरीदने के लिए उसे 40 लाख रुपये का ऋण बैंक से लेना पड़ेगा, जिसका न्यूनतम ब्याज 8% प्रतिवर्ष होता है, अर्थात् जिसका वार्षिक ब्याज 3 लाख 20 हजार रुपये होता है, जो प्रति माह अंदाजन 27,000 रुपये ब्याज और मूल राशि 30,000 रुपये होती है, इस प्रकार मासिक ईएमआई 57,000 रुपये की होती है, तो सवाल यह है कि 1 लाख रुपये वेतन पाने वाला व्यक्ति बच्चों के शिक्षा खर्च में कटौती करने के बाद घर कैसे खरीद सकता है ? देश के केवल 10 प्रतिशत व्यक्ति या परिवार ही ऐसी आय के स्लैब में आते हैं, शेष 90 प्रतिशत परिवार या लोगों को यह सोचना पड़ता है कि इस महंगाई के समय में जीवन निर्वाह कैसे किया जाए। इन परिस्थितियों में देखने को मिल रहा है की लोग ईमानदारी से दूर होते जा रहे हैं। 

भारत में आर्थिक निवेश को आकर्षित करने के लिए सस्ती श्रमिक मजदूरी एक महत्वपूर्ण घटक है, परन्तु इस दृष्टिकोण से हम कुशल श्रमिकों को योग्य मजदूरी नहीं देकर देश की अर्थव्यवस्था के साथ उनको सही ढंग से एकीकृत नहीं कर पाए हैं जिसके कारण देश में उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद नहीं बन रहे हैं। देश की स्वतंत्रता के बाद किसी भी सरकार ने इस अर्थव्यवस्था के बारे में गंभीर रूप से अध्ययन नहीं किया है, अर्थात् 1947 से लेकर आज तक के अर्थशास्त्र के अभ्यास अनुसार श्रमिकों की जीवनशैली और स्तर को ऊंचा उठाने के लिए इसे श्रमशक्ति (लेबरइनपुट) से उचित ढंग से नहीं जोड़ा गया है और श्रम घटक के लिए उचित वेतन या मुआवजा देने का कोई प्रयास नहीं किया गया है, जिसे नीचे बताये गए उदाहरण से समझा जा सकता है-

आज अमेरिका में दूध की कीमत 2.5 डॉलर प्रति गैलन है, इसी तरह पेट्रोल या डीजल की कीमत 2.5 डॉलर प्रति गैलन है। अमेरिका में अकुशल श्रमिक को भी श्रम कानूनों के अनुसार एक घंटा काम करने से 12 डॉलर मिलते हैं। इन विवरणों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि एक अमेरिकी मजदूर या श्रमिक को 2.5 डॉलर कमाने के लिए 15 मिनट काम करना होता है तभी तो वह 1 गैलन दूध या पेट्रोल-डीजल जितना कमा सकता है। इसी तरह भारत में अगर कोई श्रमिक आठ घंटे श्रम करे तो वह 1 गैलन यानि 4 लीटर दूध या 1 गैलन पेट्रोल या डीजल प्राप्त करने जितना कमाता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अमेरिका में 15 मिनट काम करने से जो सुख-सुविधा प्राप्त होती है वो भारत में दो दिन काम करने से प्राप्त होती है। इसका मुख्य कारण अर्थव्यवस्था के भीतर श्रमशक्ति के महत्व और कुशल रोजगार के विकास और अच्छे रिटर्न की गारंटी देने वाली नीतियों की कमी को नजरअंदाज करना है।

इस तरह देश के आर्थिक विकास में कैपिटल फॉर्मेशन (पूंजी निर्माण) के साथ-साथ मानवशक्ति (मेनपावर इनपुट) और मूल्य वृद्धि (वेल्यू एडीशन) को बहुत अधिक महत्व नहीं दिया गया, इसके परिणामस्वरूप जब भारत स्वतंत्र हुआ तब एक डॉलर की विनिमय दर एक रुपये के बराबर थी, जो आज एक डॉलर 75 रुपये के बराबर है। इस प्रकार हम अर्थव्यवस्था को व्यावहारिक दृष्टिकोण से नहीं देखते हैं और कुशल श्रम इनपुट (स्किल्ड लेबर इनपुट) के मूल्य को नहीं समझने के परिणाम भुगत रहे हैं। वर्षों से उत्पादकता (प्रोडक्टिविटी), मानवशक्ति (मेनपावर इनपुट) और अर्थव्यवस्था में मूल्यवृद्धि (वेल्यू एडीशन) को जोड़ने की बजाय विदेशी चीजों की आयात करके देश के उत्पादों का उचित ढंग से रचनात्मक बुनियादी ढांचे को बढ़ावा नहीं दिया गया है। इसलिए मूलभूत सुविधाओं के अभाव से टेक्नोलॉजी, क्वालिटी और वैल्यू एडिशन को उचित ढंग से नहीं जोड़ा गया है। पूर्व की केंद्र सरकारों ने यदि अर्थव्यवस्था का उचित रूप से आयोजन किया होता तो आज भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में प्रथम स्थान पर होती।

कोर सेक्टर (मुख्य क्षेत्र) के उत्पादों को प्राप्त करने के लिए पावर प्लान्ट, स्टील प्लान्ट, फर्टिलाइज़र प्लान्ट, ऑटो क्षेत्र उत्पादन और असेंबली लाइन के हाई-टेक मशीनों जैसे कुल उत्पादों का आयात करके भारतीय अर्थव्यवस्था में रुपयों का अवमूल्यन (डीवेल्युएशन) हुआ है। जिसे स्वदेशी बनाने के लिए मेक इन इंडिया मिशन के तहत आयोजन करने की आवश्यकता है।

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पश्चिम एशिया के मध्य पूर्व के देशों, जहां रेगिस्तानी क्षेत्र स्थित हैं, वे सिर्फ पेट्रोलियम के प्राकृतिक संपदा के आधार पर दुनिया की पहली पंक्ति की अर्थव्यवस्था में हैं। हमारा देश प्राकृतिक संसाधनों में भी गरीब नहीं है। हमारे देश में सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले खनिज उपलब्ध हैं। यदि इनमें से पूर्ण रूप से आयरन और स्टील उत्पाद बनाये जायें तो मशीनरी और इसके घटकों (कम्पोनेन्ट) को 300 रुपये से 400 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर निर्यात किया जा सकता है। इसके विपरीत "आयरन ओर" के एक टन की कीमत को केवल रु. 2800 से 3000 तक लेकर, संतुष्ट होकर निर्यात करने की स्वीकृति दी जाती है। केवल इस्पात उत्पाद में उचित रूप से मूल्य वृद्धि (वेल्युएडिशन) की जाये तो मेटल्स, पेट्रोलियम, मिनरल्स जैसी बहुमूल्य खनिज धातु जो पृथ्वी के भूगर्भ में हैं। इसे मूल्य वृद्धि (वेल्युएडिशन) के रूप में विकसित किया जाये तो भारत आर्थिक व्यवस्था के संचालन में अपने आप प्रथम स्थान पर आ जाएगा।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदी ने गैर-पारंपरिक ऊर्जा को प्राथमिकता देकर गुजरात और देश में सौर ऊर्जा के विकास के लिए कड़ी मेहनत एवं उत्कृष्ट कार्य करके उच्च लक्ष्यांकों को प्राप्त किया है। सौर उर्जा अर्थात् भारत में सूर्य की सबसे अधिक शक्ति हैI यदि ऊर्जा शक्ति का अधिकतम उपयोग किया जाये तो यह स्वचालित रूप से पर्यावरण संरक्षण और पेट्रोलियम उत्पादों की खपत को स्वच्छ ईंधन के रूप में बदल देगा और देश के उत्पादों की लागत को कम करेगा और उत्पादकता और रोजगार बढ़ाएगा। यह भी जरूरी है कि भारत में अधिक से अधिक ऐसी सौर ऊर्जा परियोजनाएं स्थापित की जाएं। हाल ही में गुजरात सरकार ने भी सौर ऊर्जा उत्पादन नीति की घोषणा की है जो वर्ष 2025 तक लागू रहेगी। गुजरात के मुख्यमंत्री विजयभाई रूपानी और उपमुख्यमंत्री नितिनभाई पटेल ने भी इस तरह की बिन परंपरागत ऊर्जा क्षेत्र नीति की घोषणा की है।

हमारे देश के पास दुनिया में सबसे अधिक संसाधन (रिसोर्सिस) हैं तब देश के औद्योगिक विकास को भी उत्पादन क्षेत्र में मूल्यवृद्धि (वेल्यूएडिशन) बनाए रखा जाए और इसके साथ-साथ गुणवत्ता वाले उत्पादन भी हों ये भी जरूरी है। वर्तमान में जो वर्टिकल डेवलपमेंट चल रहा है उस स्थान पर होरिज़ॉन्टल डेवलपमेंट होना जरूरी है। इस स्तर पर भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने "PURA" (Providing Urban Amenities to Rural Areas) के कॉन्सेप्ट द्वारा तमिलनाडु में प्रैक्टिकल रूप से ग्रामीण विकास को सुदृढ़ करने के लिए बुनियादी ढांचे में प्रारंभिक सुधार शुरू किया है। ‘PURA’ की अवधारणा के अनुसार प्रमुख शहरों और अन्य बड़ी परियोजनाओं के आसपास 40 से 50 किमी के दायरे में सड़क-रास्ते, इंटरनेट, बैंकिंग, बिजली आपूर्ति, एमएसएमई, कुटीर उद्योग एवं शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को विकसित करने के लिए योजना बनाये जाने की जरूरत है जिससे शहरों की तरफ नौकरी पाने हेतु आँख बंद करके दौड़ रहे नागरिकों को ग्रामीण (अर्ध-शहरी) क्षेत्रों में रहने और रोजगार पाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे देश में हॉरिजॉन्टल डेवलपमेंट प्रक्रिया को गति मिलेगी जिससे नागरिक वोकल फॉर लोकल की भावना से देश के स्थानीय उत्पादनों का उपयोग करेंगे ऐसा लगता है।

वर्तमान में देश में इंजीनियर, फार्मासिस्ट और स्नातक बनने के बाद किसी को 12,000 रुपये प्रति माह तक का प्रारंभिक वेतन भी नहीं मिलता है, यह एक वास्तविकता है, जो उत्पादन के क्षेत्र के प्रति हमारी उदासीनता या विफलता को दर्शाता है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक दूरदर्शी व्यक्तित्व हैं और उनके नेतृत्व के अंतर्गत एक सक्षम टीम के रूप में सरकार देश को आगे लाने का काम कर रही है तब देश की अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए हो रहे बहुत सारे लोकविकास के प्रयासों को देखते हुए और उससे प्रोत्साहित होकर ऑल इंडिया एमएसएमई फेडरेशन के प्रमुख मगनभाई पटेल का कहना है की जब हमारे पास दुनिया का सबसे श्रेष्ठ कुशल जन-बल उपलब्ध है तो भारत इन्वेन्शन और इनोवेशन में आगे रहकर उत्पादन क्षेत्र को अग्रिमता देकर वर्तमान वैश्विक परीस्थिति के अनुरूप व्यापार और वाणिज्य के पैटर्न को प्राप्त करने, अधिकारों को प्राप्त करने और बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) की रक्षा और जतन करके आर्थिक विकास करेगा, इस उम्मीद के साथ आर्थिक विकास के आयामों में सुधार के लिए सरकारी स्तर पर कुछ प्रश्न और दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं जिससे सरकार के स्तर पर उचित नीति तैयार करने पर विचार किया जा सके।

-मगनभाई एच. पटेल

प्रमुख (ऑल इंडिया एमएसएमइ फेडरेशन)

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