किसानों ने भंडार भर दिये तभी महामारी में खाद्यान्न की कालाबाजारी नहीं हुई

किसानों ने भंडार भर दिये तभी महामारी में खाद्यान्न की कालाबाजारी नहीं हुई

आज आवश्यकता डॉ. महेन्द्र मधुप जैसी जुनूनी लोगों की है जो प्रगतिशील किसानों को पहचान दिलाने में जुटे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोरोना जैसी महामारी के दौर में जब कुछ थम के रह गया है तब सबसे बड़ा सहारा खेती किसानी ही रही है।

पिछले दिनों वर्चुअल प्लेटफार्म पर प्रगतिशील किसानों और यूके के काश्तकारों के बीच अनुभवों को साझा करने की पहल इस महामारी के दौर में निश्चित रूप से सुखद संदेश है। यह पहल किसानों को पहचान दिलाने के लिए संघर्षरत मिशन फार्मर के डॉ. महेन्द्र मधुप के प्रयासों से संभव हो पाई। राजस्थान एसोसिएशन यूके लंदन द्वारा आयोजित यह वेबिनार इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि कोरोना महामारी के दौर में आज खेती किसानी ही अर्थव्यवस्था को संभाले हुए हैं। जब सब कुछ ठप्प है तब देश दुनिया के सामने खेती किसानी ही बड़ा सहारा बनी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले समय में भी खेती किसानी ही बड़ा सहारा बनने वाली है। कोरोना के कारण दुनिया में जो हालात चल रहे हैं उन्हें देखते हुए उद्योग धंधों के पटरी पर आने में अभी लंबा समय लगेगा, ऐसे में अर्थ व्यवस्था को खेती किसानी ही सहारा दे पाएगी और अर्थव्यवस्था ही क्यों लोगों को दो जून की रोटी इस खेती किसानी के कारण ही मिल पा रही है नहीं तो हवा, पानी और दवाओं तक का अभाव सामने है।

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आज इतना सब कुछ होने के बाद भी दुनिया के देशों में कहीं पर भी किसी के भूखे सोने का समाचार नहीं आया। मजे की बात यह कि खाद्यान्नों व खाद्यान्न सामग्री को लेकर कृत्रिम अभाव या कालाबाजारी का समाचार भी सुनने को लगभग नहीं मिला। यह सब हमारे किसानों-अन्नदाताओं की मेहनत का परिणाम है। ऐसे में खेती किसानी की दशा और दिशा को लेकर जो चंद लोग जुटे हुए हैं उन्हें प्रोत्साहित किया जाना जरूरी हो जाता है। वैसे आज देखा जाए तो किसानों को लेकर ही राजनीति सबसे ज्यादा हो रही है पर किसानों को जिससे वास्तव में लाभ हो उस तरह का सार्थक प्रयास किए जाने की जरूरत बरकरार है। हम किसानों के हाथ में ऋण माफी का झुनझुना तो देने को तैयार हैं पर जो वास्तविक प्रयास होने चाहिए उससे अभी भी कोसों दूर है। कुछ जागरूक किसानों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश किसान खेती किसानी में कुछ नया करने या जोखिम लेने को तैयार ही नहीं हैं। यही कारण है कि खेती के क्षेत्र में नवाचारों को प्रोत्साहन उतना नहीं मिल पा रहा जितना मिलना चाहिए। एक और जोत छोटी होती जा रही है तो दूसरी और बढ़ती कृषि लागत के चलते खेती घाटे का सौदा होती जा रही है। नई पीढ़ी का खेती से मोहभंग होता जा रहा है। वहीं कुछ गूदड़ी के लाल नवाचारी किसानों की मेहनत और नवाचारों का परिणाम है कि खेती में भी कुछ नया हो रहा है।

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ऐसे में राजस्थान एसोसिएशन यूके लंदन द्वारा आयोजित वेबिनार महत्वपूर्ण हो जाता है। इसके माध्यम से खेती किसानी को लेकर एक दूसरे के अनुभवों को साझा करते किसानों को देखकर इस महामारी के दौर में सुखद हवा के झोंके से कमतर नहीं आंका जा सकता। इस वेबिनार की सबसे खास बात यह है कि इससे कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ ही प्रगतिशील किसानों को भी अपने अनुभव व सुझाव साझा करने का अवसर मिला। खास बात यह रही कि सबने एक स्वर में खेत का पानी खेत में का संदेश देते हुए कम से कम पानी से अधिक से अधिक पैदावार लेने के अनुभव साझा किए। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और हानिकारक कीटनाशियों के दुष्प्रभाव के दौर में सभी ने एक स्वर में जैविक खेती पर जोर दिया। खेती की परंपरागत तकनीक को अपनाने पर बल दिया। वैज्ञानिक किसान पद्मश्री जगदीश पारीक ने बिना रसायनों के प्रयोग के छह फीट लंबी लौकी, 11 किलो के गोभी के फूल आदि फसल लेने के गुर बताए। जैविक खेती के माध्यम से कम पानी से इतनी अच्छी बागवानी फसल लेने के अनुभव को साझा किया। इसी तरह से किसान विज्ञानी मोटाराम ने मशरूम की विभिन्न प्रजातियों और उनके कैंसर तक के ईलाज में उपयोगी होना बताया। उदयपुर कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. नरेन्द्र सिंह राठौड़, वेटेनरी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विष्णु शर्मा ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए स्कूल शिक्षा में कृषि-बागवानी को स्थान देने पर जोर दिया। वैज्ञानिक किसान सूंडा राम यादव ने एक लीटर पानी से खेती की तकनीक की जानकारी दी। राजस्थान एसोसिएशन यूके के दिलीप पुंगलिया ने यूके की कृषि गतिविधियों की जानकारी दी।

सवाल यह नहीं है कि वेबिनार में किसने हिस्सा लिया व क्या चर्चा रही। अपितु आज विचारणीय यह है कि खेती किसानी किस तरह से लाभकारी हो। चंद किसानों के लिए नहीं अपितु आम किसानों के लिए खेती लाभ का सौदा बने। आज भी चर्चा किसानों के कर्जमाफी की होती है, उर्वरक सब्सिडी की बात होती है, मण्डियों में बिकवाली की होती है, खाद-बीज पर अनुदान की होती है। पर यदि किसान को अपनी उपज का मूल्य प्राप्त करने का हक मिल जाए तो उसका भला हो सकता है। एक किसान ही है जो अपनी मेहनत से उपज निपजाता है और बिचैलिये उसकी मेहनत का पूरा मूल्य मिलने ही नहीं देते। किसानों के नाम पर धरना प्रदर्शन या बयानबाजी हो सकती है। आज आवश्यकता देश के कोने-कोने में अपने स्तर पर नवाचार कर रहे किसानों को प्लेटफार्म उपलब्ध कराने की जरूरत है तो दूसरी और इन नवाचारी किसानों के खेत को ही प्रयोगशाला बनाकर प्रोत्साहित किया जाना होगा। ऋण माफी की राशि का उपयोग किसानों को उन्नत बीज उपलब्ध कराने में होना चाहिए तो अनुदान की राशि का उपयोग आधारभूत संरक्षणा तैयार करने में होना चाहिए। किसानों को उनकी मेहनत का पूरा पैसा दिलाने में होना चाहिए। आवश्यकता डॉ. महेन्द्र मधुप जैसी जुनूनी की भी है जो प्रगतिशील किसानों को पहचान दिलाने में जुटे हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि कोरोना जैसी महामारी के दौर में जब कुछ थम के रह गया है तब सबसे बड़ा सहारा खेती किसानी ही रही है। हालांकि कोरोना की दूसरी लहर जिस तरह से गांवों में पांव पसारने में सफल रही है वह अपने आप में चिंतनीय है। ऐसे में एक और गांवों को कोरोना लहर से बचाना है तो दूसरी और खेती किसानी को नई दिशा भी देना बड़ी चुनौती है।

-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा