लोगों में विश्वास जगाने के लिए पहले नेता कोरोना का टीका लगवाएँ

  •  डॉ. वेदप्रताप वैदिक
  •  जनवरी 13, 2021   15:22
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लोगों में विश्वास जगाने के लिए पहले नेता कोरोना का टीका लगवाएँ

यह ठीक है कि अमेरिका और ब्रिटेन में टीके को स्वीकृति तभी मिली है जबकि उसके पूरे परीक्षण हो गए हैं लेकिन हम यह न भूलें कि इन देशों में भारत के मुकाबले कोरोना कई गुना ज्यादा फैला है जबकि उनकी स्वास्थ्य-सेवाएं हमसे कहीं बेहतर हैं।

कोरोना का टीका देश के लोगों को कैसे सुलभ करवाया जाएगा, इसके लिए केंद्र का स्वास्थ्य मंत्रालय पूरा इंतजाम कर रहा है लेकिन टीके के बारे में तरह-तरह के विचार भी सामने आ रहे हैं। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में बने इस टीके का वैसा ही कठिन परीक्षण नहीं हुआ है, जैसा कि कुछ पश्चिमी देशों के टीकों का हुआ है। इसीलिए करोड़ों लोगों को यह टीका आनन-फानन क्यों लगवाया जा रहा है ? भोपाल में एक ऐसे व्यक्ति की मौत को भी इस तर्क का आधार बनाया जा रहा है, जिसे परीक्षण-टीका दिया गया था। संबंधित अस्पताल ने स्पष्टीकरण दिया है कि उस रोगी की मौत का कारण यह टीका नहीं, कुछ अन्य रोग हैं।

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कुछ असहमत वैज्ञानिकों का यह मानना भी है कि अभी तक यह ही प्रमाणित नहीं हुआ है कि किसी को कोरोना रोग हुआ है या नहीं ? उसकी जांच पर भी भ्रम बना हुआ है। किस रोगी को कितनी दवा दी जाए आदि सवालों का भी ठोस जवाब उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में 30 करोड़ लोगों को टीका देने की बात खतरे से खाली नहीं है। इसके अलावा पिछले कुछ हफ्तों से कोरोना का प्रकोप काफी कम हो गया है। ऐसे में सरकार को इतनी जल्दी क्या पड़ी थी कि उसने इस टीके के लिए युद्ध-जैसा अभियान चलाने की घोषणा कर दी है ? कुछ विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार यह टीका-अभियान इसलिए चला रही है कि देश की गिरती हुई अर्थ-व्यवस्था और किसान-आंदोलन से देशवासियों का ध्यान हटाना चाहती है। विपक्षी नेता ऐसा आरोप न लगाएं तो फिर वे विपक्षी कैसे कहलाएंगे लेकिन टीके की प्रामाणिकता के बारे में हमारे वैज्ञानिकों पर हमें भरोसा जरूर करना चाहिए।

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रूस और चीन जैसे देशों में हमसे पहले ही टीकाकरण शुरू हो गया है। यह ठीक है कि अमेरिका और ब्रिटेन में टीके को स्वीकृति तभी मिली है जबकि उसके पूरे परीक्षण हो गए हैं लेकिन हम यह न भूलें कि इन देशों में भारत के मुकाबले कोरोना कई गुना ज्यादा फैला है जबकि उनकी स्वास्थ्य-सेवाएं हमसे कहीं बेहतर हैं। हमारे यहां कोरोना उतार पर तो है ही, इसके अलावा हमारे आयुर्वेदिक और हकीमी काढ़े भी बड़े चमत्कारी हैं। इसीलिए डरने की जरूरत नहीं है। यदि टीके के कुछ गलत परिणाम दिखेंगे तो उसे तुरंत रोक दिया जाएगा लेकिन लोगों का डर दूर हो, उसके लिए क्या यह उचित नहीं होगा कि 16 जनवरी को सबसे पहला टीका हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री आगे होकर लगवाएं। जब अमेरिका के बाइडन, ब्रिटेन की महारानी और पोप भी तैयार हैं तो हमारे नेता भी पीछे क्यों रहें ?

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक







नए दशक में भारतीय क्रिकेट का भविष्य क्या है ?

  •  दीपक कुमार मिश्रा
  •  जनवरी 22, 2021   11:16
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नए दशक में भारतीय क्रिकेट का भविष्य क्या है ?

रिषभ पंत पर हमेशा से ही उनके गैरजिम्मेदाराना तरीकों से खेलने को लेकर सवाल उठते रहते थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भी उन्हें पहले टेस्ट में मौका नहीं दिया गया। लेकिन उसके बाद उन्हें साहा के नाकाम होने पर दूसरे टेस्ट में मौका दिया गया।

ऑस्ट्रेलिया में टीम इंडिया ने टेस्ट सीरीज 2-1 से जीतकर इतिहास रच दिया है। यह एक ऐसा कारनामा है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा। शायद भारतीय क्रिकेट इतिहास की सबसे यादगार जीत का नाम लिया जाएगा तो इस सीरीज जीत का नाम सबसे उपर होगा। यह सीरीज जीत इसलिए खास है क्योंकि इसे मुख्य खिलाड़ियों के बिना जीता गया। इस सीरीज जीत में विराट कोहली या फिर मोहम्मद शमी जैसे सीनियर खिलाड़ियों का योगदान नहीं था। यहां टीम इंडिया को जीत युवा खिलाड़ियों ने दिलाई। इस सीरीज जीत में भारत को कई युवा सितारें मिले जो आगे चलकर भारतीय क्रिकेट का नाम रोशन करने वाले है। इन नामों में शुभमन गिल, रिषभ पंत, मोहम्मद सिराज, टी.नटराजन और वाशिंगटन सुंदर जैसे खिलाड़ियों का नाम शामिल है।

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ऐसे में अब सवाल यह है कि आखिर टीम इंडिया के लिए भविष्य में वह कौन से खिलाड़ी है जो बड़े सितारों के जाने के बाद टीम की बागडौर संभालेंगे। इसके साथ ही सवाल यह भी है कि क्या घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद यह खिलाड़ी इंटरनेशनल लेवल पर भी अपने नाम का सिक्का जमा पाएंगे।

शुभमन गिल बनेंगे नए दशक के सुपरस्टार !

शुभमन गिल को ऑस्ट्रेलिया दौरे में टेस्ट सीरीज में डेब्यू करने का मौका मिला। इस खिलाड़ी ने मौके को दोनों हाथों से पकड़ा और शानदार प्रदर्शन कर टीम में अपनी जगह पक्की कर ली। गिल ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज के 3 मैचों की 6 पारियों में 51.8 औसत से 259 रन बनाए जहां उन्होंने 2 अर्धशतक लगाएं और उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 91 रन का रहा है। अपने अंडर-19 टीम के कप्तान पृथ्वी शॉ की जगह ओपनिंग करने का मौका पाने वाले शुभमन गिल किसी भी पारी में बल्लेबाजी करते हुए असहज नहीं दिखाई दिए। पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क और जॉश हेजलवुड जैसे गेंदबाजों के सामने गिल ने शानदार शॉट्स खेले। उनके गाबा टेस्ट में खेले गए 91 रन किसी बड़े शतक से भी ज्यादा तारीफों के हकदार है। गिल का यह प्रदर्शन भारतीय क्रिकेट को उम्मीद देता है कि आने वाले समय में विराट, रोहित और रहाणे जैसे खिलाड़ियों के रिटायर होने के बाद यही खिलाड़ी भारत का नाम रोशन करेंगे।

किसी भी हालत से जीत दिलाने का दम रखते हैं रिषभ पंत !

रिषभ पंत पर हमेशा से ही उनके गैरजिम्मेदाराना तरीकों से खेलने को लेकर सवाल उठते रहते थे। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में भी उन्हें पहले टेस्ट में मौका नहीं दिया गया। लेकिन उसके बाद उन्हें साहा के नाकाम होने पर दूसरे टेस्ट में मौका दिया गया। जिसके बाद पंत ने मानो मिले मौके को अच्छे से भुनाया। पंत ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट सीरीज में पंत ने शानदार प्रदर्शन किया। पंत ने सीरीज के 3 मैचों की 5 पारियों में 68.50 की औसत से 274 रन बनाए। जहां पंत ने 2 अर्धशतक लगाएं और उनका बेस्ट स्कोर 97 रन रहा। पंत ने अपने प्रदर्शन से बता दिया कि वो किसी भी हालत में मैच जिताने का दम रखते है। गाबा में खेले गए चौथी पारी में नाबाद 89 रन उनके जीवन की सबसे अहम पारियों में शुमार होंगे। ऐसे में पंत को लेकर भारतीय क्रिकेट की उम्मीदें बढ़ गई है। माना जा रहा है रिषभ पंत आने वाले समय में भारत के लिए बड़े खिलाड़ी बनेंगे और टीम इंडिया को नई उचाइयों पर ले जाएंगे।

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युवा गेंदबाजों की फौज भारत के लिए सबसे बड़ी खुशी 

ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टीम इंडिया के मुख्य गेंदबाज एक एक कर चोटिल हो रहे थे। भारत के लिए पहले इशांत शर्मा, मोहम्मद शमी, उमेश यादव और आखिरी टेस्ट आते आते जसप्रीत बुमराह भी चोटिल होकर मैच से बाहर हो गए। ऐसे में तेज गेंदबाजी की कमान संभाली युवा गेंदबाज मोहम्मद सिराज, नवदीप सैनी, टी नटराजन, शार्दुल ठाकुर जैसे गेंदबाजों ने जिन्होंने गाबा के मैदान में कमाल कर दिया। तेज गेंदबाज मोहम्मद सिराज तो भारत के लिए टेस्ट सीरीज के 3 मैचों में 13 विकेट लेकर सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बनें। यह मोहम्मद सिराज की डेब्यू सीरीज थी। भारतीय क्रिकेट के युवा तेज गेंदबाजों का यह प्रदर्शन बताता है कि एक समय रफ्तार वाले गेंदबाजों की कमी झेलने वाली टीम इंडिया अब बदल चुकी है। इस टीम के पास ऐसे तेज गेंदबाजों का कोर ग्रुप है जो विदेशों में जाकर भारत के लिए जीत की इबारत लिखेगा। टीम इंडिया के तेज गेंदबाज अब टेस्ट क्रिकेट में 20 विकेट लेने का दम रखते है। भारतीय क्रिकेट के पास लगभग 10 तेज गेंदबाजों का ऐसा ग्रुप है जो समय पड़ने पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने से पीछे नहीं हटेगा।

नए दशक में कैसा रहेगा भारतीय क्रिकेट का भविष्य ?

टीम इंडिया ने जिस तरह से ऑस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज जीती उसमें युवा खिलाड़ियों का बड़ा योगदान था। भारतीय टीम के इस तरह के प्रदर्शन के पीछे बीसीसीआई का बड़ा काम रहा जिन्होंने पिछले कुछ सालों में इंडिया ए के कई दौरे विदेशों में करवाए जिससे युवा खिलाड़ियों को ज्यादा से ज्यादा मैच खेलने का मौका मिला। इसके अलावा सबसे ज्यादा तारीफ यहां पूर्व भारतीय कप्तान राहुल द्रविड़ की करना चाहेंगे जिन्होंने युवा भारतीय क्रिकेटरों को निखारा। कंगारू सरजमीं पर टेस्ट सीरीज जीत के बाद राहुल द्रविड़ की जमकर तारीफ की गई। पूर्व पाकिस्तानी तेज गेंदबाज शोएब अख्तर ने राहुल द्रविड़ की तारीफ करते हुए कहा कि " राहुल द्रविड़ ने पहले अंडर-19 टीम को मजबूत बनाया। इसके बाद नेशनल क्रिकेट अकादमी को ढ़ंग के खड़ा किया। अब हिंदुस्तान के यंगस्टर जीते है। भारत इसके लिए पिछले 10 सालों से इन्वेस्टमेंट कर रहा है। तगड़े और ईमानदार लोग लाएं जिन्हें सैलरी से ज्यादा मतलब नहीं था।" 

जाहिर है शुभमन गिल, पृथ्वी शॉ, ऋषभ पंत, वॉशिंगटन सुंदर- ये सभी उस अंडर-19 टीम से निकले हैं, जिसे कभी द्रविड़ ने कोच किया था। 2016 से लेकर 2019 तक अंडर-19 और इंडिया ए टीम के कोच थे द्रविड़। आज जिस बेंच स्ट्रेंथ की बात हो रही है, जिन खिलाड़ियों के नाम लिए जा रहे हैं कि वे भविष्य के स्टार हैं, वे सभी इस दौर में निकले। अब भी वह नैशनल क्रिकेट अकैडमी के हेड के तौर पर खिलाड़ियों को गाइड कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में ऐसे ही औऱ युवा खिलाड़ियों के निकलने की उम्मीद है जो भारतीय क्रिकेट के भविष्य को संवारेंगे।

- दीपक कुमार मिश्रा







ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

  •  दीपक कुमार त्यागी
  •  जनवरी 21, 2021   13:23
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ट्रैक्टर परेड निकालने पर अड़े किसान क्या भीड़ के दौरान अनुशासन कायम रख पाएँगे?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं।

कड़कड़ाती कड़ाके की हाड़ कंपकंपा देने वाली भयंकर शीतलहर में हमारे देश का अन्नदाता अपने हक को लेने के लिए सड़कों पर धरना देकर बैठा हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं की सड़कों पर व देश में अन्य भागों में बहुत जगहों पर केंद्र सरकार के द्वारा लाये गये तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर पिछले बहुत लंबे समय से हमारे प्यारे किसान जगह-जगह पर धरनारत हैं। मसले के समाधान के लिए केंद्र सरकार से किसानों की बार-बार वार्ता होने के बाद भी अभी तक भारत सरकार व किसानों के बीच कोई भी सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया है, किसान तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग पर अड़े हुए हैं, वहीं केंद्र सरकार बिंदुवार चर्चा करके असहमत बिंदुओं में संशोधन करने की बात कह रही है। लेकिन धरातल पर वास्तविकता यह है कि किसान संगठनों व केंद्र सरकार के बीच मामला आंदोलन के एक-एक दिन गुजरने के साथ और लंबा खिचता जा रहा है, जिसके चलते उतना ही यह मामला पेचीदा होकर सुलझने की जगह दिन-प्रतिदिन और ज्यादा उलझता जा रहा है।

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अपनी विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसानों को अब धीरे-धीरे दो माह होने वाले हैं, लेकिन फिर भी किसानों की समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं, जिसके चलते अब किसान आंदोलन देश के विभिन्न भागों में बहुत तेजी से विस्तार लेता जा रहा है। अब तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में भी पहुंच गया है, जिसने चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, जो किसानों से बात करके सर्वोच्च न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी। हालांकि कमेटी का गठन होते ही वो सदस्यों की वजह से विवादों के दायरे में आ गयी, किसान संगठनों के कुछ नेताओं ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर कमेटी के सदस्यों के चयन पर आपत्ति दर्ज कराते हुए उनको तीनों कृषि कानूनों का समर्थक बताया है और उनकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, जिसके बाद एक सदस्य ने तो कमेटी में रहने से इंकार ही कर दिया है।

खैर हमारे देश में राजनीति जो करवा दे वो भी कम है, लेकिन अब देश में किसानों का हितैषी बनने को लेकर के पक्ष विपक्ष व निष्पक्ष लोगों के बीच में जबरदस्त चर्चा के साथ किसान राजनीति अपने चरम पर है। देश की आजादी से लेकर आज तक किसानों को उनका हक ना देने वाले राजनीतिक दलों से लेकर के हर कोई अपने आपको अन्नदाता किसानों का कट्टर हितैषी दिखाने पर लगा हुआ है। वैसे विचारणीय बात यह है कि जिस तरह से देश में आजादी के बाद से ही गरीबी को खत्म करने के लिए विभिन्न सरकारों के द्वारा समय-समय पर बहुत सारी योजनाएं चलाई गयीं और हर वक्त राजनीतिक दलों के द्वारा उनका श्रेय लेने में भी कोई कोरकसर नहीं छोड़ी जाती है ठीक उसी प्रकार से ही किसानों के नाम पर भी देश में आजादी के बाद से यही स्थिति है, राजनीतिक दल हमेशा श्रेय लेने से चूके नहीं हैं। लेकिन अफसोस फिर भी सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि ना तो देश से गरीबी समाप्त होने का नाम ले रही है और ना ही हमारे अन्नदाता किसानों को भी उनकी समस्याओं का समाधान व हक अभी तक मिल पा रहा है। हाँ, देश में लंबे समय से गरीब व किसानों का हितैषी बनने के लिए राजनीतिक लोगों के द्वारा केवल और केवल हर वर्ष की आंकड़ेबाजी अवश्य जारी है। आंकड़ों की बाजीगरी व धरातल के हालातों में बहुत अंतर होने के कारण उत्पन्न आक्रोश की वजह से ही किसान अब सड़कों पर उतरे हुए हैं और वो अब अपने हक के लिए आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड़ में नजर आ रहे हैं, जिसके चलते ही वो दिल्ली की सीमाओं के साथ देश के अन्य भागों में अपना घर-बार छोड़कर अनिश्चितकालीन लंबे धरने पर बैठे हुए हैं और सरकार व आम जनमानस का अपनी मांगों की तरफ ध्यान आकर्षित करवाने के लिए समय-समय पर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं।

उसी क्रम में कुछ किसान संगठन राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर दिल्ली की आउटर रिंगरोड व देश के विभिन्न भागों में ट्रैक्टर परेड के आयोजन करने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहे हैं। जिसको लेकर केंद्र सरकार व देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियों के माथे पर चिंता की रेखाएं हैं। देश के प्रत्येक नागरिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दिन 26 जनवरी पर किसी भी अनहोनी की आशंका को रोकने के लिए सरकार व सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हैं। 'केन्द्र सरकार तो ट्रैक्टर परेड पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक चली गयी है, जिस पर सोमवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शरद अरविंद बोबडे ने कहा, 'दिल्ली में रैली निकाले जाने के मामले में हमने पहले ही कहा था कि यह कानून व्यवस्था का मामला है और यह पुलिस को देखना है।' उन्‍होंने कहा, 'यह देखना पुलिस का काम है, कोर्ट का नहीं कि कौन दिल्ली में प्रवेश करेगा, कौन नहीं करेगा, कैसे करेगा!' सीजेआई ने कहा कि पुलिस को कानून व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार है, हमें बताने की जरूरत नहीं है। इसके साथ ही उन्‍होंने कहा कि दिल्‍ली पुलिस गणतंत्र दिवस की गरिमा सुनिश्चित करे।

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वहीं अब किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग के तार खालिस्तानी संगठनों से जुड़ने के अंदेशों को देखते हुए जांच करने के लिए देश की महत्वपूर्ण सुरक्षा एजेंसी एनआईए भी एक्टिव हो गयी है। सूत्रों के अनुसार उसने किसान संगठनों के कुछ शीर्ष नेताओं व अन्य बहुत सारे महत्वपूर्ण लोगों से पूछताछ करने के लिए नोटिस भेजे हैं। जिसके बाद उत्पन्न हालात को देखकर हमारे कुछ राजनीतिक विश्लेषक सरकार व किसानों के बीच भविष्य में टकराव का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं। किसानों के द्वारा ट्रैक्टर परेड करने की घोषणा के बाद से ही देश के अधिकांश आम लोगों के मन में एक विचार बहुत तेजी से कौंध रहा है कि देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय महापर्व गणतंत्र दिवस 26 जनवरी पर क्या सुरक्षा की दृष्टि से किसानों का इस तरह से ट्रैक्टर परेड निकालना उचित है?

क्या किसानों का ट्रैक्टर परेड का कार्यक्रम बहुत अधिक जोखिम भरा नहीं है?

देश में पिछले कुछ दिनों से हर नुक्कड़ पर, सत्ता पक्ष व विपक्ष के राजनीतिक गलियारों में और बुद्धिजीवियों के बीच में इस बेहद ज्वंलत मसले पर बहस जारी है। केंद्र सरकार की तरफ से किसानों को परेड निकालने से रोकने के लिए मनाने के हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं। इसको रोकने के लिए केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया है कि सुरक्षा एजेंसी के जरिये उन्हें जानकारी मिली है कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसान प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर परेड निकालने वाले हैं। जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय महत्ता के इस महत्वपूर्ण समारोह को प्रभावित करना है, हालांकि किसान संगठन समारोह में किसी भी प्रकार का विघ्न डालने की रणनीति से इंकार कर रहे हैं, वो केवल गरिमापूर्ण ढंग से परेड निकालने की बात कर रहे हैं। लेकिन पूर्व में जिस तरह से कुछ लोगों की वजह से किसानों के धरने के बीच ही देश को तोड़ने की बात करने वाले लोगों के फोटो लगे थे उस घटना से सबक लेकर अब किसान संगठनों को ट्रैक्टर परेड के दौरान अत्यधिक सतर्कता बरतनी होगी, उनको आत्ममंथन करना होगा कि क्या किसान संगठन इतनी बड़ी संख्या में आये ट्रैक्टरों के बीच अनुशासन बना कर रख सकते हैं, क्योंकि 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के दिन किसानों की ट्रैक्टर परेड में कोई भी देश विरोधी घटना घटित ना हो पाये इसको रोकने की जिम्मेदारी किसानों की खुद होगी, क्योंकि अगर कोई भी घटना घटित हो जाती है तो भविष्य में किसान आंदोलन की मंशा पर प्रश्नचिह्न लगने का काम हो सकता है और वैसे भी यह हमारे प्यारे देश की आन-बान-शान व अस्मिता के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है। किसान संगठनों व उससे जुड़े लोगों को ध्यान रखना होगा कि धरना प्रदर्शन करने का उनका अधिकार है। तो यह ध्यान रखना भी उनकी जिम्मेदारी है कि आंदोलन व परेड के दौरान कोई ऐसी घटना घटित ना हो जाये जिससे कि कोई देशद्रोही व्यक्ति देश की मान प्रतिष्ठा को इस किसान आंदोलन की आड़ में धूमिल करने का दुस्साहस कर सके। एक वीर जाबांज जवान की तरह देश के लिए सभी कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर रहने वाले अन्नदाता किसानों को हर हाल में देश की आन-बान-शान व स्वाभिमान का ध्यान रखना होगा।

-दीपक कुमार त्यागी

(स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार)







आज भी प्रेरणा और हिम्मत देते हैं गुरू गोबिंद सिंह के उपदेश

  •  योगेश कुमार गोयल
  •  जनवरी 20, 2021   13:20
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आज भी प्रेरणा और हिम्मत देते हैं गुरू गोबिंद सिंह के उपदेश

शौर्य और साहस के प्रतीक तथा इतिहास को नई धारा देने वाले अद्वितीय, विलक्षण और अनुपम व्यक्तित्व के स्वामी गुरु गोबिंद सिंह जी को इतिहास में एक विलक्षण क्रांतिकारी संत व्यत्वित्व का दर्जा प्राप्त है।

सिखों के 10वें गुरु गोबिंद सिंह जी का 354वां प्रकाश पर्व पटना में तख्त श्री हरिमंदिर पटना साहिब में 20 जनवरी को मनाया जा रहा है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार गुरु गोबिंद सिंह का जन्म 1667 ई. में पौष माह की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को 1723 विक्रम संवत् को पटना साहिब में हुआ था और इस साल 20 जनवरी को यह तिथि है, इसीलिए इसी दिन गुरु गोबिंद सिंह का प्रकाशोत्सव मनाया जाएगा। वैसे गुरु गोबिंद सिंह जयंती दिसम्बर तथा जनवरी के महीने में कभी-कभार एक वर्ष में दो बार भी आती है, जिसकी गणना हिन्दू विक्रमी संवत् कैलेंडर के अनुसार ही की जाती है। बचपन में गुरु गोबिंद सिंह जी को गोबिंद राय के नाम से जाना जाता था। उनके पिता गुरु तेग बहादुर सिखों के 9वें गुरु थे। पटना में रहते हुए गुरू जी तीर-कमान चलाना, बनावटी युद्ध करना इत्यादि खेल खेला करते थे, जिस कारण बच्चे उन्हें अपना सरदार मानने लगे थे। पटना में वे केवल 6 वर्ष की आयु तक ही रहे और सन् 1673 में सपरिवार आनंदपुर साहिब आ गए। यहीं पर उन्होंने पंजाबी, हिन्दी, संस्कृत, बृज, फारसी भाषाएं सीखने के साथ घुड़सवारी, तीरंदाजी, नेजेबाजी इत्यादि युद्धकलाओं में भी महारत हासिल की। कश्मीरी पंडितों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए उनके पिता और सिखों के 9वें गुरु तेग बहादुर जी द्वारा नवम्बर 1975 में दिल्ली के चांदनी चौक में शीश कटाकर शहादत दिए जाने के बाद मात्र 9 वर्ष की आयु में ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों के 10वें गुरू पद की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली और खालसा पंथ के संस्थापक बने।

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शौर्य और साहस के प्रतीक तथा इतिहास को नई धारा देने वाले अद्वितीय, विलक्षण और अनुपम व्यक्तित्व के स्वामी गुरु गोबिंद सिंह जी को इतिहास में एक विलक्षण क्रांतिकारी संत व्यत्वित्व का दर्जा प्राप्त है। अत्याचार और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए उनका वाक्य ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं तां गोबिंद सिंह नाम धराऊं’ सैकड़ों वर्षों बाद आज भी प्रेरणा और हिम्मत देता है। ‘भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन’ वाक्य के जरिये वे कहते थे कि किसी भी व्यक्ति को न किसी से डरना चाहिए और न ही दूसरों को डराना चाहिए। उन्होंने समाज में फैले भेदभाव को समाप्त कर समानता स्थापित की थी और लोगों में आत्मसम्मान तथा निडर रहने की भावना पैदा की। एक आध्यात्मिक गुरु होने के साथ-साथ वे एक निर्भयी योद्धा, कवि, दार्शनिक और उच्च कोटि के लेखक भी थे। उन्हें विद्वानों का संरक्षक भी माना जाता था। दरअसल कहा जाता है कि 52 कवियों और लेखकों की उपस्थिति सदैव उनके दरबार में बनी रहती थी और इसीलिए उन्हें ‘संत सिपाही’ भी कहा जाता था। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की थी।

‘बिचित्र नाटक’ को गुरु गोबिंद सिंह की आत्मकथा माना जाता है, जो उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह ‘दशम ग्रंथ’ का एक भाग है, जो गुरु गोबिंद सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। इस दशम ग्रंथ की रचना गुरू जी ने हिमाचल के पोंटा साहिब में की थी। कहा जाता है कि एक बार गुरु गोबिंद सिंह अपने घोड़े पर सवार होकर हिमाचल प्रदेश से गुजर रहे थे और एक स्थान पर उनका घोड़ा अपने आप आकर रुक गया। उसी के बाद से उस जगह को पवित्र माना जाने लगा और उस जगह को पोंटा साहिब के नाम से जाना जाने लगा। दरअसल ‘पोंटा’ शब्द का अर्थ होता है ‘पांव’ और जिस जगह पर घोड़े के पांव अपने आप थम गए, उसी जगह को पोंटा साहिब नाम दिया गया। गुरु जी ने अपने जीवन के चार वर्ष पोंटा साहिब में ही बिताए, जहां अभी भी उनके हथियार और कलम रखे हैं।

1699 में बैसाखी के दिन तख्त श्री केसगढ़ साहिब में कड़ी परीक्षा के बाद पांच सिखों को ‘पंज प्यारे’ चुनकर गुरु गोबिंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी, जिसके बाद प्रत्येक सिख के लिए कृपाण या श्रीसाहिब धारण करना अनिवार्य कर दिया गया। वहीं पर उन्होंने ‘खालसा वाणी’ भी दी, जिसे ‘वाहे गुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह’ कहा जाता है। उन्होंने जीवन जीने के पांच सिद्धांत दिए थे, जिन्हें ‘पंच ककार’ (केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा) कहा जाता है। गुरु गोबिंद सिंह ने ही ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को सिखों के स्थायी गुरु का दर्जा दिया था। सन् 1708 में गुरु गोबिंद सिंह ने महाराष्ट्र के नांदेड़ में शिविर लगाया था। वहां जब उन्हें लगा कि अब उनका अंतिम समय आ गया है, तब उन्होंने संगतों को आदेश दिया कि अब गुरु ग्रंथ साहिब ही आपके गुरु हैं। गुरु जी का जीवन दर्शन था कि धर्म का मार्ग ही सत्य का मार्ग है और सत्य की हमेशा जीत होती है। वे कहा करते थे कि मनुष्य का मनुष्य से प्रेम ही ईश्वर की भक्ति है, अतः जरूरतमंदों की मदद करो। अपने उपदेशों में उनका कहना था कि ईश्वर ने मनुष्यों को इसलिए जन्म दिया है ताकि वे संसार में अच्छे कर्म करें और बुराई से दूर रहें।

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उन्होंने कई बार मुगलों को परास्त किया। आनंदपुर साहिब में तो मुगलों से उनके संघर्ष और उनकी वीरता का स्वर्णिम इतिहास बिखरा पड़ा है। सन् 1700 में दस हजार से भी ज्यादा मुगल सैनिकों को सिख जांबाजों के सामने मैदान छोड़कर भागना पड़ा था और गुरु जी की सेना ने 1704 में मुगलों के अलावा उनका साथ दे रहे पहाड़ी हिन्दू शासकों को भी करारी शिकस्त दी थी। मुगल शासक औरंगजेब की भारी-भरकम सेना को भी आनंदपुर साहिब में दो-दो बार धूल चाटनी पड़ी थी। गुरु गोबिंद सिंह के चारों पुत्र अजीत सिंह, फतेह सिंह, जोरावर सिंह और जुझार सिंह भी उन्हीं की भांति बेहद निडर और बहादुर योद्धा थे। अपने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से लड़ते हुए गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया था। उनके दो पुत्रों बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह ने चमकौर के युद्ध में शहादत प्राप्त की थी। 26 दिसम्बर 1704 को गुरु गोबिंद सिंह के दो अन्य साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं करने पर सरहिंद के नवाब द्वारा दीवार में जिंदा चुनवा दिया गया था और माता गुजरी को किले की दीवार से गिराकर शहीद कर दिया गया था। नांदेड़ में दो हमलावरों से लड़ते समय गुरु गोबिन्द सिंह के सीने में दिल के ऊपर गहरी चोट लगी थी, जिसके कारण 18 अक्तूबर 1708 को नांदेड में करीब 41 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई थी। नांदेड़ में गोदावरी नदी के किनारे बसे हुजूर साहिब में उन्होंने अंतिम सांस ली थी।

- योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं तथा तीन दशकों से साहित्य और पत्रकारिता में सक्रिय हैं)







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