शिक्षा नीतियाँ शिक्षकों को ही बनाने दें, वरना छात्रों के साथ खिलवाड़ होता रहेगा

By डॉ. दीपकुमार शुक्ल | Publish Date: Aug 3 2019 11:06AM
शिक्षा नीतियाँ शिक्षकों को ही बनाने दें, वरना छात्रों के साथ खिलवाड़ होता रहेगा
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शिक्षा की नीतियाँ सिर्फ शिक्षकों को ही बनानी चाहिए क्योंकि छात्रों के बौद्धिक स्तर, उनकी आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों का व्यावहारिक ज्ञान शिक्षकों से अधिक अन्य किसी को भी नहीं होता है।

व्यापक अर्थ में शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व को विकसित करने वाली एक सतत एवं सोद्देश्य सामाजिक प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया के तहत व्यक्ति समाज में वयस्क की भूमिका निभाने के योग्य बन पाता है। शिक्षा शब्द शिक्ष धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है सीखना और सिखाना। सीखने सिखाने की प्रक्रिया व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक अनवरत चलती रहती है। अनेक विद्वानों का यह भी मत है कि गर्भस्थ शिशु भी माँ के माध्यम से ज्ञान को आत्मसात करने का प्रयास करता है। इसकी प्रामाणिकता के लिए प्रायः लोग अभिमन्यु का उदाहरण देते हैं। गर्भवती स्त्रियों को महापुरुषों की कथाएँ तथा सदविचार सुनाने की परम्परा भारतवर्ष में प्राचीन काल से रही है। जिसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु में सद्विचारों का प्रत्यारोपण करना होता था। जन्म के पूर्व से मृत्युपर्यन्त चलने वाली शिक्षा प्रक्रिया के इस व्यापक स्वरूप को किसी भी मनुष्य की जन्मजात शक्तियों के विकास, उसके ज्ञान एवं कौशल में वृद्धि तथा व्यवहार में परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। इससे पृथक शिक्षा प्रक्रिया का एक संकुचित स्वरूप भी है। जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को एक निश्चित समय व स्थान (विद्यालय आदि) पर सुनियोजित ढंग से एक निश्चित पाठ्यक्रम तथा निश्चित प्रक्रिया के तहत शिक्षित किया जाता है। परीक्षा उत्तीर्ण करके प्रमाण-पत्र प्राप्त करना इस प्रक्रिया का प्रमुख उद्देश्य होता है।

 
भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा प्रक्रिया के व्यापक स्वरूप को विशेष महत्व दिया जाता था। संकुचित स्वरूप के दायरे में शिक्षा को समेटने का प्रयास कभी भी नहीं किया गया बल्कि व्यापक स्वरूप के सहायतार्थ ही संकुचित स्वरूप की संरचना की गई थी। अर्थात् विद्यालयी व्यवस्था के द्वारा शिक्षा के व्यापक स्वरूप को मात्र दिशा देने का कार्य होता था। बच्चों पर शिक्षा थोपने की अपेक्षा उनकी अभिरुचि को अधिक महत्व दिया जाता था। औपचारिक शिक्षा प्राप्ति की प्रारम्भिक अवस्था आठ वर्ष निर्धारित की गई थी। अति कुशाग्र बुद्धि के बच्चों को ही पाँच वर्ष की आयु में गुरुकुल भेजा जाता था। अन्यथा तब तक बालक को प्रकृति और समाज के सान्निध्य में रहकर सीखने दिया जाता था। मुसलमानों के आगमन के बाद भारतीय शिक्षा प्रक्रिया में धीरे-धीरे बदलाव आना शुरू हुआ। दो संस्कृतियों के आपसी टकराव से शिक्षा के संकुचित स्वरूप का विस्तार प्रारम्भ हो गया। रही सही कसर अंग्रेजों ने पूरी कर दी जिसका परिणाम हमारे सामने है। आजादी के बाद जैसे-जैसे शिक्षा का व्यावसायिकरण बढ़ा वैसे-वैसे शिक्षा प्रक्रिया के संकुचित स्वरूप का दायरा बढ़ता चला गया।


आज शिक्षा प्रक्रिया का व्यापक स्वरूप जहां अति संकुचित हो गया है वहीं संकुचित स्वरूप अति व्यापक हो गया। अब हम अपने बच्चों को दुनिया का सम्पूर्ण ज्ञान केवल और केवल विद्यालय और पुस्तकों के माध्यम से प्रदान करके उनमें आमूलचूल व्यावहारिक परिवर्तन देखना चाहते हैं। इससे पहले कि बच्चा सही तरह से चलना और बोलना सीख पाये हम उसे जल्दी से जल्दी विद्यालय भेजना चाहते हैं क्योंकि हमें अपने बच्चे के पिछड़ने का डर सदैव सताता रहता है। हमारी इसी प्रवृत्ति ने निजी विदयालयों में केजी और नर्सरी नाम की अनौपचारिक कक्षाओं को जन्म दिया क्योंकि संविधान में औपचारिक शिक्षा प्रारम्भ होने की आयु 6 वर्ष निर्धारित की गई है। निजी विद्यालयों की केजी और नर्सरी कक्षाओं के दृष्टिगत सरकार को आंगनबाड़ी केन्द्रों की स्थापना करनी पड़ी। इधर कुछ वर्षों से प्ले-ग्रुप नाम से एक और नवीन कक्षा प्रकाश में आ चुकी है। बड़े शहरों में तो अब पालना नाम की कक्षाएं भी शुरू हो चुकी हैं। इधर बच्चे का जन्म और उधर उसका दाखिला। बच्चे के जन्म के बाद अब सारी ज़िम्मेदारी स्कूल वाले उठाने के लिए तत्पर खड़े हैं।
 


 
सरकार नई शिक्षा नीति के नाम पर संकुचित शिक्षा प्रक्रिया में कुछ और नवीन प्रयोग तथा परिवर्तन करना चाहती है जिसके लिए कस्तूरीरंगन समिति के सुझाओं पर विचार किया जा रहा है। आजाद भारत में पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति सन् 1968 में कोठारी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर बनी थी। उसके बाद सन् 1986 में दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई जिसमें सन् 1992 में व्यापक संशोधन किया गया था। कुछ वर्ष पूर्व मानव संसाधन विकास मन्त्रालय ने पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने वर्ष 2015 में नयी शिक्षा नीति का जो मसौदा पेश किया वह सरकार को समझ में नहीं आया। अतः वर्ष 2016 में प्रसिद्ध अन्तरिक्ष वैज्ञानिक पद्मभूषण डॉ. कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय समिति गठित की गई। इस समिति ने 31 मई 2019 को अपना मसौदा पेश किया। कस्तूरीरंगन समिति द्वारा पेश मसौदे का सार यदि देखा जाए तो समिति ने व्यावसायिक शिक्षा की अंधी दौड़ में शामिल निजी शिक्षा तन्त्र की शिक्षा पद्धति पर ही एक तरह से मुहर लगायी है। मसौदे में दिये गए 5+3+3+4 के ढांचे के तहत औपचारिक शिक्षा की शुरुआत तीन वर्ष की आयु से होगी। प्रारम्भ के तीन वर्ष में बिना पाठ्यपुस्तकों के खेल-खेल में ककहरा, अंक और आकृतियों का ज्ञान बच्चों को कराया जाएगा। सिद्धांततः यह बात जितनी सरल प्रतीत होती है, व्यावहारिक रूप से उतनी सरल है नहीं। भले ही यहाँ बच्चों को खेल-खेल में शिक्षा देने की बात की जा रही हो परन्तु उसे अध्यापक की निगरानी तथा विद्यालय की चारदीवारी में बांध कर तो रखा ही जाएगा, जो उसके स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा है।
कॉन्वेंट स्कूल से शिक्षा प्राप्त करके निकले बच्चों की फितरत, उनकी आदतें, कार्य-व्यवहार तथा समाज के प्रति नजरिए का वृहद सर्वेक्षण यदि कस्तूरीरंगन समिति ने करवाया होता तो शायद समिति का मसौदा कुछ और ही होता। आईएएस और आईपीएस जैसे उच्च पदों पर पहुंच कर तनाव के कारण आत्महत्या करने वाले युवा प्रायः इन्हीं कॉन्वेंट स्कूलों के ही पढ़े-लिखे होते हैं। समिति को ऐसे लोगों की मानसिकता का भी अध्ययन करना चाहिए था।
 
 
यह विडम्बना ही है कि प्राथमिक स्तर से लेकर माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा का मसौदा वह लोग तैयार कर रहे हैं जिन्होंने इस स्तर के बच्चों को न तो कभी शिक्षा दी है और न ही कभी उनके साथ लगकर दो, चार महीने का समय व्यतीत किया है। शिक्षा का मसौदा तैयार करने के लिए संभवतः विभिन्न स्रोतों से एकत्रित आंकड़ों को ही आधार बनाया गया है। समिति के अध्यक्ष डॉ. कस्तूरीरंगन प्रसिद्ध अन्तरिक्ष वैज्ञानिक तथा राज्यसभा सदस्य हैं। वह इसरो के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनके निर्देशन में चंद्रयान-1 तथा अनेक उपग्रहों का विकास एवं प्रक्षेपण हुआ है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम में भारत को श्रेष्ठतम पहचान दिलाने वाले के. कस्तूरीरंगन निःसन्देह एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक हैं। उन्हें चाँद, तारों की बारीक से बारीक समझ है। परन्तु बालमन के संवेगात्मक परिवर्तनों का उन्हें शायद ही कोई व्यावहारिक अनुभव हो। यहाँ 'जहां काम आवे सुई काह करे तलवार' की कहावत सहज ही ध्यान में आ जाती है।
जिस प्रकार हिन्दी का मूर्धन्य अध्यापक गणित के टेढ़े मेढ़े प्रश्न हल करने में प्रायः अक्षम होता है, ठीक उसी प्रकार एक क्षेत्र के उत्कृष्ट व्यक्ति से दूसरे क्षेत्र में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। समिति के अन्य सदस्यों में डॉ॰ वसुधा कामत एनएसडीटी यूनिवर्सिटी मुंबई की कुलपति रह चुकी हैं। तकनीकी शिक्षा तथा स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में इनका अहम योगदान माना जाता है। केजे अलफोस भूतपूर्व आईएएस अधिकारी हैं। केरल को सौ प्रतिशत साक्षर बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। डॉ. मंजुल भार्गव अमेरिका की प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में गणित के प्रोफेसर हैं। डॉ. रामशंकर कुरील बाबा साहब आंबेडकर यूनिवर्सिटी ऑफ सोशल साइन्सेज मुहू, मध्य प्रदेश के कुलपति हैं। समावेशी शिक्षा और विकास पर इन्होंने कई शोधपत्र लिखे हैं। डॉ. टीवी कट्टीमनी ट्राइबल यूनिवर्सिटी अमरकंटक के कुलपति हैं। कृष्ण मोहन त्रिपाठी उप्र हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट परीक्षा बोर्ड के चेयरमैन रह चुके हैं। सर्वशिक्षा अभियान की सफलता में इनकी अहम भूमिका रही है। डॉ. मजहर आसिफ गोहाटी विश्वविद्यालय में फारसी के प्रोफेसर हैं। इनके नेतृत्व में फारसी-असमिया-अंग्रेजी की पहली डिक्शनरी तैयार हुई थी। डॉ. एमके श्रीधर कर्नाटक इनोवेशन काउंसिल तथा कर्नाटक नालेज कमीशन के पूर्व सदस्य एवं सचिव हैं।
 
समिति के सभी नौ सदस्य अति योग्य हैं। परन्तु उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में बसे तथा भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में रहने वाले बच्चों की मानसिकता का कोई व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। आंकड़ों और मनोवैज्ञानिकों के सुझाओं के आधार पर अन्य सब कुछ तय हो सकता है परन्तु इतने बड़े देश के बच्चों का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। सरकार यदि वास्तव में शिक्षा के विकास के लिए कृत संकल्पित है तो उसे ब्लॉक स्तर पर प्राथमिक, पूर्व माध्यमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा के लिए शिक्षकों की विषयवार समितियां बनानी चाहिए। इन समितियों के सुझावों को क्रमशः जिला, प्रदेश और देश स्तर पर इसी प्रकार से गठित समितियों के माध्यम से संकलित करके ही नयी शिक्षा नीति का प्रारूप बनाया जाना चाहिए। शिक्षा की नीतियाँ सिर्फ शिक्षकों को ही बनानी चाहिए क्योंकि छात्रों के बौद्धिक स्तर, उनकी आवश्यकताओं तथा परिस्थितियों का व्यावहारिक ज्ञान शिक्षकों से अधिक अन्य किसी को भी नहीं होता है। प्राचीन भारत में शिक्षा मात्र इसलिए समृद्ध थी क्योंकि शिक्षा प्रक्रिया का सम्पूर्ण संचालन शिक्षकों के हाथों में था। 
 
-डॉ. दीपकुमार शुक्ल
 

 

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