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समसामयिक

मीडिया की आजादी की सिर्फ बातें ही होती हैं...हकीकत कुछ और ही है

By बाल मुकुन्द ओझा | Publish Date: May 4 2018 11:44AM

मीडिया की आजादी की सिर्फ बातें ही होती हैं...हकीकत कुछ और ही है
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अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हर साल तीन मई को मनाया जाता है। प्रेस किसी भी समाज का आइना होता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता बुनियादी जरूरत है। प्रेस के माध्यम से हम देश दुनिया में घटित होने वाली गतिविधियों से अवगत होकर अपना ज्ञान बढ़ाते हैं। मीडिया की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी राय कायम करने और सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर करने का अधिकार है। भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद−19 में भारतीयों को दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के मूल अधिकार से सुनिश्चित होती है। विश्व स्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया, जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता का मूल्यांकन करना, प्रेस की स्वतंत्रता पर बाह्य तत्वों के हमले से बचाव करना एवं प्रेस की स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए संवाददाताओं की यादों को सहेजना है। 

भारत में आजादी के आंदोलन में प्रेस की अहम् भूमिका थी। प्रेस ने बहुत जिम्मेदारी के साथ जनता की आवाज बुलंद की। इसीलिए यह माना और स्वीकार किया गया कि आजादी के आंदोलन में प्रेस की बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी जिसने बिना भय और लोभ लालच के अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। महात्मा गाँधी से लेकर लोकमान्य तिलक, गणेश शंकर विद्यार्थी, लाला लाजपत राय, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, वियोगी हरि और डॉ. राम मनोहर लोहिया जैसे पत्रकारों का नाम हम बहुत सम्मान से लेते है। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिये देशवासियों में आजादी के आंदोलन का जज्बा जगाया था।
 
दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका के साथ प्रेस को चौथा खंभा माना जाता है। प्रेस इनको जोड़ने का काम करती है। प्रेस की स्वतंत्रता के कारण ही कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को मजबूती के साथ आम आवाम की भावना को अभिव्यक्त करने का अवसर हासिल हुआ है। कभी कभी प्रेस पर तिल को ताड़ बनाने का आरोप लगाया जाता है हालाँकि यह पूरी तरह सच नहीं है। आजादी के बाद प्रेस पर बहुत जिम्मेदारी आ गई। जनमत जागृत करने का कार्य भी भारत में प्रेस ही करती है अर्थात् सोये हुए को जगाने का काम भी करती है। राजनीतिक दलों और नेताओं को राह दिखाने का काम भी बहुधा मीडिया ही करती है। आम आदमी को रोटी कपड़ा और मकान की बुनियादी सुविधा सुलभ करने में भी प्रेस की अहम् भूमिका है। भ्रष्टाचार से लड़ने का काम भी प्रेस ने बखूबी किया है। सत्ता की नाराजगी का दंश भी मीडिया को झेलना पड़ा है। 1975 में आम आवाम के हक की लड़ाई लड़ने वाले विपक्ष का समर्थन करने पर आपातकाल के नाम पर मीडिया का गला घोँट दिया गया था। सेंसरशिप का सामना भारतीय प्रेस को करना पड़ा था। अनेक अखबारों पर सरकारी छापे पड़े। विज्ञापन रोके गए। बहुत से अखबार जुल्म ज्यादती के शिकार होकर अकाल मौत के शिकार हो गए। बहुत से पत्रकारों को जेलों में भी डाला गया। इसके बावजूद भारत की प्रेस घबराई नहीं और इस आपदा का डटकर मुकाबला किया। यह प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने का ही फल था की एक सरकार का लोकतान्त्रिक तरीके से शांति के साथ तख्ता पलट हुआ।
 
समाज के आपसी रिश्तों में जो संयम है वही संयम मीडिया को भी अपने संवाद में रखना होगा। इससे मीडिया के प्रति समाज में आदर और सम्मान बढ़ेगा और कोई भी ताकत मीडिया की आजादी को कुचल नहीं पाएगी। भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने मीडिया को स्वतंत्रता दी है। इसलिए पत्रकारों को स्वतंत्रता और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए। प्रेस को खतरा दरअसल मीडिया मालिकों से नहीं है, उन शक्तियों से है जो जल्दी से ज्यादा पैसा बनाना चाहती हैं। ऐसे में मीडिया को उच्च मानदंड और आदर्शों पर काम करना होगा ताकि कोई भी उस पर उंगलियां न उठा सके, क्योंकि एक पत्रकार सिर्फ खबरों को बताने वाला नहीं है बल्कि वह एक बुद्धिजीवी और सामाजिक प्राणी भी है। मीडिया जितना स्वतंत्र होगा, सरकारी कामकाज उतने पारदर्शी होंगे। सामाजिक और राष्ट्रीय सरोकारों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। मसलन पिछले दो दशकों में दलित और महिला अधिकारों के प्रति मीडिया ने बड़ा कार्य किया है। फिलहाल देश में चल रहे चुनाव में मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। सोशल मीडिया का दखल और इसका प्रयोग जिस तरह बढ़ रहा है, उसका लाभ भी पत्रकारिता को मिलेगा। आज मीडिया का प्रभाव काफी बढ़ गया है। कहा जाता है कि भारत के मीडिया पर पूंजीपतियों का आधिपत्य है जिसके कारण वह स्वतंत्र हो कर कुछ भी लिखने को तैयार नहीं है। अब मीडिया केवल प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक तक सीमित हो कर नहीं रह गया है, उस पर सरकार और पैसे वालों का उतना कब्जा नहीं है क्योंकि सोशल मीडिया ने जनमानस का विश्वास जीतने में सफलता हासिल कर ली है। अब मीडिया चंद हाथों में सीमित होकर नहीं रह गया है और न ही दारू और पैसे में बिकने वाला है। दरअसल इंटरनेट के विस्तार के बाद सोशल मीडिया का जबरदस्त प्रभाव देखने को मिला है अब कोई खबर दबाई नहीं जा सकती। सोशल मीडिया के कारण वह लोगों तक तुरंत पहुँच जाती है। हालाँकि यह भी सच है कि कुछ चालाक और धूर्त लोगों ने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाकर मीडिया का दुरूपयोग भी किया है।
 
आज सोशल मीडिया ने घर घर में पत्रकार खड़े कर दिए हैं जो पलक झपकते ही आप तक समाज में घटने वाली घटना ज्यों की त्यों परोस देता है। वह भी बिना लाग लपेट के। इसके अनेक खतरे भी उत्पन्न हो गए हैं जिससे समाज को लाभ कम और हानि अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। आज मीडिया के बेहतर फैलाव के बाद यह महसूस किया जा रहा है कि प्रेस की आजादी कायम  रखी जाये मगर साथ ही जिम्मेदारी की भावना का भी निर्वहन किया जाये। समाज के कमजोर और पिछड़े तबके तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जाये। साम्प्रदायिकता और छद्म  साम्प्रदायिकता की सच्चाई से लोगों को अवगत कराया जाये। समाज के कमजोर और पिछड़े वर्गों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाया जाये। प्रेस की आजादी का मतलब हमारे सामाजिक नव निर्माण से है। प्रेस को अपनी स्वतंत्रता कायम रखते हुए समाज के जन जागरण में अपनी भूमिका तलाशनी होगी। प्रेस की चुनौतियां व्यापक हैं जिसे चंद शब्दों में बांधा नहीं जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि समाज में गैर बराबरी पर हमला बोल कर समता और न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सके इसमें प्रेस के साथ हम सब की भलाई निहित है।
 
-बाल मुकुन्द ओझा

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