महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित, जानकारों से ही तार−तार होती अस्मिता

By डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा | Publish Date: Jan 15 2019 10:15AM
महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित, जानकारों से ही तार−तार होती अस्मिता
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समाज और समाज विज्ञानियों के लिए यह गंभीर चिंतन का विषय होता जा रहा है। तस्वीर को दूसरा पक्ष भी सामने आता जा रहा है जब दुष्कर्म के नाम पर ब्लेकमेल भी आम होता जा रहा है। देश के कई कोनों में इस तरह के मामले सामने आते जा रहे हैं।

इसी माह दिल्ली पुलिस द्वारा जारी सालाना आंकड़ों ने एक बात साफ कर दी है कि महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित है तो घर या जानपहचान वालों से। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों की माने तो दुष्कर्म के 97.5 फीसदी मामलों में आरोपी कोई अनजान नहीं बल्कि पीडिता के अपने हैं। इसका सीधा−सीधा अर्थ यह निकलता है कि महिलाओं से दुष्कर्म के मामलों में केवल और केवल 2.5 फीसदी लोग ही ऐसे है जो पीडि़ता से अनजान है। हाल ही समाप्त हुए वर्ष 2018 में देश की राजधानी दिल्ली में दुष्कर्म के 2043 मामले सामने आए जिनमें से 1992 मामलों में पुलिस ने पीडित महिला के रिश्तेदारों, पड़ोसी, स्टाफ, परिजनों के दोस्त और अब नया चलन चले लिव इन के साथी ही आरोपित रहे हैं। इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा कि महिलाएं घर परिवार और कार्यक्षेत्र में ही सबसे अधिक असुरक्षित है। इससे साफ हो जाता है कि सबसे अधिक सुरक्षित माने जाने वाले स्थान ही महिला अस्मिता को सबसे अधिक तार तार करने वाले केन्द्र हैं। आखिर यह समाज का किस तरह का आईना है। आईने की इस तस्वीर को देखकर तो हमें अपने आपको सभ्य कहलाने का हक हो ही नहीं सकता। 
 
 


यह सब तो तब है जब महिला सुरक्षा को लेकर अभियान चलाया जा रहा है। दिल्ली के निर्भया काण्ड हांलाकि उसमें बाहरी तत्व थे पर उसकी प्रतिकि्रया स्वरुप जिस तरह से दिल्ली ही नहीं समूचे देश में युवा उमड़ पड़े थे, कभी कैण्डल मार्च तो कभी अन्य तरीकों से विरोध दर्शाया जा रहा था। मी टू भी नया आंदोलन नहीं है। सारी दुनिया में महिला अस्मिता को लेकर आंदोलन व जागृति का दौर देखा जा रहा है उसके बाद भी इस तरह के आंकड़े आ रहे है तो यह गंभीर चिंता का विषय है। आखिर हमारा समाज जा कहां रहा है। क्या हम आदिम व्यवस्था की और जा रहे हैं? प्रकृति से खिलवाड़ हमारी आदत में रहा है और इन परिणामों से यह साफ होता जा रहा है। प्रश्न यह उठता है कि आखिर घर परिवार या अपनो से ही नारी सुरक्षित क्यों नहीं है? कहीं हमारा सामाजिक ताना−बाना छिन्न भिन्न तो नहीं होता जा रहा है। दरअसल सामाजिकता, रिश्ते−नाते खोते जा रहे हैं। मजे की बात तो यह है किइस तरह के मामलें आये दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां बनने के बावजूद बदलाव नहीं दिख रहा है अपितु स्थितयिां आए दिन बद से बदतर होती जा रही है। 
 
कार्यस्थल पर दुष्कर्म की भी गंभीरता कम नहीं हो जाती। सरकार द्वारा कार्य स्थल पर महिला उत्पीडन रोकने के लिए सख्त कदम उठाने के साथ ही कड़े प्रावधान किए हैं। सभी संस्थानों में महिलाओं के नेतृत्व में कमेटियां बनी हुई है। मी टू अभियान के तहत सारी दुनिया में इस तरह के प्रकरणों का आए दिन खुलासा होता जा रहा है। हमारे देश में भी मीटू के मामलें सामने आते जा रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री व जाने माने पत्रकार को अपने पद से इस्तिफा देना पड़ा है। सुनहरे पर्दे के पीछे की घटनाएं भी आरोप प्रत्यारोप से सामने आती जा रही है। मजे की बात यह है कि घटनाओं के दशकों बाद इस तरह के प्रकरणों को जगजाहिर किया जा रहा है। हांलाकि यह भी सेाचनीय है।
 


 
समाज और समाज विज्ञानियों के लिए यह गंभीर चिंतन का विषय होता जा रहा है। तस्वीर को दूसरा पक्ष भी सामने आता जा रहा है जब दुष्कर्म के नाम पर ब्लेकमेल भी आम होता जा रहा है। देश के कई कोनों में इस तरह के मामले सामने आते जा रहे हैं। कुछ युवतियां संगठित गिरोह बनाकर दुष्कर्म का आरोप लगाकर पैसे एंटने भी लगी हुई है। हनी ट्रेप के मामले भी आए दिन सामने आ रहे हैं। चिंता और गंभीर बात यह है कि लिव इन में रहते रहते ना जाने कब दुष्कर्म से आरोपित हो जाए इसका पता ही नहीं। आखिर लिव इन जैसी स्थितयिों को भी कानून के दायरे में स्पष्ट करना होगा। प्रश्न यह उठता है कि आज समाज में अधिक जागरुकता आई है। गुड टच और बेड टच की जानकारियां अभियान चलाकर स्कूलों व घर पर दी जा रही है। सरकार द्वारा मीडिया के माध्यम से जागरुकता अभियान के बावजूद इस तरह की घटनाएं होना आम होता जा रहा है। मजे के लिए बहकाव में बहुत कुछ हो जाता है और फिर उसकी गंभीरता सामने आती है तब पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होती है। हांलाकि इस तरह के मामलों को बहुत कुछ डरा−धमकाकर, बहकाकर, लालच देकर, परिस्थितियों का फायदा उठाकर, भोलापन−अंज्ञानता और अन्य तरीके से अंजाम दिया जाता है। पर लिव इन के मामलों में अभी सोचने की आवश्यकता है। आखिर इसे मान्यता किस तरह से दी जाए कि इस तरह के मामलें आए तो उन्हें क्या कहा जाए। मीटू के दशकों पहले की घटनाएं भी विचारणीय है। लिव इन और दशकों पुरानी घटनाओं के पीछे की स्थितियों को भी देखना जरुरी हो जाता है। 
 


 
घर परिवार और कार्यस्थल पर दुष्कर्म और वह भी जानपहचान वालों द्वारा इस तरह की घटनाओं को अंजाम देना गंभीर है। इसका साफ साफ मतलब यह हुआ कि केवल ढ़ाई फीसदी अंजान लोगों के अपराध को कमतर नहीं आंका जा सकता पर महिलाअें के प्रति अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वालों को यह सोचना होगा कि कहीं 97.5 फीसदी लोगों में से हममें से तो कोई नहीं है। क्योंकि जिस तरह से महिला उत्पीडन के खिलाफ सारी दुनिया में आवाज पिछले एक दशक से तेज हुई है उसी गति से इस तरह के मामलें अधिक आने लगे हैं। मीडिया में शादी का झांसा देकर वर्षों संबंध बनाए रखना, डरा धमका कर या अनिष्ठ का भय दिखाकर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने के समाचार आम होते जा रहे हैं। समझौते के तहत लिव इन भी आम होता जा रहा है। बिना सोचे समझे दोस्ती का दायरा बढ़ाना भी खतरा बनता जा रहा है। समाचार पत्रों में इस तरह की घटनाएं लगभग प्रतिदिन देखने को मिल रही है इसके बावजूद समाज या यों कहें कि युवक युवतियां सबक नहीं ले रहे हैं। महिला सुरक्षा व सहायता के कानूनों की भरमार के साथ ही टोलफ्री नंबर से तत्काल सहायता की व्यवस्था होने के बावजूद इस तरह की घटनाओं का होना कहीं ना कहीं हमारे सामाजिक खोखलेपन का उजागर कर रहा है। महिलाओं को भी अधिक सजग और अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होना होगा। बहुत कुछ संभव है सजगता से इस तरह की घटनाओं को रोककर महिला अस्मिता को बचाए रखा जा सके। घर परिवार महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान बन सके। समाज विज्ञानियों को इस दिशा में गंभीर चिंतन करना होगा कि आखिर इस तरह की घटनाओं के पीछे बदलती जीवन शैली है या कुछ और। 
 
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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