'वन नेशन, वन डायलिसिस' कार्यक्रम क्या है? इसकी कितनी जरूरत है? यह कब से शुरू होगा?

Kidney Diseases
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कमलेश पांडेय । Jun 29, 2022 12:08PM
चिकित्सकों की राय है कि किडनी यानी गुर्दे की बेहतर देखभाल के लिए गुर्दे की बीमारी की रोकथाम, जल्दी पता लगाने और प्रगति को धीमा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से हर साल 10 मार्च को विश्व गुर्दा दिवस मनाया जाता है।

बीते कई वर्षों में यह देखने में सामने आया है कि लोगों में तेजी से किडनी की बीमारी बढ़ रही है। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में लगभग 85 करोड़ लोगों को किडनी की कोई न कोई बीमारी है। अकेले भारत में लगभग 10 करोड़ लोगों को क्रोनिक किडनी रोग (अपरिवर्तनीय गुर्दे की विफलता) है। इनमें से भारत में हर साल लगभग तीन लाख मरीज किडनी की बीमारी के अंतिम चरण में पहुंच जाते हैं। इसका मतलब है कि इन किडनी के मरीजों को डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है।

यही वजह है कि गत दिनों तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा कि केंद्र सरकार जल्द ही प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम के तहत 'वन नेशन, वन डायलिसिस' कार्यक्रम शुरू करेगी। इस योजना के माध्यम से कोई भी मरीज देश में कहीं से भी डायलिसिस की सुविधा प्राप्त कर सकता है। क्योंकि डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की लागत समाज के अधिकांश वर्गों के लिए सस्ती नहीं है। 

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चिकित्सकों की राय है कि किडनी यानी गुर्दे की बेहतर  देखभाल के लिए गुर्दे की बीमारी की रोकथाम, जल्दी पता लगाने और प्रगति को धीमा करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। शायद इसी उद्देश्य से हर साल 10 मार्च को विश्व गुर्दा दिवस मनाया जाता है। इसके तहत हॉस्पिटल्स के नेफ्रोलॉजी विभाग की ओर से गुर्दे की बीमारियों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस क्रोनिक किडनी रोग का प्रमुख कारण

डॉक्टर बताते हैं कि टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस क्रोनिक किडनी डिजीज का प्रमुख कारण है। टाइप-2 डायबिटीज मेलिटस के निदान के समय और टाइप वन डायबिटीज मेलिटस के निदान के पांच साल बाद गुर्दे की बीमारी के लिए एक परीक्षण करवाना महत्वपूर्ण है। इसके बाद किडनी की बीमारी का जल्द पता लगाने के लिए हर साल जांच जरूरी है। उनके मुताबिक, मधुमेह रोगियों में गुर्दे की बीमारी के मुख्य लक्षण उच्च रक्तचाप का विकास, पैरों/शरीर की सूजन का विकास, मूत्र उत्पादन में वृद्धि, विशेष रूप से रात में, दृश्य गड़बड़ी का विकास (मधुमेह रेटिनोपैथी) होना है। 

किडनी की बीमारी को लेकर जरूर कराना चाहिए टेस्ट

चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ बताते हैं कि हर वयस्क को किडनी की बीमारी की जांच कराने की जरूरत नहीं है। फिर भी कुछ उच्च-जोखिम वाले समूह हैं जिन्हें जोखिम का पता लगाने के लिए परीक्षण करवाना चाहिए। उनमें मधुमेह मेलिटस, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की पथरी की बीमारी, मोटापा, मूत्र मार्ग में संक्रमण, हृदय रोग, गुर्दे की बीमारी और मधुमेह के पारिवारिक इतिहास से पीड़ित लोगों को जरूर जांच कराना चाहिए। इन व्यक्तियों को किडनी रोग की जांच के लिए यूरिन टेस्ट और सीरम क्रिएटिनिन करवाना चाहिए।

किडनी की बीमारी से बचने के लिए यह सावधानियां बरतें

यदि किसी को गुर्दे की पथरी का निदान कराना है तो समय पर उपचार के लिए मूत्र रोग विशेषज्ञ और नेफ्रोलॉजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए। रोजाना पर्याप्त पानी (एक से दो लीटर) नहीं पीना चाहिए, जब तक कि डाक्टरों द्वारा इससे बचने के लिए कहा न जाए। ये गुर्दे की पथरी के खतरे को बढ़ा सकता है। हालांकि अतिरिक्त पानी (चार लीटर प्रति दिन से ज्यादा) पीना किडनी के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद नहीं है। उच्च नमक, उच्च चीनी और भारी रेड मीट के सेवन से किडनी स्टोन बनने का खतरा बढ़ जाता है। मोटापा गुर्दे की पथरी बनने का एक और जोखिम कारक है। 

ये है प्रोस्टेट वृद्धि और गुर्दे की बीमारी के बीच संबंध

प्रोस्टेट ग्रंथि को प्रभावित करने वाले रोग विशेष रूप से वृद्ध पुरुषों में गुर्दे की बीमारी का एक महत्वपूर्ण कारण है। प्रोस्टेट वृद्धि मूत्र पथ में रुकावट और गुर्दे की तीव्र चोट का कारण बन सकती है। प्रोस्टेट विशिष्ट एंटीजन (पीएसए) का उपयोग करके प्रोस्टेट कैंसर के लिए स्क्रीनिग 55 वर्ष की आयु से शुरू होनी चाहिए और हर दो साल में दोहराई जानी चाहिए।

तेजी से बढ़ रहे मरीजों के लिए वरदान साबित होगा डायलिसिस कार्यक्रम 

आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल एंड-स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी) के लगभग 2.2 लाख नए मरीज जुड़ते हैं, जिसके परिणामस्वरुप हर साल 3.4 करोड़ डायलिसिस की अतिरिक्त मांग होती है। वहीं, लगभग 4,950 डायलिसिस केंद्रों के साथ, भारत में बड़े पैमाने पर निजी क्षेत्र में, मौजूदा बुनियादी ढांचे के साथ मांग आधे से भी कम है। 

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चूंकि प्रत्येक डायलिसिस में लगभग ₹2000 का अतिरिक्त व्यय टैग होता है, इसके परिणामस्वरूप रोगियों के लिए सालाना 3-4 लाख रुपये का खर्च होता है। इसके अलावा, अधिकांश परिवारों को बार-बार यात्राएं करनी पड़ती हैं, और अक्सर डायलिसिस सेवाओं तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे रोगी और रोगी के साथ आने वाले परिवार के सदस्यों को भारी यात्रा लागत और मजदूरी का नुकसान होता है।

इसलिए, ऐसे रोगियों के साथ व्यवहारिक रूप से सभी परिवारों के लिए वित्तीय तबाही होती है। जीवन की गुणवत्ता में पर्याप्त लाभ और रोगियों के लिए प्रगति-मुक्त अस्तित्व के विस्तार के साथ, परिवार बड़े पैमाने पर जेब खर्च करने के लिए आर्थिक रूप से विस्तार करना जारी रखते हैं। यह महसूस किया गया है कि इस महत्वपूर्ण जीवन रक्षक प्रक्रिया के प्रावधान के संदर्भ में और रोगियों के लिए जेब से खर्च की जाने वाली दरिद्रता को कम करने के लिए, एक डायलिसिस कार्यक्रम की आवश्यकता है, जिसको पूरा करने के लिए सरकार ततपर है।

गौरतलब है कि बजट भाषण 2016-17 में केंद्रीय वित्त मंत्री ने जिला अस्पतालों में सार्वजनिक निजी भागीदारी के तहत एक राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की थी, जिस पर अब तेजी से अमल किया जाने वाला है। इससे अभावग्रस्त लोगों को राहत मिलेगी।

-कमलेश पांडेय

वरिष्ठ पत्रकार व स्तम्भकार

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