dhundhiraj chaturthi 2026: ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत से होती है सभी मनोकामनाएं पूरी

Dhundhiraj Chaturthi
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फाल्गुन का महीना बेहद पावन होता है। यह महीना देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस महीने में महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और मां पार्वती की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही महाशिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। इसके साथ ही कई अन्य प्रमुख पर्व फाल्गुन महीने में मनाए जाते हैं।

ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन गणपति बप्पा की साधना करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और बिगड़े काम भी पूरे होते हैं। इस दिन पूजा में गणेश स्तोत्र का पाठ करने से साधक को शुभ फल की प्राप्ति होती है और जीवन में खुशियों का आगमन होता है तो आइए हम आपको ढुण्ढिराज चतुर्थी व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं। 

जानें ढुण्ढिराज चतुर्थी के बारे में 

फाल्गुन का महीना बेहद पावन होता है। यह महीना देवों के देव महादेव को समर्पित होता है। इस महीने में महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और मां पार्वती की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। साथ ही महाशिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। इसके साथ ही कई अन्य प्रमुख पर्व फाल्गुन महीने में मनाए जाते हैं।

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साथ ही प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक गणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। गणेश जी को चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता माना गया है। साथ ही इन्हें बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। चतुर्थी तिथि के दिन प्रथम पूजनीय गणेश जी की उपासना करने से हर तरह के संकटों से छुटकारा मिल जाता है और ज्ञान की प्राप्ति होती है। साथ ही धन-संपत्ति में भी बढ़ोतरी होती है। फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के अगले दिन मनोरथ चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। इसके अलावा विशेष काम में सफलता पाने के लिए व्रत रख जाता है।

भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए दोनों पक्षों की चतुर्थी तिथि का व्रत किया जाता है। इनमें से शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी चतुर्थी कहते हैं। साल में कुल 12 विनायकी चतुर्थी आती है, इन सभी के अलग-अलग नाम हैं। इनमें से फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का नाम ढुण्डिराज है। इस दिन भक्तजन भगवान गणेश की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं और उनसे अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं। पंडितों के अनुसार गणेशजी की भक्ति भाव से की गई प्रार्थनाओं से सभी मनोरथ पूरे होते हैं और जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का प्रवेश होता है। 

ढुण्ढिराज चतुर्थी का शुभ मुहूर्त 

हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के अगले दिन ढुण्ढिराज चतुर्थी मनाई जाती है। इस साल शनिवार 21 फरवरी को ढुण्ढिराज चतुर्थी है। इस शुभ अवसर पर भगवान गणेश की पूजा की जाएगी। वैदिक पंचांग के अनुसार, 20 फरवरी को दोपहर 02 बजकर 38 मिनट पर फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की शुरुआत होगी। वहीं, 21 फरवरी को दोपहर 01 बजे फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का समापन होगा। सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए 21 फरवरी को विनायक चतुर्थी मनाई जाएगी।

ढुण्ढिराज चतुर्थी के दिन भक्तजन पूरे मन और श्रद्धा के साथ भगवान गणेश के सामने पूजा करते हुए अपने जीवन में खुशहाली, सफलता और मानसिक संतुलन की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन विशेष रूप से आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होता है और इसे मनाने से परिवार और व्यक्तिगत जीवन दोनों में सकारात्मक बदलाव आते हैं।

ढुण्ढिराज चतुर्थी पर ऐसे करें पूजा

पंडितों के अनुसार ढुण्ढिराज चतुर्थी का दिन बहुत खास होता है, इसलिए इस दिन विशेष पूजा करें। सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या लाल वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें, “हे ढुण्ढिराज गणेश! मैं (अपना नाम) आज आपके निमित्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत धारण कर रहा/रही हूँ। मेरे जीवन के समस्त विघ्नों को दूर कर मुझे सही मार्ग दिखाएं।” घर के मंदिर में गणेश जी की मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर) और गंगाजल से स्नान कराएं। गणपति को दूर्वा (घास) अति प्रिय है। 21 दूर्वा की गांठें अर्पित करें। सिंदूर का तिलक लगाएं और लाल फूल (गुड़हल) चढ़ाएं।

मोदक या बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। साथ ही तिल और गुड़ का नैवेद्य भी अर्पण करें। धूप-दीप जलाकर गणेश अथर्वशीर्ष या संकष्ट नाशन गणेश स्तोत्र का पाठ करें। शाम को पुनः स्नान या हाथ-पैर धोकर पूजा करें। चंद्रमा के उदय होने पर, आकाश की ओर मुख करके जल, चंदन, अक्षत और दूध का मिश्रण एक लोटे में लें। चंद्रमा को अर्घ्य देते समय यह मंत्र बोलें: “गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥”

ढुण्ढिराज चतुर्थी से जुड़ी पौराणिक कथा 

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काशी खंड की एक रोचक प्रचलित है। इस कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव काशी से दूर मंदराचल पर्वत पर रहने लगे थे। काशी नरेश दिवोदास ने कठोर तपस्या से देवताओं को काशी में प्रवेश करने से रोक दिया था। भगवान शिव काशी वापस आना चाहते थे, लेकिन राजा दिवोदास की तपस्या भंग करना आसान नहीं था। तब भगवान शिव ने गणेश जी को काशी भेजा। गणेश जी ने एक ज्योतिषी का वेश धरा और अपना नाम ‘ढुण्ढि’ बताया। उन्होंने राजा दिवोदास और प्रजा के मन में धीरे-धीरे ऐसा प्रभाव डाला कि राजा को वैराग्य हो गया और उन्होंने स्वयं ही काशी का त्याग कर दिया, जिससे भगवान शिव पुनः काशी में वास कर सके। चूंकि गणेश जी ने शिव जी के लिए काशी को पुनः ‘खोजा’ या मार्ग प्रशस्त किया, इसलिए शिव जी ने उन्हें वरदान दिया कि काशी में प्रवेश करने से पहले भक्तों को ढुण्ढिराज गणेश के दर्शन करने होंगे। इस चतुर्थी पर इसी ‘खोजने वाले’ स्वरूप की पूजा होती है।

 इसलिए मनाई जाती है ढुण्डिराज चतुर्थी 

ढुण्डिराज चतुर्थी का धार्मिक महत्व अत्यंत बड़ा है। यह पर्व भगवान गणेश के ढुण्डिराज स्वरूप की विशेष पूजा से जुड़ा है, जिन्हें भक्त अपनी सभी इच्छाओं और मनोरथों की पूर्ति करने वाला मानते हैं। मत्स्य पुराण में इसे मनोरथ चतुर्थी कहा गया है, और मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। गणेश जी को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य माना जाता है, इसलिए उनकी आराधना करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और खुशहाली आती है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जो नई शुरुआत कर रहे हैं 

धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख है कि इस व्रत से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। वाराह पुराण में इसे अविघ्नकर व्रत कहा गया है, जिसे चार महीने तक रखा जाता है और आषाढ़ में इसका उद्यापन किया जाता है। पुराणों के अनुसार, राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ की सफलता के लिए, भगवान शिव ने त्रिपुरासुर से युद्ध से पहले और भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन से पहले इस व्रत का पालन किया था। इससे स्पष्ट होता है कि यह व्रत केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि देवताओं द्वारा भी किए जाने वाला पवित्र कर्म है।

- प्रज्ञा पाण्डेय 

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