शहबाज-जरदारी के बीच बड़ी बैठक, खैबर पख्तूनवा में लगेगी इमरजेंसी?

Shehbaz
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अभिनय आकाश । Oct 2 2026 1:04PM

इमरान खान की रिहाई की मांग को लेकर पीटीआई ने 4 अक्टूबर को इस्लामाबाद मार्च का ऐलान किया है। इसके मद्देनजर केंद्र सरकार खैबर पख्तूनख्वा में खराब कानून व्यवस्था के आधार पर गवर्नर रूल या इमरजेंसी लगाने पर विचार कर रही है। बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच राजधानी इस्लामाबाद में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।

पाकिस्तान की सियासत एक बार फिर ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां सड़क का आंदोलन, सत्ता की राजनीति और सुरक्षा का सवाल तीनों एक दूसरे से टकराते नजर आ रहे हैं। एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक इंसाफ यानी पीटीआई ने 4 अक्टूबर को इस्लामाबाद मार्च का ऐलान किया है। तो दूसरी तरफ शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली संघीय सरकार खैबर पख्तून ख्वा यानी केपी में गवर्नर रूल या इमरजेंसी जैसे संवैधानिक विकल्पों पर विचार कर रही है। यानी सवाल सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन का नहीं है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान में केंद्र और एक विपक्षी दल के बीच राजनीतिक टकराव अब संवैधानिक टकराव का रूप ले सकता है। 


विवाद की शुरुआत कहां से हुई


पीटीआई ने पहले 27 सितंबर को इस्लामाबाद की तरफ मार्च का ऐलान किया था। लेकिन बाद में इसे टालकर 4 अक्टूबर कर दिया गया। पार्टी के मुताबिक इस प्रदर्शन का एक प्रमुख उद्देश्य इमरान खान की रिहाई की मांग है। इमरान खान फिलहाल जेल में है और पीटीआई लगातार उनकी रिहाई को लेकर सरकार पर दबाव बना रही है। लेकिन इस मार्च ने सिर्फ इस्लामाबाद की राजनीति को नहीं बल्कि खैबर पख्तून ख्वा की सरकार और केंद्र के रिश्तों को भी तनावपूर्ण बना दिया है। केपी में इस समय पीटीआई की सरकार है और मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी ने साफ कहा है कि 4 अक्टूबर का मार्च होगा। उन्होंने केंद्र की आतंकवाद विरोधी नीति पर भी सवाल उठाए हैं और कहा है कि पिछले वर्षों की नीति के बावजूद प्रांत में आतंकवाद खत्म नहीं हुआ। दूसरी तरफ संघीय सरकार का कहना है कि खैबर पख्तूनखवा में कानून व्यवस्था और आतंकवाद की स्थिति गंभीर है और प्रांतीय सरकार को अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। 

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गवर्नर रूल और इमरजेंसी की चर्चा 


कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने कहा अगर संविधान में निर्धारित परिस्थितियां पैदा होती हैं तो गवर्नर रूल या इमरजेंसी लागू की जा सकती है। वहीं संसदीय मामलों के मंत्री तारीख फजल चौधरी ने 30 सितंबर को कहा कि संघीय सरकार केपी में इमरजेंसी लगाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार की ओर से इसके पीछे आतंकवाद और खराब कानून व्यवस्था को प्रमुख आधार बताया जा रहा है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल भी है। इमरजेंसी को लेकर भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों का कहना कुछ और है और सरकार का कहना है कि संवैधानिक कारवाई का आधार सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिति होगी। वहीं पीटीआई इसे राजनीतिक दबाव के तौर पर देख रही है और चेतावनी दे रही है कि केपी सरकार को हटाने की कोशिश के गंभीर राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। यानी दोनों पक्ष इस पूरे घटनाक्रम को बिल्कुल अलग नजरिए से देख रहे हैं। 

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पीपीपी की राय महत्वपूर्ण 


30 सितंबर को पीपीपी के महासचिव ने कहा कि अगर संघीय सरकार गवर्नर रूल को लेकर पार्टी से राय मांगती है तो पीपीपी संविधान और कानून के दायरे में अपनी सिफारिश देगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई प्रांतीय सरकार अपनी संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियां पूरी करने में विफल रहती है तो संविधान में इसके लिए व्यवस्था मौजूद है। इसी बीच पीएमएलएन और पीपीपी नेताओं के बीच संसद में केपी की स्थिति को लेकर बातचीत भी हुई। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और पीपीपी चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी से संभावित बातचीत को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। लेकिन सरकार के सामने केवल संवैधानिक विकल्प ही नहीं है। उसके सामने सबसे बड़ी तत्काल चुनौती है 4 अक्टूबर का मार्च। इस मार्च को देखते हुए इस्लामाबाद और उसके आसपास अभूतपूर्व सुरक्षा तैयारियां की गई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक राजधानी में 22,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की तैयारी की गई है। 

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