Syamantak Mani to Kohinoor: ब्रिटेन ने कंबोडिया को वापस किए चोरी के गहने, क्या वापस आएगा कोहिनूर, क्या है इसका भगवान कृष्ण संग कनेक्शन?

Syamantak Mani to Kohinoor
Prabhasakshi
अभिनय आकाश । Feb 23 2023 2:03PM

कहा जाता है कि ये हीरा जिसके पास रहा उसका पतन ही हुआ। कोहिनूर फारसी भाषा का एक शब्द है जिसका मतलब होता है रोशनी का पहाड़। कहते हैं कि कोहिनूर जहां भी गया वहां बर्बादी मचाई। चाहे सुल्तानों की सल्तनत हो या राजाओं का राज।

ब्रिटेन ने कंबोडिया को पुराना ज्वेलरी कलेक्शन लौटा दिया है। करीब 700 साल पुराना ये ज्वेलरी कलेक्शन अंकोर वंश के शाही घराने का है। कंबोडियाई संस्कृति मंत्रालय ने कहा कि कंबोडिया से चुराए गए अंगकोरियन क्राउन ज्वैलरी के दर्जनों टुकड़े, जिन्हें जनता ने कभी नहीं देखा है, उन्हें वापस कर दिया गया है। अब इस ज्वेलरी को राष्ट्रीय म्यूजियम में प्रदर्शनी के लिए रखा जाएगा। वहीं ब्रिटेन के इस कदम के बाद से अब कोहिनूर को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है। 

ब्रिटेन ने कंबोडिया को वापस किए चोरी के गहने

कंबोडियाई मंत्रालय ने कहा कि उन्हें ब्रिटिश पुरावशेष व्यापारी डगलस लैचफोर्ड के परिवार से 77 टुकड़े मिले। संयुक्त राज्य अमेरिका में कला तस्करी के मुकदमे की प्रतीक्षा के दौरान लैचफोर्ड की 2020 में मृत्यु हो गई। उस समय उनपर अमेरिका में आर्ट ट्रैफिकिंग का मुकदमा चल रहा था। इसमें उनके परिवार ने चोरी किए गए कलेक्शन को कंबोडिया को लौटाने का वादा किया था। मंत्रालय ने एक बयान में कहा, संग्रह, जो शुक्रवार को कंबोडिया में सावधानी से पहुंचा, में "मुकुट, हार, कंगन, बेल्ट, झुमके और ताबीज सहित पूर्व-अंगकोरियन और अंगकोरियन काल के सोने और अन्य कीमती धातु के टुकड़े शामिल हैं"।

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दुनिया में हर चीज की एक कीमत होती है लेकिन एक चीज ऐसी भी है जिसकी आज तक कोई कीमत लगा नहीं पाया। ये एक हीरा है जिसका नाम है कोहिनूर। कोहिनूर का नाम तो आप सभी ने सुना ही होगा और इससे जुड़ी कई कहानियां भी सुनी होंगी। लेकिन कोहिनूर से जुड़ी एक ऐसी ही अनसुनी कहानी है जो शायद ही आपको पता है। जिस कोहिनूर को भारत की शान के तौर पर देखा जाता है। वहीं कोहिनूर ब्रिटेन के लिए शापित साबित हो रहा है। ये बात और है कि अंग्रेज हमसे हमारा कोहिनूर हीरा छीनकर ले गए लेकिन कोहिनूर कभी उनका हो नहीं पाया। 

कोहिनूर जड़ा ताज नहीं पहनेंगी कैमिला

ब्रिटेन के नए राजा बनने जा रहे किंग चार्ल्स-III की ताजपोशी के दौरान महारानी के ताज में कोहिनूर नहीं लगा होगा। किंग चार्ल्स-III की ताजपोशी के दौरान कैमिला पार्कर महारानी एलिजाबेथ का कोहिनूर जड़ा ताज नहीं पहनेंगी। बकिंगम पैलेस ने यह ऐलान किया है। ताजपोशी से करीब 3 महीने पहले शाही राज घराने ने ये फैसला लिया है। इतिहास में ऐसा पहली बार होगा जब ब्रिटेन की महारानी के ताज से कोहिनूर गायब होगा। ब्रिटिश मीडिया में कहा गया कि इसका मकसद है कि भारत से रिश्ते न बिगड़े। कहा जा रहा है कि शाही परिवार विवादों से दूर रहना चाह रहा है। वो भी ऐसे समय में जब भारत और  ब्रिटेन के संबंध अच्छे हैं तो शाही परिवार नहीं चाहता कि ताजपोशी के समय भारत के साथ किसी भी किस्म की कूटनीतिक विवाद हो। क्योंकि ये बात किसी से छुपी नहीं है कि ये नायाब हीरा भारत की विरासत है। जिसकी वापसी को लेकर भारत की ओर से समय समय पर मांग होती रही है। 

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हीरा जिसके पास रहा उसका पतन ही हुआ 

कहा जाता है कि ये हीरा जिसके पास रहा उसका पतन ही हुआ। कोहिनूर फारसी भाषा का एक शब्द है जिसका मतलब होता है रोशनी का पहाड़। कहते हैं कि कोहिनूर जहां भी गया वहां बर्बादी मचाई। चाहे सुल्तानों की सल्तनत हो या राजाओं का राज। सब खत्म हो गया। लेकिन आखिर कोहिनूर की चमक का दीदार दुनिया को सबसे पहले कब हुआ। इस सवाल की खोज हमें महाभारत काल में ले जाती है। महार्षि व्यास के लिए लिखे महाकाव्य के 56वें स्कंद के 10वें अध्याय में एक अत्यंत तेज पुंज मणि का वर्णन है। सल्तनत काल, मुगल काल और अंग्रेजों की गुलामी के दौर में सत्ता, शासन, वैभव के साथ युद्ध और छल कपट का प्रतीक रहा कोहिनूर पौराणिक काल में भी स्यमंतक मणि के रूप में अनगिनत महत्वकांक्षाओं के केंद्र में रहा। 

भगवान कृष्ण के साथ कनेक्शन 

पौराणिक मान्यताओं की मानें तो कृष्ण ने द्वारका नगरी बसाई। इसी नगरी में सतराजित यादव रहा करता था। सतराजित सूर्य का उपासक था। उसकी साधना और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भास्कर ने अपनी ही तरह प्रकाश पुंज स्यमंतक मणि दी। पौराणिक मान्यताओं की मानें तो कृष्ण ने द्वारका नगरी बसाई। इसी नगरी में सतराजित यादव रहा करता था। सतराजित सूर्य का उपासक था। उसकी साधना और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भास्कर ने अपनी ही तरह प्रकाश पुंज स्यमंतक मणि दी। मणि पाकर सत्राजित यादव जब समाज में गया तो श्रीकृष्ण ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर चढ़कर शिकार के लिए गया। वहां एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया।जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा, श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा। अतः बिना किसी प्रकार की जानकारी जुटाए उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमन्तक मणि छीन ली है। इस लोक-निंदा के निवारण के लिए श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए। रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जामवन्त की गुफा पर पहुंचे और गुफा के भीतर चले गए। वहां उन्होंने देखा कि जामवन्त की पुत्री उस मणि से खेल रही है। श्रीकृष्ण को देखते ही जामवन्त युद्ध के लिए तैयार हो गया।युद्ध छिड़ गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी सात दिन तक प्रतीक्षा की। फिर वे लोग उन्हें मर गया जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर इक्कीस दिन तक लगातार युद्ध करने पर भी जामवन्त श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका। तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह पुष्टि होने पर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। मूल रूप से ये 793 कैरेट का था। लेकिन अब ये 105.6 कैरेट का रह गया है।  

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