Georgia के Forsyth County में Shuchita Patel लड़ रहीं चुनाव, 16 साल से काबिज प्रतिद्वंद्वी को चुनौती

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अमेरिका के जॉर्जिया स्थित फोर्सिथ काउंटी में भारतीय मूल की डेमोक्रेट शुचिता पटेल कमिश्नर पद के लिए चुनाव मैदान में उतरी हैं। वह इस पद पर पिछले 16 वर्षों से निर्विरोध निर्वाचित हो रहे रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी टॉड लेवेंट के खिलाफ ताल ठोक रही हैं। नस्ली हिंसा के इतिहास वाले इस काउंटी में चुनाव लड़ने वाली वह पहली भारतीय-अमेरिकी हैं।

(विजय जोशी) कमिंग (अमेरिका), दो नवंबर अमेरिका में जॉर्जिया राज्य के उस समृद्ध इलाके में भारतीय मूल की एक अमेरिकी महिला स्थानीय नेतृत्व के एक अप्रत्याशित चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रही हैं, जहां कभी श्वेत लोगों की नस्ली श्रेष्ठता में विश्वास रखने वाले संगठन कू क्लक्स क्लान (केकेके) का दबदबा था और नस्लवाद जीवन का हिस्सा था। भारतीय-अमेरिकी महिला यह चुनाव इसलिए लड़ना चाहती है क्योंकि वह अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी की ‘धौंस’ के आगे झुकने के बजाय उसका सामना करना चाहती हैं और बच्चों के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाना चाहती हैं। डेमोक्रेट शुचिता पटेल तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव में फोर्सिथ काउंटी कमिश्नर के पद के लिए चुनाव लड़ रही हैं।

चुनाव में अब सिर्फ दो दिन बाकी हैं। ऐसे में वह रविवार सुबह मतदाताओं के घरों के दरवाजे खटखटाने निकलीं, ताकि उन्हें याद दिला सकें कि वह भी चुनाव मैदान में हैं। पटेल फोर्सिथ काउंटी से चुनाव लड़ने वाली पहली भारतीय-अमेरिकी हैं।

इस काउंटी का नस्ली हिंसा का भयावह इतिहास रहा है। वर्ष 1912 में श्वेत निवासियों और नस्ली श्रेष्ठता में विश्वास रखने वाले केकेके गिरोहों ने लगभग पूरी अश्वेत आबादी को जबरन यहां से खदेड़ दिया था। इसके बाद 20वीं सदी के अधिकांश समय तक यह काउंटी पूरी तरह श्वेत आबादी वाला क्षेत्र बनी रही।

पटेल का चुनाव लड़ना ही इस बात का संकेत है कि पिछले कुछ दशकों में फोर्सिथ और वास्तव में पूरे अमेरिका में कितना बदलाव आया है। भारतीय प्रवासी माता-पिता की अमेरिका में जन्मी बेटी पटेल ऐसे प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं, जो 16 साल से निर्विरोध निर्वाचित होता आ रहा है। हालांकि, मध्यावधि चुनाव यह भी दिखाते हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर अमेरिका किस कदर बंटा हुआ है।

एक तरफ उनके समर्थकों में उनके प्रति अटूट और लगभग अंधभक्ति जैसा लगाव है, तो दूसरी तरफ उनके प्रति गहरी नफरत का भाव है। मध्यावधि चुनाव से दो सदनों वाली अमेरिकी कांग्रेस की संरचना तय होगी, जो भारत की संसद के समान है। तीन नवंबर को प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीट और 100 सदस्यीय सीनेट की 37 सीट पर चुनाव होना है।

इन चुनावों के साथ ही कई राज्यों में गवर्नर और काउंटी कमिश्नर तथा स्कूल बोर्ड के प्रमुखों जैसे स्थानीय निकायों के कई पदों के लिए भी चुनाव होंगे। अधिकांश जनमत सर्वेक्षणों में अनुमान लगाया गया है कि ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा में अपना नियंत्रण खो देगी और संभव है कि सीनेट में भी उसे हार का सामना करना पड़े। इसकी वजह अधूरे वादों, किराने के सामान, पेट्रोल और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों तथा राजनीति को लेकर लोगों में बढ़ती निराशा है।

पटेल ने कहा, “मैं स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि मैं अपने ट्रांसजेंडर पड़ोसियों और क्षेत्र के लोगों का समर्थन करने में दृढ़ विश्वास रखती हूं। मैं अपने प्रवासी समुदाय की रक्षा करना चाहती हूं। लेकिन अगर लोग अपना राशन नहीं खरीद सकते, तो किसी को किसी की लैंगिक पहचान, आव्रजन या इस बात की परवाह नहीं है कि कोई व्यक्ति अवैध रूप से यहां रह रहा है या नहीं।’’ पटेल (40) ने एक कार में बैठकर दिए गए साक्षात्कार में यह बात कही।

उस समय वह प्रचार के लिए लातिन अमेरिकी प्रवासियों की बड़ी आबादी वाले एक गरीब इलाके की ओर जा रही थीं। उन्होंने कहा, “पूरा देश अब उबाल की स्थिति में पहुंच रहा है। एक तरफ अभिजात वर्ग, सत्ताधारी तबका और एप्स्टीन से जुड़ा रसूखदार वर्ग है... यह वास्तव में एक प्रतिशत अमीर लोगों का समूह है, जबकि दूसरी तरफ हम जैसे बाकी लोग हैं।’’ ट्रंप प्रशासन के खिलाफ गुस्से के कारण पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक रहे कई राज्यों में उसके खिलाफ माहौल बनने की उम्मीद है, लेकिन जॉर्जिया उनमें से एक नहीं है।

यह राज्य अब भी रिपब्लिकन पार्टी का मजबूत गढ़ बना हुआ है। राज्य की राजधानी अटलांटा के मिडटाउन से बमुश्किल एक घंटे की दूरी पर स्थित फोर्सिथ काउंटी में अब भी मुख्य रूप से श्वेत आबादी रहती है। यहां की 2.8 लाख आबादी में करीब 61 प्रतिशत श्वेत हैं।

उल्लेखनीय बात यह है कि वर्ष 2000 में महज 200 लोगों की आबादी वाला भारतीय समुदाय बढ़कर अब करीब 48,000 हो गया है, जो फोर्सिथ की कुल आबादी का लगभग 16 प्रतिशत है। अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली पटेल के लिए यह आंकड़ा बहुत उत्साहजनक नहीं है। फिर भी पेशे से अकाउंटेंट पटेल को लगता है कि उनके जीतने की अच्छी संभावना है।

उनका कहना है कि किसी भी पार्टी का उम्मीदवार निर्वाचित हो, कमिश्नर का उद्देश्य एक ही रहता है। मसलन, किन सड़कों की मरम्मत करानी है और किस खेल परिसर का आधुनिकीकरण करना है। इसके अलावा, उनका कहना है कि मौजूदा कमिश्नर टॉड लेवेंट को लेकर अब लोगों में नाराजगी है और लोग उनसे ऊब चुके हैं।

वह अब तक निर्विरोध निर्वाचित होते रहे हैं, क्योंकि पटेल के मुताबिक, उन्होंने चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले संभावित प्रतिद्वंद्वियों को “डराया-धमकाया और उन पर धौंस जमाई”। पटेल ने स्वीकार किया कि उन्हें राजनीति का कोई अनुभव नहीं है। उन्हें हमेशा लगता था कि हालात बदलने के लिए वह “कुछ नहीं कर सकतीं”, लेकिन फिर किसी ने उनसे संपर्क किया और चुनाव लड़ने की संभावना को लेकर उनकी राय जानी।

उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि यह ऐसा काम है जिसे मैं कर सकती हूं। मुझे लगा कि मैं अपनी दुनिया के एक छोटे से हिस्से में बदलाव ला सकती हूं। उन्होंने यह भी बताया कि मेरे प्रतिद्वंद्वी ने उनके खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत करने वाले हर व्यक्ति को डराया-धमकाया है।

उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसे व्यक्ति की जरूरत है, जो दबाव झेल सके और किसी दबंग का सामना करने से न डरे। इसलिए मैंने कहा, ‘आपको सही लड़की मिल गई है।’’’ पटेल ने बताया कि उनकी सात साल की बेटी ने उनसे पूछा कि अगर चुनाव लड़ना इतना मुश्किल है, तो वह इसके लिए मैदान में क्यों उतरी हैं। पटेल ने उसे जवाब दिया, “मैं चाहती हूं कि यह समुदाय आप सभी के लिए और बेहतर बने।

आप ऐसे खूबसूरत माहौल में बड़े हों, जहां आपको आगे बढ़ने के पूरे अवसर मिलें। मैं चाहती हूं कि आने वाली पीढ़ियों यानी आप सभी और आपके दोस्तों को एक खूबसूरत दुनिया मिले।’’

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