Venezuela तेल संकट: ट्रंप की योजना, अमेरिकी कंपनियां और चीन पर असर

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ANI
Ankit Jaiswal । Jan 4 2026 10:37PM

वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार पर नियंत्रण को लेकर अमेरिका और चीन के बीच टकराव गहरा गया है, जहाँ ट्रंप की योजना से चीन के अरबों डॉलर के निवेश पर संकट आ गया है। यह घटनाक्रम न केवल वेनेजुएला के भविष्य बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेगा।

दक्षिण अमेरिका के तेल समृद्ध देश वेनेजुएला को लेकर एक बार फिर वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में वेनेजुएला के तेल उद्योग को लेकर कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह क्षेत्र लंबे समय से पूरी तरह बर्बाद हालत में है। इसके साथ ही उन्होंने संकेत दिए हैं कि नई राजनीतिक व्यवस्था के तहत अमेरिका, अपनी बड़ी तेल कंपनियों की मदद से, वेनेजुएला के तेल क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर उसे फिर से खड़ा करने की दिशा में कदम उठाएगा हैं।

बता दें कि ट्रंप का दावा है कि अमेरिकी समर्थन मिलने के बाद वेनेजुएला का तेल उद्योग भारी मुनाफा कमा सकता है और इसके लिए अरबों डॉलर का निवेश किया जाएगा हैं। गौरतलब है कि वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार माना जाता है। सरकारी दावों के अनुसार यह भंडार करीब 300 अरब बैरल तक हो सकता है, जो सऊदी अरब से भी अधिक है। मौजूद जानकारी के अनुसार, कुछ अंतरराष्ट्रीय आकलन बताते हैं कि वैश्विक तेल भंडार का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा वेनेजुएला में हो सकता है।

हालांकि, इतनी विशाल क्षमता के बावजूद वेनेजुएला कभी भी अपने तेल उत्पादन का पूरा लाभ नहीं उठा सका है। वर्ष 1999 में जब ह्यूगो शावेज सत्ता में आए थे, तब देश करीब 35 लाख बैरल प्रतिदिन तेल उत्पादन करता था और दुनिया के शीर्ष तेल उत्पादक देशों में शामिल था। इसके उलट, आज हालात यह हैं कि खराब बुनियादी ढांचे, निवेश की कमी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक उपेक्षा के चलते उत्पादन घटकर करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया है, जबकि अमेरिका अकेले 1.3 करोड़ बैरल से अधिक तेल रोजाना निकाल रहा है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका की “बहुत बड़ी” तेल कंपनियां वेनेजुएला के जर्जर ढांचे को सुधारने के लिए आगे आएंगी। इनमें एक्सॉन मोबिल और कोनोकोफिलिप्स जैसी कंपनियों के नाम लिए जा रहे हैं, जो शावेज द्वारा उद्योग के राष्ट्रीयकरण से पहले वहां सक्रिय थीं। फिलहाल केवल शेवरॉन ही सीमित रूप में वेनेजुएला में काम कर रही है। हालांकि इन कंपनियों की ओर से अब तक किसी ठोस निवेश की सार्वजनिक पुष्टि नहीं की गई है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि नई व्यवस्था में अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए के साथ साझेदारी कर सकती हैं, जिसमें निवेश के बदले मुनाफे में हिस्सेदारी तय की जाएगी। पीडीवीएसए की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए विदेशी कंपनियों के लिए शर्तें अनुकूल हो सकती हैं। हालांकि, गौरतलब है कि इतिहास बताता है कि जबरन सत्ता परिवर्तन के बाद तेल उत्पादन को स्थिर होने में लंबा समय लगता है, जैसा कि लीबिया और इराक के उदाहरणों में देखा गया है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ता दिख रहा है। बता दें कि वेनेजुएला का लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल चीन को जाता है, जो वहां दिए गए पुराने कर्ज की भरपाई के रूप में भेजा जाता रहा है। अनुमान है कि चीन ने 2007 से 2016 के बीच वेनेजुएला को करीब 105 अरब डॉलर तक की वित्तीय मदद दी थी। अब अगर अमेरिका तेल उद्योग पर नियंत्रण स्थापित करता है, तो चीन के लिए सस्ती ऊर्जा आपूर्ति और कर्ज वसूली दोनों पर असर पड़ सकता है।

चीनी विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे एक संप्रभु देश के खिलाफ बल प्रयोग करार दिया है। वहीं बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों पर इसका कोई बड़ा और स्थायी असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, प्रतिबंधों में ढील और राजनीतिक अस्थिरता के कारण बाजार में अस्थायी उतार-चढ़ाव संभव है।

ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार, अगर वेनेजुएला को फिर से अपने स्वर्णिम तेल उत्पादन दौर में लौटना है, तो इसके लिए दशकों तक लगातार निवेश और पश्चिमी तेल कंपनियों की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता जरूरी होगी। यानी तेल उत्पादन की बहाली संभव तो है, लेकिन यह एक लंबी और जटिल प्रक्रिया होने वाली है।

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