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भक्तों के ठुमकों के बीच बप्पा की पीड़ा (व्यंग्य)

By देवेन्द्रराज सुथार | Publish Date: Sep 12 2018 4:43PM

भक्तों के ठुमकों के बीच बप्पा की पीड़ा (व्यंग्य)
Image Source: Google
भारत एक आस्था प्रदान देश है। यहां आस्था का सीधा-सा संबंध उत्सव और त्योहारों से है। एक त्योहार खत्म नहीं हुआ कि दूसरा त्योहार तैयार मिलता है। अब कृष्ण जन्माष्टमी का जोश खत्म ही नहीं हुआ था कि गणेशोत्सव आ गया। गणेशोत्सव यानी भगवान मंगलमूर्ति सिद्धिविनायक गणनायक गणेश का हैप्पी बर्थडे। हर साल बप्पा के जन्मदिन को लेकर पूरे भारत में धूम मची रहती है। हर गांव-गली में बप्पा के मंडप सजने लगते हैं। विगत के सालों में गणेशोत्सव को लेकर कई परिवर्तन भी देखने को मिले हैं। पहले केवल चतुर्थी के दिन ही गणेशोत्सव मनाया जाता था। लेकिन, अब तो गणेशोत्सव सप्ताह-सप्ताह भर मनाया जाता है। 
 
बप्पा को लाने के लिए भक्तों का हुजूम डीजे की धुनों पर रवाना होता है और पूरे शहर में नाचते हुए बप्पा को बड़ी ही श्रद्धा के साथ विराजित करता है। रात-रातभर कानफोडू म्यूजिक व गानों की भक्ति सरिता बहती है। ''आज की पार्टी मेरी तरफ से'' गाने पर मोहल्ले की अस्सी वर्षीय दादी को नचाया जाता है। मुंह में दांत नहीं, पेट में आंत नहीं, भरे बुढ़ापे में दादी मदहोश होकर बड़ा जबरदस्त नाच भी दिखाती है। इधर, दादाजी कहां पीछे रहने वाले है “तू मेरी रानी, मैं तेरा राजा” गाने पर वे भी खूब नाचते हैं। इस नाचने-कूदने के बीच बप्पा की पीड़ा कोई नहीं जान पाता। यदि बप्पा मूर्ति की जगह खुद बैठे होते तो उठकर इन भक्तों के गाल पर आशीर्वाद जरूर देते। तमाशा बना दिया है कमबख्तों ने। जितने ही हर्षोल्लास के साथ लाते हैं, उतने ही धूमधाम के साथ तालाब के मटमैले पानी में मुझे आत्महत्या करवाने के लिए धकेल देते हैं। मेरी एक नहीं सुनते ! लाते समय भी पूरे जोश में अपने नृत्य का भोंडा प्रदर्शन दिखाते हैं और विसर्जित करते वक्त भी दमखम से नाचते हैं। उन्हें देखकर तो लगता है कि गणेशोत्सव नहीं डांस कम्पटीशन में भाग ले रहे हैं। 
 
लेकिन, इन सबके बीच वे मेरी पीड़ा से अनभिज्ञ रहते हैं। मेरा विसर्जन करने की क्या आवश्यकता है? ऐसे तमाम सवाल बप्पा के मन ही मन में चुभते हैं। ये भक्त भी कमाल, धमाल और बेमिसाल है। ये बप्पा को विसर्जित करने लेकर जाते समय यह भी कहेंगे ''तू अगले बरस जल्दी आना।'' बढ़ते जुलूस के साथ बप्पा की धड़कनें बेहताशा तेज होती जाती हैं। काश, बप्पा भी मोदीजी की तरह 'मन की बात' कह पाते तो अवश्य ही अपनी ऐसी विदाई को लेकर भक्तों को जरूर डांटते। यह भी कहते कि भक्तजनों मेरे साथ ही ऐसा सलूक क्यों? सृष्टि पर 33 करोड़ देवी-देवता हैं, उन्हें भी तो मौका दो। बप्पा यह सब कहते हुए तालाब, नाले व नदी को सौंप दिये जाते हैं। म्यूजिक जारी रहता है। भक्तों के ठुमकों में जरा भी परिवर्तन नहीं आता। घर तक बप्पा की विदाई का जश्न चालू रहता है। 
 
-देवेन्द्रराज सुथार

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