कैसे की जाती है सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति? कॉलेजियम सिस्टम, प्रोमोशन से लेकर योग्यता तक विस्तार से जानें

Supreme Court
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अभिनय आकाश । Sep 24, 2022 4:52PM
संविधान के अनुच्छेद 124(2) और 217 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं। नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम के साथ परामर्श पर की जाती है।

भारतीय न्याय व्यवस्था में थ्री लेयर कोर्ट सिस्यम है- सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और लोअर कोर्ट।  जिस व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियां की जातीं हैं उसे “कॉलेजियम सिस्टम” कहा जाता है। ऐसे में आज आपको हम बताएंगे कि न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है, कॉलेजियम प्रणाली कैसे बनी और इसकी आलोचना क्यों की गई है? सबसे पहले शुरुआत थोड़ा बेसिक से करते हैं, जिससे आपको आगे पूरे मामले को समझने में आसानी हो। कोर्ट में दो तरह के मामले होते हैं- सिविल और क्रिमनल।

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सिविल यानी दीवानी मामले जिसमें क्षतिपूर्ति की मांग की जाती है। जमीन, जायदाद, पद संबंधित के साथ ही धार्मिक या इसी तरह का मामला भी हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी ने अगर आपकी जमीन पर कब्जा कर लिया। आप कोर्ट से मांग कर सकते हैं कि आपकी जमीन से कब्जा हटवाया जाए। इसके साथ ही जितने वक्त तक जमीन पर कब्जा है उसका मुआवजा भी दिलाया जाए। यानी आपकी जमीन पर कब्जा है उसका मुआवजा भी मिले और उसे हटवाया भी जाए। ये हो गया सिविल मामला। एक और जरूरी बात ये भी है कि सिविल के मामले में आप सीधे कोर्ट जा सकते हैं। 

क्रिमिनल मामले- इसे हिंदी में फौजदारी मामले भी कह सकते हैं। ये ऐसे मामले होते हैं जिनमें दंड की मांग की जाती है। पिछले उदाहरण से ही समझते हैं। आप अपनी जमीन के कब्जे और मुआवजे से संतुष्ट नहीं हैं। आप मांग करते हैं कि जिस व्यक्ति ने आपकी जमीन पर कब्जा किया है उसे दंड मिले, उसे जेल में डलवाया जाए। इसकी सुनवाई क्रिमिनल केस के तहत होगी। लेकिन जरूरी बात ये है कि क्रिमिनल मामले में आप सीधे कोर्ट नहीं जा सकते हैं। पहले एफआईआर दर्ज करानी होती है उसके बाद ही मामले की सुनवाई होती है। 

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जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली क्या है?

 ये वह तरीका है जिसके द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण किया जाता है। कॉलेजियम प्रणाली संविधान या संसद द्वारा प्रख्यापित किसी विशिष्ट कानून में निहित नहीं है। यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम एक पांच सदस्यीय निकाय है, जिसका नेतृत्व भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) करते हैं और उस समय अदालत के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं। उच्च न्यायालय के कॉलेजियम का नेतृत्व वर्तमान मुख्य न्यायाधीश और उस अदालत के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीश करते हैं। कॉलेजियम की संरचना बदलती रहती है और इसके सदस्य केवल उस समय के लिए सेवा करते हैं जब वे सेवानिवृत्त होने से पहले बेंच पर वरिष्ठता के अपने पदों पर रहते हैं। उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होती है, और सरकार की भूमिका तब होती है जब कॉलेजियम द्वारा नाम तय किए जाते हैं। उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा नियुक्ति के लिए अनुशंसित नाम सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा अनुमोदन के बाद ही सरकार तक पहुंचते हैं।

नियुक्ति पर संविधान क्या कहता है?

संविधान के अनुच्छेद 124(2) और 217 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित हैं। नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कॉलेजियम के साथ परामर्श पर की जाती है। लेकिन संविधान इन नियुक्तियों के लिए कोई प्रक्रिया निर्धारित नहीं करता है। कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर जज होते हैं। ही कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट के साथ राज्यों के हाईकोर्ट के न्यायधीशों की नियुक्ति की भी सिफारिश करता है। कॉलेजियम की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति द्वारा इनकी नियुक्ति की जाती है। इसकी चर्चा अनुच्छेद 124 (2) में की गई है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का परामर्श इस नियुक्ति में अहम माना जाता है। 217 (1) इसमें हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में चर्चा की गई है। 

नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली कैसे विकसित हुई?

कॉलेजियम सिस्टम का भारत के संविधान में कोई जिक्र नही है। यह सिस्टम 28 अक्टूबर 1998 को 3 जजों के मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के जरिए प्रभाव में आया था। कॉलेजियम सिस्टम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जजों का एक पैनल जजों की नियुक्ति और तबादले की सिफारिश करता है। कॉलेजियम की सिफारिश (दूसरी बार भेजने पर) मानना सरकार के लिए जरूरी होता है।

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फर्स्ट जज मामला 1981: एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ', 1981 में सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत के फैसले से यह माना कि सीजेआई की प्रधानता की अवधारणा वास्तव में संविधान में निहित नहीं थी। यह माना गया कि उच्च न्यायालय में नियुक्ति का प्रस्ताव अनुच्छेद 217 में उल्लिखित किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी से हो सकता है और जरूरी नहीं कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से ही हो। कहा गया कि ठोस तर्क या कारण के आधार पर राष्ट्रपति, चीफ जस्टिस की सिफारिश दरकिनार कर सकते हैं। इस फैसले ने न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर कार्यपालिका को शक्तिशाली बना दिया. ये स्थिति 12 साल तक रही।

सेकेंड जज मामला: 'द सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' 1993 में नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 'एसपी गुप्ता' के फैसले को पलट दिया और उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के लिए 'कॉलेजियम सिस्टम' नामक एक विशिष्ट प्रक्रिया तैयार की। फैसले में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और दो वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम ये नियुक्तियां करेगा।

थर्ड जज मामला: 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने "परामर्श" शब्द के अर्थ पर संविधान के अनुच्छेद 143 (सलाहकार क्षेत्राधिकार) के तहत सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रपति का संदर्भ जारी किया। सवाल यह था कि क्या सीजेआई की राय बनाने में "परामर्श" के लिए कई न्यायाधीशों के साथ परामर्श की आवश्यकता है, या क्या सीजेआई की एकमात्र राय अपने आप में एक "परामर्श" हो सकती है। जवाब में, सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्तियों और तबादलों के लिए कोरम के कामकाज के लिए नौ दिशानिर्देश निर्धारित किए। यह कॉलेजियम का मौजूदा रूप बन गया है, और तब से प्रचलित है। जिसके बाद कॉलेजियम में बदलाव किए गए जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ति वाले कॉलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के अलावा सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीश सदस्य होंगे। 

कैसे करता है काम

कॉलेजियम वकीलों या जजों के नाम की सिफारिस केंद्र सरकार को भेजती है। इसी तरह केंद्र भी अपने कुछ प्रस्तावित नाम कॉलेजियम को भेजती है। केंद्र के पास कॉलेजियम से आने वाले नामों की जांच/आपत्तियों की छानबीन की जाती है और रिपोर्ट वापस कॉलेजियम को भेजी जाती है। सरकार इसमें कुछ नाम अपनी ओर से सुझाती है। कॉलेजियम केंद्र द्वारा सुझाव गए नए नामों और कॉलेजियम के नामों पर केंद्र की आपत्तियों पर विचार करके फाइल दुबारा केंद्र के पास भेजती है। कॉलेजियम की सिफारिश दूसरी बार भेजने पर सरकार के लिए मानना जरूरी होता है। कॉलेजियम की स्थापना सुप्रीम कोर्ट के 5 सबसे सीनियर जजों से मिलकर की जाती है।

वर्षों से इन चिंताओं पर बहस कैसे हुई है?

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (1998-2003) की भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने यह जांचने के लिए न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया आयोग की नियुक्ति की थी कि क्या कॉलेजियम प्रणाली को बदलने की आवश्यकता है। आयोग ने सिफारिश की कि सीजेआई के परामर्श से एक राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें सीजेआई और सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, भारत के कानून मंत्री और जनता से एक प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हों, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा चुना जाएगा। एनजेएसी का निर्माण नरेंद्र मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में से एक था, और संविधान संशोधन और एनजेएसी अधिनियम को लोकसभा द्वारा तेजी से मंजूरी दी गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में ग्रुप पेटीशन फाइल की गई, जिसमें तर्क दिया गया कि संसद द्वारा अधिनियमित कानून न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर करता है और संविधान की मूल संरचना का भी उल्लंघन है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने उस संवैधानिक संशोधन को असंवैधानिक करार दिया, जिसमें एनजेएसी बनाने की मांग की गई थी। खंडपीठ ने प्रस्तावित प्रणाली के भाग्य को 4:1 बहुमत के फैसले के साथ खारिज कर दिया। कहा गया था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली द्वारा की जाती रहेगी। 17 अक्टूबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने 'सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन एंड अदर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' (सेकंड जजेज केस) में फैसले की समीक्षा करने की याचिका को  9,071 दिनों की अत्यधिक देरी के आधार पर खारिज कर दिया। -अभिनय आकाश

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