444 दिन तक सुपर पावर को घुटनों पर ला खड़ा किया, जब ईरान ने दुनिया को दिखाई अपनी जुर्रत, इस तरह अमेरिका बना उसका कट्टर दुश्मन

तेहरान में अमेरिकी नागरिकों, राजदूतों और कर्मचारियों को परेड कर ले जाया जा रहा था। पीछे भीड़ उनकी मौत के नारे लगा रही थी। पूरी दुनिया यह नजारा देख रही थी, सुपर पावर अमेरिका को ईरान ने घुटनों पर ला दिया था।
4 नवंबर 1979 अमेरिका के विदेश मंत्रालय में टेलीफोन की घंटी बजती है। फोन ईरान के अमेरिकी दूतावास से था और कॉल पर ऑफिसर एलिजाबेथ स्विफ्ट थी। एक ही सांस में उन्होंने कहना शुरू किया कि ईरानियों ने हमला कर दिया है। भीड़ दीवार फांद कर अंदर घुस रही है। दूतावास पर कभी भी कब्जा हो सकता है। स्विफ्ट अभी फोन पर ही थी, तभी ईरानियों ने दूतावास की पहली मंजिल में आग लगा दी। सभी कर्मचारी बाहर की तरफ भागे। दूतावास के स्टाफ को मेन गेट खोलना पड़ा। फोन कटने से पहले स्विफ्ट के आखिरी शब्द थे- वी आर गोइंग। डाउन दूतावास तबाह होने वाला था। अगले कुछ मिनटों में अमेरिकी डिप्लोमेट्स और कर्मचारियों को बंधक बना लिया गया। उनकी आँख पर पट्टी बांध दी गई। ना उन्हें कुछ देखने की इजाजत थी ना ही कुछ बोलने की। यह खबर जैसे ही अमेरिका तक पहुंची पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गई। राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर पल-पल की खबर ले रहे थे। कुछ देर बाद अचानक उनकी नजर टीवी स्क्रीन पर पड़ी जो नजारा दिखा उसने दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी। तेहरान में अमेरिकी नागरिकों, राजदूतों और कर्मचारियों को परेड कर ले जाया जा रहा था। पीछे भीड़ उनकी मौत के नारे लगा रही थी। पूरी दुनिया यह नजारा देख रही थी, सुपर पावर अमेरिका को ईरान ने घुटनों पर ला दिया था।
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तेल का खेल और ब्रिटेन-अमेरिका की नजर
1953 से ईरान में तेल की खोज हुए लगभग आधी सदी बीत चुकी थी सा खेल तेल का ही था तेल जिसे देख अमेरिका और ब्रिटेन की लार टपक रही थी दुनिया भर में इन दो देशों की रंगबाजी उस वक्त भी टाइट थी जल्द ही इन पेट्रोलियम भंडारों पर अमेरिका और इंग्लैंड की कंपनियों का कब्जा हो गया फिर 1951 में ईरान में हुए इलेक्शन प्रधानमंत्री बने मोहम्मद मोसादेक की पढ़ाई भले ही यूरोप में हुई थी लेकिन इंसान वो राष्ट्रवादी सोच के थे लंबे वक्त से तेल इंडस्ट्री पर अमेरिका का कब्जा था जिसकी वजह से से ईरान को हो रहा था नुकसान मोसादेक ने प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले तेल इंडस्ट्री के राष्ट्रीयकरण का ऐलान कर दिया। मतलब यह कि तेल इंडस्ट्री पर ईरानी सरकार का कंट्रोल हो गया। मोसादेक का यह फैसला अमेरिका और इंग्लैंड को कांटे की तरह चुभने लगा। जब दाल गलने बंद हुई तो अमेरिका ने इंग्लैंड के साथ मिलकर रच डाली एक साजिश अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई6 ने अपने रास्ते के कांटे मोसादेक को हटाने की योजना बनाई।
लिखी गई तख्तापलट की स्क्रिप्ट
मोसादेक के खिलाफ ईरान में बगावत भड़का कर तख्ता पलट करवाना था और उनकी जगह पर बिठाना था एक ऐसा शख्स जो अमेरिका और इंग्लैंड की कठपुतली हो साथ ही दोनों देशों की जेब का भी ध्यान रखें। मोसादेक के खिलाफ हवा चलने लगी। सन 1953 में एक रात उन्हें घर से गिरफ्तार कर लिया गया। मूसादेक पर मुकदमा चला उन्हें जीवन भर के लिए अपने घर पर नजर बंद कर दिया गया। मोसादेक का तख्ता पलट हो चुका था। तख्ता पलट के बाद अगस्त 1953 में ईरान की गद्दी पर बैठे मोहम्मद रजा शाह पहलवी शाह पूरी तरह से अमेरिका और इंग्लैंड की कठपुतली साबित हुए लाखों डॉलर विदेशी सहायता के बदले उन्होंने फिर से ईरान की तेल इंडस्ट्री दोनों देशों को सौंप दी। ईरान के करीब 80 फीदी तेल भंडार पर अमेरिका और ब्रिटेन का दोबारा कब्जा हो गया।
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अमेरिका को कैसे ईरान ने सिखाया इतिहास का सबसे बड़ा सबक
1 अप्रैल 1979 को ईरान को एक इस्लामिक रिपब्लिक घोषित कर दिया गया। लेकिन खुमैनी का बदला अभी पूरा नहीं हुआ था वह शाह पहलवी को सबक सिखाना चाहते थे साथ ही अमेरिका को भी अब अमेरिका को क्यों क्योंकि शाह कैंसर का इलाज कराने के बहाने ईरान से भागकर अमेरिका चले गए थे उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे जिमी कार्टर ईरान ने अमेरिका से शाह को लौटाने के लिए कहा लेकिन अमेरिका ने ऐसा करने से मना कर दिया क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच डिप्लोमेटिक रिलेशंस खत्म हो चुके थे पर खुमैनी को बदला लेना ही था। 4 नवंबर 1979 को वह दिन भी आ गया सुबह-सुबह एक भीड़ अमेरिकी दूतावास की तरफ बढ़ने लगी। यह प्रदर्शनकारियों की भीड़ थी। इस भीड़ को खुमैनी का मौन समर्थन प्राप्त था। देखते ही देखते सभी डिप्लोमेट्स और कर्मचारियों को बंदी बना लिया गया जो संख्या में 66 थे।
ऑपरेशन भी हुआ फेल
दोनों खेमें अपनी-अपनी रणनीति बना रहे थे कि तभी फिल्मी स्टाइल में एक ऑपरेशन को अंजाम दिया गया जिन दिनों ईरान में यह हॉस्टेस क्राइसिस चल रहा था उन्हीं दिनों कनाडा से एक फिल्म क्रू ईरान में शूटिंग के लिए आया हुआ था वह लोग स्टार वस की तर्ज पर एक फिल्म बना रहे थे जिसके कुछ सींस की शूटिंग तेहरान में होनी थी। क्रू कुछ दिन ईरान में रुककर वापस चला गया दो महीने बाद ईरान को पता चला कि असल में उनके साथ तो खेल हो गया है फिल्म के नाम पर छह अमेरिकी ईरान से भाग निकले। इस ऑपरेशन की सफलता के बावजूद 52 अमेरिकी नागरिक अभी भी ईरान में फंसे हुए थे। इन्हें छुड़ाने के लिए प्रेसिडेंट जिमी कार्टर ने सारे दांव पेज खेल डाले लेकिन ईरान टस से मस नहीं हुआ अमेरिका ने तेल की इंपोर्ट पर रोक लगा दी। अमेरिका में ईरान के सारे 183 डिप्लोमेट्स को हटा दिया गया। अमेरिका ने जब सैन्य कारवाई की धमकी दी तो ईरान ने पलटकर खुद चेतावनी दे डाली कि अगर ऐसा किया तो सभी बंधकों को अमेरिकी दूतावास में आग लगाकर मार डालेंगे। 1980 में जिमी कार्टर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हार गए और रोनाल्ड रेगन नए राष्ट्रपति बने अमेरिका ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस का दरवाजा खटखटाया 24 मई 1980 को कोर्ट ने कहा कि ईरान बंधकों को रिहा करें बदले में अमेरिका भी ईरान की जब्त की गई संपत्ति को वापस लौटाए। 1980 को खुमैनी ने कुछ शर्तों के साथ बंधकों की रिहाई कबूल की अब उनकी शर्तें थी पहली अमेरिका शाह की सारी संपत्ति ईरान को लौटाए दूसरी ईरान पर वह किसी भी तरह का दावा नहीं करेगा तीसरी अमेरिका में जब्त की गई ईरान की संपत्ति वापस की जाएगी और चौथी अमेरिका ईरान में किसी भी तरह का हस्तक्षेप ना करने की गारंटी देगा। खुमैनी की शर्तों को मानने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया और 20 जनवरी 1981 को अमेरिकी बंधकों को ईरान ने छोड़ दिया इस तरह पूरे 444 दिन चलने के बाद ईरान हॉस्टेस क्राइसिस खत्म हुआ। ईरान अमेरिका रिलेशन के इतिहास में यह घटना बहुत मायने रखती है इस घटना के बाद ईरान अमेरिका का दुश्मन बन गया।
अब क्या हो रहा है?
ईरान पिछले करीब 2025 दिन से उबल रहा है। देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली हुसैनी खमेई के खिलाफ लाखों लोग सड़क पर हैं। हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। ट्रंप भी दखल दे चुके हैं। मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के बाद मेक ईरान ग्रेट अगेन की बात करते हुए अमेरिका प्रदर्शनकारियों के साथ आ गया है। खुद ईरान के राष्ट्रपति मसूद पर शेखियान प्रदर्शनकारियों के समर्थन में बयान दे रहे हैं। इसके बावजूद ईरान में कोई तख्ता पलट नहीं हो पाया है और अभी दूर-दूर तक इसके आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं। तो सवाल है कि क्यों? आखिर ईरान में अयातुल्लाह अली खमेई के खिलाफ चल रहा प्रदर्शन इतना घातक क्यों नहीं हो पा रहा कि खामनेई को झुकना पड़े।
ईरान में कैसे बिगड़े हालात
साल 2024 की शुरुआत से ही ईरान के लोग बढ़ती महंगाई, रियाल की गिरती कीमतें,बिजली और गैस की बाधित होती सप्लाई से परेशान होना शुरू हो गए थे। पानी की भी किल्लत हो गई थी। जिसने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। बची खुची कसर अमेरिका और ईरान के झगड़े के दौरान पूरी हो गई जब अमेरिकी हमले में ईरान का न्यूक्लियर प्लांट तबाह हो गया और फिर सितंबर 2025 में वो हो गया जिसका ईरान को कभी अंदाजा भी नहीं था। सितंबर 2025 में ईरान पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने वह सभी पुराने प्रतिबंध फिर से लागू कर दिए जिन्हें साल 2015 में ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने पूरी तरह से हटा दिया। दिसंबर के शुरुआत होते-होते ईरान की मुद्रा रियाल ऐतिहासिक तौर पर नीचे चली गई। इसके बाद तो ईरान आर्थिक तौर पर ऐसा कमजोर हुआ कि वहां के लोग ही सड़क पर उतर आए। इसकी शुरुआत हुई 28 दिसंबर 2025 को ईरान की राजधानी तेहरान से जहां दुकानदारों ने ग्रैंड बाजार में प्रदर्शन शुरू किया और इसे शुरू किया ईरान के बाहर से आए इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचने वाले दुकानदारों ने जिन्हें गिरते हुए रियाल की कीमत की वजह से बेहद महंगे दाम पर सामान खरीदना पड़ा। ऐसे में उन्होंने दुकानें बंद कर दी। हड़ताल शुरू की और दूसरे लोगों को भी इस प्रदर्शन में शामिल होने को कहा। फिर तो आंदोलन यूनिवर्सिटी तक पहुंच गया। हालांकि शुरुआत में यह प्रदर्शन बेहद छोटे स्तर के थे। इसमें सरकार विरोधी नारों के बीच एक और नारा उछलना शुरू हुआ। नीदर गाज़ा नॉर लेबनान माय लाइफ और ईरान। नारा इसलिए उछला था क्योंकि इजराइल और गजा के बीच चल रहे संघर्ष में ईरान ने खुद को भी शामिल कर लिया था।
ईरान के बाहर प्रदर्शनकारियों का नेता कौन है?
एक नाम है जो मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए ईरान के लोगों से संवाद कर रहा है। वो नाम है रजा पहलवी का। रजा पहलवी ईरान के सुल्तान रहे रजा शाह पहलवी के बेटे हैं। 1979 में जब इस्लामिक क्रांति हुई तो आंदोलन के दौरान यही रजा शाह पहलवी ईरान छोड़कर भाग गए थे। उस वक्त रजा पहलवी अमेरिका में थे और लड़ाकू जहाज उड़ाने की ट्रेनिंग ले रहे थे। उनके पिता के तख्ता पलट के बाद ही अयातुल्लाह खुमैनी ने ईरान पर अपना शासन शुरू किया था। रजा पहलवी इन्हीं रजा शाह पहलवी के बेटे हैं जो अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं। वह अमेरिका में रहकर ही ईरान नेशनल काउंसिल चला रहे हैं। अमेरिका भी रजा पहलवी को चाहता है और रजा को इजराइल का भी समर्थन है।
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