डोनाल्ड, सेना और वो 9 रास्ते जो उड़ा देंगे होश! मिडटर्म चुनाव में Trump हारे तो क्या होगा?

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, जहां हार मिलने पर प्रशासन के खिलाफ जांच और महाभियोग का खतरा बढ़ जाएगा। वहीं, विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि परिणाम प्रतिकूल रहने पर ट्रंप द्वारा चुनावी प्रक्रिया को चुनौती दी जा सकती है, जिससे अमेरिका में गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक संकट खड़ा हो सकता है।
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सामने एक ऐसा चुनावी इम्तिहान जिसका असर सिर्फ उनकी पार्टी की हार या जीत तक सीमित नहीं रहने वाला। 3 नवंबर को होने वाले मिड टर्म इलेक्शन में अगर रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान हुआ तो ट्रंप के लिए कांग्रेस में अपने फैसलों को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। उनके प्रशासन के खिलाफ जांच शुरू हो सकती है। लेकिन इस चुनाव से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर नतीजे ट्रंप के खिलाफ गए तो क्या वो उन्हें स्वीकार करेंगे? और अगर चुनावी नतीजों को चुनौती दी गई तो क्या अमेरिका में राजनैतिक संकट पैदा हो सकता है? अंतरराष्ट्रीय मामलों पर रिसर्च करने वाली संस्था चार्टम हाउस में पब्लिश्ड आर्टिकल में इसी आशंका पर चर्चा की गई। इसमें बताया गया कि चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ने और नतीजों को चुनौती देने की स्थिति का असर सिर्फ नवंबर के चुनाव तक सीमित नहीं रह सकता बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव तक दिखाई दे सकता है। लेकिन पहले समझते हैं कि यह चुनाव ट्रंप के लिए इतने अहम क्यों हैं।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर चुनाव
अमेरिका में 3 नवंबर का हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों और सिनेट की 35 सीटों पर चुनाव होना है। फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी के पास कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत है। अगर डेमोक्रेट्स इनमें से किसी एक सदन में भी बहुमत हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप के लिए अपने बाकी कार्यकाल में फैसले लेना पहले जितना आसान नहीं रहेगा। अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन राष्ट्रपति के 4 साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इनमें अक्सर राष्ट्रपति की पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सिर्फ दो मिड टर्म इलेक्शन ऐसे रहे जब कांग्रेस को नियंत्रित करने वाली पार्टी ने अपनी सीटें नहीं गवाई। पिछले पांच मिड टर्म इलेक्शन में कम से कम एक सदन का नियंत्रण भी बदल चुका है। यानी सत्ता में बैठी पार्टी के लिए चुनावी नुकसान कोई असामान्य बात नहीं है। इस बार भी चुनावी अनुमान में डेमोक्रेट्स की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। कुक पॉलिटिकल रिपोर्ट के संस्थापक चार्ली कुक के अनुमान के मुताबिक डेमोक्रेट्स हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पांच से 15 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर सकते हैं। हालांकि सीनेट की तस्वीर ज्यादा अनिश्चित है। वहां बहुमत हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को कम से कम चार सीटों का शुद्ध फायदा चाहिए। अगर हाउस डेमोक्रेट्स के नियंत्रण में चला गया तो ट्रंप प्रशासन के खिलाफ संसदीय जांच का रास्ता खुल सकता है। ट्रंप के कारोबारी हितों, उनके परिवार से जुड़ी कंपनियों में विदेशी सोवरीन, वेल्थ फंड के निवेश और कठित पे टू प्ले व्यवस्था जैसे मुद्दों की जांच हो सकती है। यानी क्या राजनैतिक पहुंच के बदले किसी कारोबारी या निवेशक को फायदा मिला? यह जांच के संभावित विषय हैं। साबित हो चुके आरोप नहीं है। इसके अलावा हाउस में ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। हालांकि महाभियोग का प्रस्ताव लाना और राष्ट्रपति को पद से हटाना अलग-अलग बातें हैं।
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1. वोटिंग मशीनों पर फिर सवाल, क्या हाथों से होगी वोटों की गिनती?
अमेरिका में मिडटर्म चुनावों से पहले वोटिंग मशीनों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर बहस गरमा गई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बिना किसी पुख्ता सबूत के चुनावी प्रणाली पर धांधली के आरोप लगाए हैं। जून में कैलिफोर्निया के चुनाव में जब उनके पसंदीदा उम्मीदवार पिछड़ते दिखे, तो उन्होंने वहां की पूरी व्यवस्था को "रिग्ड" (धांधली से भरा) बता दिया था। अब उनके कई करीबी सहयोगी वोटिंग मशीनों पर पूरी तरह रोक लगाने और मतपत्रों की हाथों से गिनती (Hand Counts) कराने की मांग कर रहे हैं।
क्या बन सकते हैं हालात?
चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आते हैं, तो मशीनों में खराबी या फर्जी वोटों के दावों का सहारा लिया जा सकता है। इसका सीधा मकसद चुनाव परिणामों को कानूनी तौर पर चुनौती देना और दोबारा हाथों से गिनती कराने के लिए दबाव बनाना होगा।
विशेषज्ञों की क्या है राय?
चुनावी विश्लेषकों और तकनीकी जानकारों के अनुसार, मशीनों के मुकाबले हाथों से वोटों की गिनती करना न सिर्फ बेहद धीमा है, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी कमज़ोर है और इसमें मानवीय गलतियों की आशंका ज्यादा रहती है। हालांकि मशीनों में कुछ तकनीकी खामियां हो सकती हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया है कि इन खामियों के जरिए वोटों में कोई फेरबदल किया गया हो।
असर क्या हो सकता है?
सबसे बड़ा खतरा वोटों की गिनती के दौरान भ्रम फैलने का है। इस तरह के आरोप सोशल मीडिया और खबरों के जरिए बेहद तेज़ी से फैलते हैं। भले ही बाद में जांच में ये दावे पूरी तरह गलत साबित हों, लेकिन तब तक ये नतीजों को अदालतों में उलझाने और चुनावी प्रक्रिया पर से जनता का भरोसा डिगाने के लिए काफी होते हैं।
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2. क्या चुनाव अधिकारियों पर नतीजों को बदलने या रद्द करने का दबाव बनाया जाएगा?
मेरिका में 2026 के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों को लेकर एक और बड़ी चिंता सामने आ रही है। चुनाव नतीजों को बदलने, टालने या पूरी तरह रद्द कराने के लिए अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाना। चुनावी मामलों के जानकार साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव की मिसाल देते हैं। उस दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने जॉर्जिया के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को फोन कर सीधे तौर पर "11,780 वोट ढूंढने" को कहा था, ताकि उनकी हार को जीत में बदला जा सके। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की 'जनवरी 6 कमेटी' की जांच के अनुसार, ट्रंप के वकीलों और सहयोगियों ने मिशिगन, एरिज़ोना और पेंसिल्वेनिया के राज्य सांसदों पर भी चुनावी नतीजों को पलटने के लिए भारी दबाव डाला था।
क्या बन सकते हैं हालात?
संभावित परिदृश्य यह है कि राज्य और स्थानीय स्तर के चुनाव अधिकारियों पर परिणामों में फेरबदल करने, उन्हें अटकाने या सीधे रद्द करने का दबाव डाला जा सकता है।
सिस्टम के सामने क्या हैं रुकावटें?
नियमों के मुताबिक, चुनाव अधिकारी ऐसे अनुचित राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार कर सकते हैं। साल 2020 में रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े जॉर्जिया के अधिकारी ब्रैड रैफेंसपर्गर ने ऐसा ही किया था और झुकने से मना कर दिया था। हालांकि, मौजूदा स्थिति पहले से काफी जटिल हो चुकी है। 2020 के चुनाव में कथित धांधली के दावों का समर्थन करने वाले नेता अब 20 राज्यों में ऐसे प्रमुख पदों पर पहुंच चुके हैं, जिनके पास सीधे तौर पर चुनावों की निगरानी का अधिकार है। पिछले चुनावी चक्र में ऐसे अधिकारियों वाले राज्यों की संख्या 17 थी।
संभावित असर और नतीजे
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सबसे सीधा और गंभीर असर चुनावी नतीजों के आधिकारिक प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) पर पड़ सकता है। यदि अधिकारी सर्टिफाइड नतीजों को खारिज करने या प्रमाणीकरण प्रक्रिया को टालने का फैसला करते हैं, तो चुनाव परिणाम गंभीर कानूनी उलझनों और संवैधानिक संकट में फंस सकते हैं।
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3. मतपत्रों या मतदान उपकरणों को ज़ब्त करना
अदालत द्वारा मंज़ूर किए गए वारंट या सम्मन के ज़रिए, संघीय एजेंट मतपत्रों, मशीनों या रिकॉर्ड को ज़ब्त कर सकते हैं। जनवरी में, FBI एजेंटों ने जॉर्जिया की फुल्टन काउंटी से 2020 के चुनावों के रिकॉर्ड वाले सैकड़ों बक्से ज़ब्त किए थे।
क्या बन सकते हैं हालात?
आशंका है कि अदालत से वारंट या समन (Subpoena) हासिल कर संघीय एजेंट बैलेट, मशीनों या चुनावी रिकॉर्ड को ज़ब्त कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो मतपत्रों और मशीनों की कस्टडी की सुरक्षित कड़ी (Chain of Custody) टूट जाएगी, जिससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल खड़े हो जाएंगे।
सिस्टम के सामने क्या हैं रुकावटें?
नियमों के तहत किसी भी तरह की जब्ती के लिए अदालत से मंजूर वारंट या समन जरूरी होता है। उदाहरण के तौर पर, जॉर्जिया की फुल्टन काउंटी में हुई ऐसी कार्रवाई में एक फेडरल मजिस्ट्रेट ने पर्याप्त आधार (Probable Cause) पाया था। हालांकि, पूर्व अमेरिकी अटॉर्नी गैरी रेस्टैनो ने उस छापेमारी को पूरी तरह से "अनुचित और विचित्र" (Off the wall) करार दिया था। वहीं, ट्रंप ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक बयान में कहा था कि उन्हें 2020 में प्रमुख स्विंग राज्यों में वोटिंग मशीनों को ज़ब्त करने के लिए नेशनल गार्ड को आदेश देना चाहिए था।
संभावित असर और नतीजे
विशेषज्ञों के अनुसार, मशीनों और बैलेट की ज़ब्ती का सबसे गंभीर प्रभाव वोटों की गिनती पर पड़ेगा। गिनती में रुकावट आने से नतीजों का आधिकारिक प्रमाणन लटक सकता है, जिससे पूरे देश में संवैधानिक और राजनीतिक अनिश्चितता पैदा हो सकती है।
4. पोलिंग बूथों पर फ़ेडरल मॉनिटर्स की भारी तैनाती, क्या वोटिंग प्रक्रिया में बढ़ेगा दखल?
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में मतदान केंद्रों पर फ़ेडरल मॉनिटर्स की तैनाती को लेकर भी विवाद की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने इस बार 1,000 मॉनिटर्स तैनात करने की योजना बनाई है, जबकि 2024 के चुनावों में यह संख्या 590 थी। ऐतिहासिक रूप से इन मॉनिटर्स का काम नागरिक अधिकारों और मतदान से जुड़े कानूनों के पालन की निगरानी करना रहा है।
क्या बन सकते हैं हालात?
संभावित चिंता यह है कि फ़ेडरल मॉनिटर्स सिर्फ़ निगरानी (Observation) तक सीमित रहने की अपनी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर मतदान की प्रत्यक्ष प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकते हैं। सिस्टम के सामने क्या हैं रुकावटें?
राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास इन मॉनिटर्स के अधिकारों को सीमित रखने का अधिकार है। उदाहरण के तौर पर, व्योमिंग की लैरामी काउंटी में स्थानीय अधिकारियों ने मतदाताओं से पूछताछ करने और वोटिंग उपकरणों की जांच करने की मॉनिटर्स की मांग को खारिज कर दिया था। वहीं मिशिगन प्रशासन का भी कहना है कि मॉनिटर्स को केवल आम जनता को मिलने वाले निगरानी अधिकारों के दायरे में ही रखा जाएगा।
संभावित असर और नतीजे
इसका सीधा असर मतदाताओं के अनुभव और वोटिंग प्रक्रिया पर पड़ सकता है। यदि मॉनिटर्स अपने तय दायरे से बाहर जाकर हस्तक्षेप करते हैं, तो जैसा व्योमिंग में देखने को मिला था, मतदान केंद्रों पर तनाव, संशय और निष्पक्ष वोटिंग को लेकर गंभीर चिंताएं बनी रह सकती हैं।
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5. मतदान केंद्रों के पास इमिग्रेशन एजेंटों (ICE) की मौजूदगी, क्या वोटिंग पर पड़ेगा असर?
अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों को लेकर एक और संवेदनशील मुद्दा सामने आ रहा है। मतदान केंद्रों के पास इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) एजेंटों की संभावित सक्रियता। आव्रजन जांच और चुनाव प्रक्रिया के आमने-सामने आने से मतदाताओं में डर का माहौल बनने की आशंका जताई जा रही है।
क्या बन सकते हैं हालात?
चिंता इस बात को लेकर है कि संघीय आव्रजन एजेंट मतदान केंद्रों के काफी करीब अपने ऑपरेशन या जांच गतिविधियां चला सकते हैं। हालांकि होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी मार्कवेन मुलिन ने स्पष्ट किया था कि अगर किसी मतदान केंद्र पर कोई सीधा खतरा हो या किसी के खिलाफ वारंट तामील करना हो, तभी ऐसी कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उन्होंने मतदान स्थलों के पास ICE की मौजूदगी की संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया था।
सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी संघीय कानून मतदान केंद्रों के भीतर सशस्त्र संघीय एजेंटोंकी तैनाती पर स्पष्ट रूप से रोक लगाता है। इसके अलावा, डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) का कहना है कि ICE की ऐसी कोई योजना नहीं है जिसके तहत विशेष रूप से मतदान केंद्रों को निशाना बनाकर कोई ऑपरेशन चलाया जाए।
संभावित असर और नतीजे
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चुनाव प्रक्रिया के बीच इमिग्रेशन कानून को लागू करने की गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान मतदान प्रतिशत पर पड़ेगा। मतदान स्थलों के पास सशस्त्र एजेंटों की मौजूदगी से खासकर अप्रवासी पृष्ठभूमि वाले और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं में भय फैल सकता है, जिससे वे मतदान करने से बच सकते हैं।
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6. मतदान केंद्रों पर सेना की तैनाती की चर्चा, क्या लागू हो सकता है इंसरेक्शन एक्ट?
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों पर सैन्य बलों की तैनाती की संभावना को लेकर भी एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। आशंका जताई जा रही है कि विदेशी दखल या गैर-नागरिकों द्वारा मतदान के आरोपों का हवाला देकर 'इंसरेक्शन एक्ट' लागू किया जा सकता है। आमतौर पर अमेरिकी कानून सेना को घरेलू कानून-व्यवस्था लागू करने से रोकता है, लेकिन यह कानून उसका एक बड़ा अपवाद है।
क्या बन सकते हैं हालात?
संभावित परिदृश्य यह है कि चुनाव के आसपास कानून-व्यवस्था या निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के नाम पर राष्ट्रपति इंसरेक्शन एक्ट लागू कर दें। ट्रंप ने भी एक साक्षात्कार में कहा था कि ईमानदार चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जो भी आवश्यक हो, वह किया जाना चाहिए।
सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?
कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर इंसरेक्शन एक्ट लागू भी कर दिया जाए, तब भी अन्य कड़े संघीय कानून सेना को सीधे तौर पर मतदान केंद्रों पर जाने, चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने या मतदाताओं को डराने से रोकते हैं। इसके अलावा, अमेरिकी सैन्य नेतृत्व ने भी इस तरह की कार्रवाइयों से दूरी बनाई है। अगस्त में जनरल डैन केन ने एक पत्र में साफ किया था कि सेना की ऐसी कोई योजना नहीं है कि मतदान केंद्रों पर जवानों को भेजा जाए या चुनावी सामग्री ज़ब्त की जाए।
संभावित असर और नतीजे
यदि मतदान केंद्रों के आसपास सेना या वर्दीधारी जवानों की मौजूदगी दिखाई देती है, तो इसका सीधा असर मतदान प्रतिशत पर पड़ेगा। मतदाताओं के बीच डर और हिचकिचाहट के चलते टर्नआउट गिर सकता है। साथ ही, ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ अदालतों में तुरंत कई याचिकाएं दाखिल होंगी, जिससे पूरा चुनावी माहौल भारी कानूनी टकराव में उलझ सकता है।
7. क्या चुनाव पर लागू हो सकता है राष्ट्रीय आपातकाल?
अमेरिका में 2026 के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों के बीच एक और बेहद संवेदनशील परिदृश्य की चर्चा हो रही है—देश में नेशनल इमरजेंसी (राष्ट्रीय आपातकाल) की घोषणा। डोनाल्ड ट्रंप के कुछ सहयोगियों ने कथित चुनावी धांधली या विदेशी दखल का हवाला देकर राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का सुझाव दिया है। उनका तर्क है कि इसके जरिए मतों की गिनती में संघीय सरकार की सीधी भागीदारी, जिसमें अनिवार्य रूप से हाथों से गिनती (Hand counts) कराना शामिल है, को सही ठहराया जा सकता है। खुद ट्रंप ने भी एक साक्षात्कार में इस विकल्प पर कहा था कि वे "किसी भी चीज़ से न तो इनकार कर रहे हैं और न ही उसे स्वीकार कर रहे हैं।"
क्या बन सकते हैं हालात?
आशंका है कि चुनावों के दौरान या नतीजों के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर कथित गड़बड़ी का हवाला देते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी जाए, ताकि संघीय प्रशासन सीधे तौर पर वोटों की गिनती और प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में ले सके।
सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?
कानूनी विशेषज्ञों का साफ कहना है कि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा से भी राष्ट्रपति को चुनावों पर नियंत्रण करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं मिल जाता। अमेरिकी संविधान के तहत चुनाव कराने, नियमों को लागू करने और मतों की गिनती का प्राथमिक दायरा राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि संघीय सरकार के। ऐसे किसी भी कदम को अदालतें तुरंत असंवैधानिक करार देकर रोक सकती हैं।
संभावित असर और नतीजे
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आपातकाल लगाने की कोशिश की जाती है, तो इसका सबसे बड़ा असर वोटों की गिनती और नतीजों के प्रमाणन पर पड़ेगा। इससे पूरे देश में भारी भ्रम की स्थिति पैदा होगी, अदालतों में मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी और अंतिम नतीजों को प्रमाणित करने में लंबी देरी हो सकती है, जिससे संवैधानिक संकट गहरा जाएगा।
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8. चुनाव अधिकारियों पर संघीय जांच और मुकदमे का साया, क्या मतदान प्रबंधन पर पड़ेगा दबाव?
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बीच एक और बड़ा टकराव संघीय एजेंसियों और स्थानीय चुनाव प्रशासकों के बीच देखने को मिल रहा है। जुलाई के महीने में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने हर राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि यदि गैर-नागरिकों को जानबूझकर मतदान करने दिया गया या उनके नाम मतदाता सूची से नहीं हटाए गए, तो अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों दलों के चुनाव अधिकारियों ने इस चेतावनी को "निराधार डराने-धमकाने की कोशिश" करार दिया था।
क्या बन सकते हैं हालात?
संभावित परिदृश्य यह है कि चुनाव प्रशासकों को निशाना बनाते हुए संघीय जांच शुरू की जा सकती है, उन्हें समन जारी किए जा सकते हैं या फिर सीधे आपराधिक मामलों में घसीटा जा सकता है।
सिस्टम के सामने क्या हैं चुनौतियां?
विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही अंत में कोई औपचारिक आरोप तय न हों, लेकिन संघीय समन का जवाब देने और मांगे गए रिकॉर्ड्स जुटाने में ही चुनाव कार्यालयों का भारी समय और संसाधन बर्बाद हो जाएंगे। पहले से ही सीमित बजट और कम कर्मचारियों के साथ काम कर रहे स्थानीय चुनाव कार्यालयों के लिए यह कानूनी बोझ झेलना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।
संभावित असर और नतीजे
इसका सीधा असर चुनावी कामकाज और वोटों की गिनती पर पड़ेगा। चुनाव कराने और मतों की सही गिनती करने में जुटी टीमें कानूनी जवाबदेही के दबाव में उलझ जाएंगी, जिससे चुनाव कार्यालयों पर अत्यधिक तनाव बढ़ेगा और मतगणना प्रक्रिया धीमी या बाधित हो सकती है।
9. क्या जीते हुए सांसदों को संसद में बैठने से रोका जा सकता है?
अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों के नतीजों के बाद एक और अभूतपूर्व संवैधानिक संकट की आशंका जताई जा रही है। संसद द्वारा चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों को उनकी सीट पर बैठने और शपथ लेने से रोकना। चर्चा है कि करीबी मुकबले वाली सीटों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के विजयी उम्मीदवारों को रोकने या प्रक्रिया को लटकाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप हाउस स्पीकर माइक जॉनसन पर प्रक्रियागत नियमों के इस्तेमाल का दबाव बना सकते हैं। इसके तहत एक संभावित परिदृश्य यह भी बताया जा रहा है कि हाउस क्लर्क को हटाकर किसी ट्रंप समर्थक को इस पद पर बैठाया जाए, जो जीते हुए डेमोक्रेटिक सांसदों को मान्यता देने में देरी करे।
क्या बन सकते हैं हालात?
संभावित स्थिति यह हो सकती है कि राज्यों द्वारा आधिकारिक रूप से प्रमाणित किए जा चुके डेमोक्रेटिक विजेताओं को भी संसद में अपनी सीट ग्रहण करने से रोक दिया जाए। सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?
कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा होना बेहद मुश्किल है। जानकारों के मुताबिक, हाउस क्लर्क का यह वैधानिक दायित्व है कि वह राज्यों द्वारा प्रमाणित उम्मीदवारों को मान्यता दे। यदि क्लर्क ऐसा करने से मना करता है, तो अदालतें तुरंत हस्तक्षेप करेंगी। अधिकांश कानूनी विद्वान सीधे तौर पर सीट देने से इनकार करने की संभावना को खारिज करते हैं। वहीं, स्पीकर माइक जॉनसन के प्रवक्ता टेलर हॉलसी ने ऐसे परिदृश्यों को पूरी तरह से "काल्पनिक और अटकलबाजी" करार दिया है।
संभावित असर और नतीजे
यदि कानूनी विवादों के चलते कुछ सीटें उलझती हैं, तो 3 जनवरी को जब नई संसद की पहली बैठक होगी, तब तक वे सीटें खाली रह सकती हैं। बेहद कड़े मुकाबले और कम अंतर वाली संसद में कुछ सीटों का खाली रहना भी हाउस स्पीकर के चुनाव और संसद के प्रशासनिक नियंत्रण के गणित को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।
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