नेतन्याहू ने अपने भाषण से इस्लामिक वर्ल्ड में ही करा दी फूट? 77 देशों का वॉकआउट, 4 प्रमुख मुस्लिम बहुल मुल्क अपनी सीट पर जमे रहे, Abraham Accords है वजह?

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अभिनय आकाश । Sep 25 2026 12:42PM

संयुक्त राष्ट्र महासभा में इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के संबोधन के दौरान लगभग 77 देशों के प्रतिनिधियों ने सदन से वॉकआउट किया। हालांकि, अब्राहम समझौते और मजबूत रणनीतिक संबंधों के कारण यूएई, बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान सदन में मौजूद रहे। नेतन्याहू ने वॉकआउट करने वाले प्रतिनिधियों को नैतिक रूप से कायर करार दिया।

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का मंच गुरुवार को उस वक्त वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े ड्रामे का गवाह बना, जब इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पोडियम पर कदम रखते ही दर्जनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने एक साथ सदन छोड़ दिया। ईरान, गाज़ा और पश्चिम एशिया के सुलगते हालात पर दुनिया को संबोधित करने आए नेतन्याहू के सामने हॉल की कुर्सियां तेजी से खाली होने लगीं। मगर, पीछे हटने के बजाय नेतन्याहू ने तल्ख तेवर अपनाते हुए सदन में मौजूद लोगों से कहा शुरू करने से पहले एक छोटा सा ऐलान अगर इस हॉल में कोई और नैतिक कायर बचा है जिसने अभी तक सदन नहीं छोड़ा है, तो कृपया अब निकल जाए। लगभग 77 देशों के प्रतिनिधियों ने इस बड़े वॉकआउट का हिस्सा बनकर इज़रायल के खिलाफ अपनी नाराजगी दर्ज कराई। इनमें सऊदी अरब, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे कई प्रमुख मुस्लिम और अरब मुल्क शामिल थे। लेकिन इस कूटनीतिक बवंडर के बीच सबसे चौंकाने वाला पहलू वो था जो हुआ ही नहीं। चार प्रमुख मुस्लिम-बहुल देश अपनी सीटों पर जमे रहे। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान ने इस सामूहिक बहिष्कार से खुद को पूरी तरह अलग रखा। अब सवाल यह उठता है कि जब अधिकांश इस्लामिक दुनिया नेतन्याहू को खुला संदेश दे रही थी, तब इन चार मुल्कों ने विरोध की इस लहर में शामिल न होने का फैसला क्यों किया? क्या यह अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) की रणनीतिक प्रतिबद्धता थी, ऊर्जा और रक्षा समझौतों का दबाव, या फिर बंद कमरों की वह कूटनीति जो सार्वजनिक नारों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को तरजीह देती है?

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नेतान्याहू के UNGA भाषण के दौरान क्या हुआ?

UN जनरल असेंबली के 81वें सेशन में नेतान्याहू का भाषण ऐसे समय में हुआ जब गाज़ा में संघर्ष जारी था और इज़राइल व ईरान के बीच बड़े पैमाने पर सैन्य तनाव बना हुआ था। जैसे ही वे पोडियम की ओर बढ़े, कई देशों के प्रतिनिधिमंडल हॉल से बाहर चले गए, जिससे इज़राइली प्रधानमंत्री के लिए श्रोताओं की संख्या काफी कम हो गई। खबरों के अनुसार, इन 77 देशों में मध्य पूर्व, एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के देश शामिल थे। इस संख्या के बारे में एक ज़रूरी बात ध्यान देने वाली है। 77 देशों की इस गिनती का मतलब यह नहीं है कि उन सभी प्रतिनिधिमंडलों ने मिलकर वॉकआउट (विरोध में बाहर जाना) किया। खबरों के मुताबिक, कुछ प्रतिनिधिमंडल तब हॉल में मौजूद नहीं थे जब नेतान्याहू ने भाषण शुरू किया, जबकि कुछ अन्य उनके पोडियम पर आते ही बाहर चले गए। दरअसल, नेतन्याहू के सभागार में पहुंचने पर कुछ नेताओं ने उनका स्वागत किया तो कुछ ने विरोध जताया। कई प्रतिनिधि बाहर निकल गए और उनके भाषण के दौरान ज्यादातर सीट खाली दिखाई दीं। नेतन्याहू ने जोर देकर कहा कि ईरान पर हमला करना उनके लिए अब तक के सबसे आसान फैसलों में से एक था और उन्होंने सभागार से बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों को नैतिक रूप से कायर करार दिया। उन्होंने कहा अगर नैतिक रूप से कोई और कायर अब भी सभागार में मौजूद है और बाहर नहीं गया है तो कृपया अभी चला जाए।

फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के लिए अमेरिका द्वारा एक बार फिर वीजा नहीं दिए जाने के कारण उन्हें पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश के जरिए महासभा को संबोधित करना पड़ा। अब्बास की उनके देश में लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव में कमी आई है, लेकिन अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह खुद को दरकिनार किए जाने को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। अब्बास ने कहा कि हम अपनी मातृभूमि नहीं छोड़ेंगे। हम विस्थापन स्वीकार नहीं करेंगे और हम किसी को भी अपनी ओर से हमारे भविष्य का फैसला नहीं करने देंगे। पूरे सप्ताह विश्व के कई नेताओं ने अपने भाषणों में फलस्तीनियों की स्थिति का उल्लेख किया और अब्बास ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इजराइल के खिलाफ अधिक ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। इस बीच, हमास के एक प्रवक्ता ने कहा कि बोर्ड ऑफ पीस द्वारा गाजा के पुनर्निर्माण के लिए छह महीने की 2.45 अरब डॉलर की योजना पेश किए जाने के बाद संगठन शांति समझौते के अगले चरणों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। हमास के प्रवक्ता हाजेम कासिम ने कहा कि उनका संगठन बोर्ड ऑफ पीस की रूपरेखा को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि उन्होंने हथियार डालने की किसी योजना का उल्लेख नहीं किया। इजराइल ने कहा है कि जब तक हमास हथियार नहीं डालता, वह पुनर्निर्माण की अनुमति नहीं देगा। ईयू के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ के अनुमान के अनुसार गाजा के पुनर्निर्माण के लिए 71 अरब यूरो (80.8 अरब डॉलर) की जरूरत है, लेकिन अब तक केवल एक अरब यूरो (1.1 अरब डॉलर) ही जुटाए जा सके हैं। 

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कौन से प्रमुख मुस्लिम देश इसमें शामिल रहे?


चार मुस्लिम-बहुल देश अलग दिखे क्योंकि वे उन 77 प्रतिनिधिमंडलों की सूची में शामिल नहीं थे जो अनुपस्थित थे या जिन्होंने चैंबर छोड़ दिया था – ये देश हैं संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान। उनके फैसले खास तौर पर अहम हैं क्योंकि इन चारों ने इज़राइल के साथ अलग-अलग स्तर पर राजनयिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं, जबकि गाज़ा युद्ध और इज़राइल के व्यापक सैन्य अभियानों को लेकर मुस्लिम दुनिया में तीखे मतभेद रहे हैं। UAE, बहरीन और मोरक्को ने 'अब्राहम समझौते'से जुड़े सामान्यीकरण समझौतों के ज़रिए इज़राइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। वहीं, अज़रबैजान ने कई दशकों में इज़राइल के साथ एक अलग रणनीतिक साझेदारी विकसित की है, खासकर रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्रों में। 


अब्राहम समझौता क्या हैं?


अब्राहम समझौते, अमेरिका के समर्थन वाले उन समझौतों की एक श्रृंखला हैं, जिनसे इज़राइल और कई अरब व मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंध सामान्य हुए। UAE और बहरीन ने सितंबर 2020 में इज़राइल के साथ औपचारिक रूप से समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद दिसंबर 2020 में मोरक्को ने भी संबंधों को सामान्य करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों से राजनयिक रास्ते खुले या बहाल हुए और व्यापार, पर्यटन, निवेश, तकनीक और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिला। UAE-इज़राइल समझौते ने दोनों देशों के बीच शांति, राजनयिक संबंधों और पूर्ण सामान्यीकरण की संधि स्थापित की। बहरीन ने भी इज़राइल के साथ शांति और सामान्यीकरण का समर्थन करने वाले एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। बाद में मोरक्को और इज़राइल ने राजनयिक और कांसुलर संबंध स्थापित करने के लिए एक संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों का मतलब यह नहीं था कि इन देशों ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करना बंद कर दिया या फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर इज़राइल के साथ अपने मतभेदों को छोड़ दिया। इसके बजाय, इन्होंने ऐसे औपचारिक राजनयिक रास्ते बनाए जिनसे शामिल देश गंभीर क्षेत्रीय तनाव के समय भी बातचीत जारी रख सके। 


नेतान्याहू के भाषण के दौरान UAE क्यों मौजूद रहा?


UAE उन शुरुआती अरब देशों में से एक था जिसने 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) के तहत इज़राइल के साथ पूरे राजनयिक संबंध स्थापित किए। इस समझौते पर औपचारिक रूप से सितंबर 2020 में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद राजनयिक मिशन स्थापित किए गए और आर्थिक संबंध बढ़ाए गए। गाज़ा युद्ध को लेकर बड़े मतभेदों के बावजूद UAE ने इज़राइल के साथ बातचीत जारी रखी है। उसका तरीका यह रहा है कि राजनयिक रास्ते खुले रखे जाएं और साथ ही फ़िलिस्तीनी मुद्दे और मानवीय चिंताओं पर अलग से अपना पक्ष रखा जाए।


बहरीन क्यों मौजूद रहा?


बहरीन 'अब्राहम समझौते' पर हस्ताक्षर करने वाला एक और प्रमुख अरब देश था। बहरीन और इज़राइल ने 2020 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए, जिससे सरकार-से-सरकार के बीच सीधे संपर्क के रास्ते बने, जो पहले मौजूद नहीं थे। बहरीन का फ़ैसला इसलिए भी खास था क्योंकि सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान समेत कई अन्य खाड़ी अरब देश उन देशों में शामिल थे जो नेतान्याहू के भाषण के दौरान या तो मौजूद नहीं थे या वहां से चले गए थे। 

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गाज़ा में तनाव के बावजूद मोरक्को क्यों बना रहा?


मोरक्को का रुख़ थोड़ा अलग और पेचीदा है। उत्तरी अफ़्रीका का यह देश उन देशों के समूह का हिस्सा है जिनके इज़राइल के साथ संबंध सामान्य होने की चर्चा अक्सर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' (Abraham Accords) के तहत होती है। हालाँकि, UAE और बहरीन के उलट, मोरक्को ने सितंबर 2020 में इज़राइल, UAE और बहरीन के साथ मिलकर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' के मूल समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसके बजाय, मोरक्को और इज़राइल ने दिसंबर 2020 में अपने संबंधों को सामान्य करने के समझौते की घोषणा की। बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने मोरक्को के साथ संबंधों के सामान्य होने की प्रक्रिया को 'अब्राहम एकॉर्ड्स' की व्यापक प्रक्रिया का ही हिस्सा माना। तब से मोरक्को और इज़राइल के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध बने हुए हैं।


अज़रबैजान ने नेतन्याहू के भाषण का बहिष्कार क्यों नहीं किया?


अज़रबैजान का मामला उन तीन अरब देशों से अलग है, क्योंकि उसने 'अब्राहम एकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। वहाँ मौजूद रहने के उसके फ़ैसले को बाकू और तेल अवीव के बीच लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों के ज़रिए बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इज़राइल और अज़रबैजान ने रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सहयोग विकसित किया है। जनवरी 2026 में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने इस रिश्ते को 'रणनीतिक साझेदारी' बताया था।


रक्षा और सैन्य सहयोग


रक्षा सहयोग, अज़रबैजान और इज़राइल के संबंधों के सबसे अहम हिस्सों में से एक है। अज़रबैजान इज़राइली रक्षा उपकरणों का एक बड़ा ग्राहक रहा है, और दोनों देशों के बीच सुरक्षा के मामले में करीबी संपर्क बना हुआ है। यह रिश्ता कई सालों में विकसित हुआ है और अज़रबैजान की व्यापक सुरक्षा नीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। इज़राइली सरकार से जुड़े विश्लेषणों में अज़रबैजान को इज़राइल के रक्षा उत्पादों के प्रमुख ग्राहकों में से एक बताया गया है।

वॉकआउट करने वाले देश


तुवालु, तुर्कमेनिस्तान, यमन, मिस्र, पनामा, सेनेगल, फिलिस्तीन, सूडान, ट्यूनीशिया, तुर्की, वेनेजुएला, एंटीगुआ और बारबुडा, बेलीज, कांगो, ओमान, कतर, सऊदी अरब, टोंगा, उज्बेकिस्तान, अंगोला, बारबाडोस, कोलंबिया, कोमोरोस, डोमिनिका, जिबूती, उत्तरी मैसेडोनिया, सैन मैरिनो, दक्षिण अफ्रीका, सोमालिया, अल्जीरिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई दारुस्सलाम, ब्राजील, चिली, कांगो गणराज्य, लेबनान, लाइबेरिया, इरिट्रिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, लीबिया, मॉरिटानिया, जॉर्डन, निकारागुआ, मेडागास्कर, नाइजर, पेरू, सेंट लूसिया, स्लोवेनिया, अफगानिस्तान, बहामास, बोस्निया और हर्जेगोविना, बोत्सवाना, उत्तर कोरिया, इस्वातिनी, सीरिया, युगांडा, पाकिस्तान, लेसोथो, बोलीविया, स्पेन, क्यूबा, ​​​​इक्वेटोरियल गिनी, ईरान, किर्गिस्तान, इराक, मोज़ाम्बिक, म्यांमार, मालदीव, इंडोनेशिया, कुवैत, नामीबिया, मलेशिया, गुयाना और केन्या।

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