मुरुड बीच पर 14 छात्रों के डूबने के केस में Bombay High Court ने रद्द की FIR

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2016 के मुरुड तट हादसे में पुणे के कॉलेज प्रबंधन और शिक्षक पर दर्ज प्राथमिकी खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि तीसरे वर्ष के छात्र वयस्क थे और अपने कृत्यों के परिणाम समझने में पूरी तरह सक्षम थे। पीठ ने माना कि रिकॉर्ड पर शिक्षकों की घोर लापरवाही का कोई साक्ष्य नहीं है और यह घटना एक दुर्घटना थी।
मुंबई उच्च न्यायालय ने 2016 में महाराष्ट्र के मुरुड समुद्र तट के पास 14 विद्यार्थियों के डूबने की घटना के संबंध में पुणे के एक कॉलेज के एक शिक्षक और प्रबंधन के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करते हुए कहा कि मृतक विद्यार्थी वयस्क थे और अपने कृत्यों के परिणामों को समझने में सक्षम थे। यह घटना एक फरवरी, 2016 को हुई थी, जब पुणे के आबिदा इनामदार सीनियर कॉलेज ऑफ आर्ट्स, साइंस एंड कॉमर्स के 116 विद्यार्थियों और कर्मचारियों का एक समूह रायगढ़ जिले के मुरुड में पिकनिक मनाने गया था। समुद्र तट पर तृतीय वर्ष के 41 विद्यार्थी समुद्र में चले गए, जिनमें से 14 बह गए और डूबने से उनकी मौत हो गई।
घटना के करीब 80 दिन बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 304ए (लापरवाही से मौत का कारण बनना) और धारा 34 के तहत 17 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इनमें कॉलेज के न्यासी, प्राचार्य, शिक्षक और कर्मचारी शामिल थे। अपने फैसले में न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि विद्यार्थियों के साथ गए शिक्षकों ने घोर या गंभीर स्तर की लापरवाही की थी।
अदालत ने कहा कि मृतक विद्यार्थी बीएससी के तीसरे वर्ष के छात्र थे और उनके पास ‘‘जिंदगी का उचित अनुभव’’ था। ऐसे में उनसे अपेक्षा की जा सकती थी कि वे सही और गलत के बीच अंतर समझते होंगे और अपने कार्यों तथा आचरण के संभावित परिणामों का आकलन कर सकते होंगे। अदालत ने कहा, ‘‘ऐसा प्रतीत होता है कि इसी संदर्भ में इन आवेदकों ने उन्हें समुद्र तट पर मौज-मस्ती करने की अनुमति दी थी।’’ अदालत ने यह भी कहा कि 14 विद्यार्थियों की डूबने से हुई मौत एक दुर्घटना थी।
अदालत ने कहा कि डूबने से हुई मौतों और किसी ऐसे लापरवाही भरे कृत्य के बीच सीधा या निकट संबंध स्थापित करने वाला कोई अपराधजन्य साक्ष्य नहीं है। ऐसे में शिक्षकों की लापरवाही के आधार पर उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और न ही उनके खिलाफ आपराधिक कृत्य का आरोप लगाया जा सकता है। उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘हर दुर्घटना के बाद हम जल्दबाजी में प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।’’ अदालत ने सरकार से व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए समुद्र तटों पर सुरक्षा उपायों को लागू करने या उन्हें और मजबूत करने पर विचार करने को कहा।
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