कलकत्ता HC से Tulu Mandal को झटका, गैर-जमानती वारंट के खिलाफ याचिका खारिज

कलकत्ता HC से Tulu Mandal को झटका, गैर-जमानती वारंट के खिलाफ याचिका खारिज
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कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कथित अवैध रेत और पत्थर कारोबारी मोहम्मद नजीबुद्दीन मंडल उर्फ टुलू मंडल के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट में दखल देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपी 23 मई को ही भारत छोड़ चुका था, ऐसे में अधीनस्थ अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं है। पुलिस ने उसके कथित सहयोगी के यहां से 28.53 करोड़ रुपये नकद और 5 किलो सोना जब्त किया था।

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कथित अवैध रेत और पत्थर कारोबारी मोहम्मद नजीबुद्दीन मंडल उर्फ टुलू मंडल की उस पुनरीक्षण याचिका को मंगलवार को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट एवं अधीनस्थ अदालत द्वारा भगोड़ा घोषित किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। पुलिस ने पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मोहम्मद बाजार में मंडल के एक कथित सहयोगी के घर से पांच किलोग्राम सोना और 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकदी जब्त की थी। जब्त सोने और नकदी की कुल कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बताई गई है।

न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि मंडल 23 मई को भारत छोड़ चुका था, इसलिए अधीनस्थ अदालत के आदेशों में हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। पुलिस की ओर से उच्च न्यायालय में दाखिल रिपोर्ट में कहा गया कि मंडल के एक कथित सहयोगी एवं रिश्तेदार के घर से 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकदी तथा पांच किलोग्राम सोने की छड़ें जब्त की गईं। इसके बाद बड़ी मात्रा में दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी बरामद किए गए, जिनसे संगठित अपराध किए जाने का संकेत मिला।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद में विभिन्न बैंक खातों में बड़ी मात्रा में धनराशि का पता चला। मंडल के वकील सिद्धार्थ दवे ने उसके खिलाफ 30 जुलाई को जारी गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट और इसके बाद उसे भगोड़ा घोषित करने संबंधी 10 अगस्त को जारी आदेश का विरोध किया। इस आदेश के तहत मंडल को 14 सितंबर को अधीनस्थ अदालत के समक्ष पेश होने को कहा गया था।

दोनों आदेश सूरी की अदालत के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) ने बीरभूम जिले के मोहम्मद बाजार थाने में 30 जुलाई को दर्ज आपराधिक मामले में दिए थे। मंडल के वकील ने दलील दी कि प्राथमिकी दर्ज किए जाने के दिन ही उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि मंडल 23 मई को ही देश छोड़ चुका था, जबकि उसके खिलाफ आपराधिक मामला 30 जुलाई को दर्ज किया गया।

न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत गैर-जमानती अपराध के ऐसे आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है, जो गिरफ्तारी से बच रहा हो। याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल किया कि प्राथमिकी दर्ज होने के दिन ही गिरफ्तारी वारंट जारी कर यह निष्कर्ष कैसे निकाला गया कि मंडल गिरफ्तारी से बच रहा था। न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि यह दलील महत्वहीन है, क्योंकि यह स्वीकार्य तथ्य है कि मंडल 23 मई को ही देश छोड़ चुका था।

उन्होंने कहा, ‘‘यदि याचिकाकर्ता देश में होता, तो गिरफ्तारी वारंट जारी करने से पहले कुछ प्रक्रिया पूरी करनी जरूरी होती।’’ न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि मंडल के देश छोड़ने के मद्देनजर एसीजेएम ने उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर कोई त्रुटि नहीं की और ऐसा जांच को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने गिरफ्तारी वारंट और मंडल को भगोड़ा घोषित करने संबंधी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मंडल भगोड़ा है और उस पर संगठित अपराध गिरोह चलाने का आरोप है।

उच्च न्यायालय ने 20 अगस्त को मंडल की वह याचिका भी खारिज कर दी थी, जिसमें नकदी और सोना जब्त किए जाने से जुड़े मामले में उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने का अनुरोध किया गया था।

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