Allahabad High Court का फैसला, पीड़ित की बिना अर्जी भी अदालतें बढ़ा सकती हैं मुआवजा

Allahabad
ANI
अभिनय आकाश । Sep 24 2026 2:52PM

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि मोटर दुर्घटना मामलों में बीमा कंपनी की अपील पर अदालत पीड़ितों का मुआवज़ा बढ़ा सकती है, भले ही उन्होंने अलग से अपील न की हो। अदालत ने नेशनल इंश्योरेंस की अपील खारिज कर पीड़ित परिवार का मुआवज़ा बढ़ाकर 11.43 लाख रुपये कर दिया और कहा कि तकनीकी बातें उचित मुआवज़े में बाधा नहीं बननी चाहिए।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि मोटर दुर्घटना के मामले में अपील सुनने वाली अदालत मुआवज़े की रकम बढ़ा सकती है, भले ही पीड़ितों या उन पर निर्भर लोगों ने अलग से कोई अपील या क्रॉस-ऑब्जेक्शन न किया हो; बशर्ते बीमा कंपनी ने तय की गई मुआवज़े की रकम को चुनौती दी हो। कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है और अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ितों और उन पर निर्भर लोगों को कानून के मुताबिक उचित और सही मुआवज़ा मिले। लखनऊ बेंच के जस्टिस प्रशांत कुमार ने फ़ैज़ाबाद मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। बीमा कंपनी की अपील को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने सभाजीत तडमाली के परिवार के लिए मुआवज़े की रक़म 7.20 लाख रुपये से बढ़ाकर 11,43,565 रुपये कर दी और सालाना ब्याज दर को 7 प्रतिशत पर ही बनाए रखा। यह मामला 16 नवंबर 2017 को हुए एक हादसे से जुड़ा है, जब ताडमाली अंबेडकर नगर में पैदल चल रहे थे। एक SUV ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनके परिवार ने 49.70 लाख रुपये के मुआवज़े की मांग की थी। बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दुर्घटना से पहले ही गाड़ी चोरी हो गई थी और उस समय वह गाड़ी के मालिक या ड्राइवर के पास नहीं थी। कंपनी ने ड्राइवर की पहचान पर भी सवाल उठाए और चार्जशीट तथा ड्राइविंग लाइसेंस के रिकॉर्ड में उसके नाम में अंतर की ओर इशारा किया।

इसे भी पढ़ें: घर छोड़ने पर तलाक के बाद भी महिला Maintenance की हकदार : Allahabad High Court

चोरी के दावे को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि गाड़ी के मालिक ने न तो कोई FIR दर्ज कराई थी और न ही ऐसा कोई ठोस सबूत पेश किया जिससे यह साबित हो सके कि दुर्घटना से पहले SUV चोरी हुई थी। कोर्ट ने यह भी माना कि ड्राइवर के नाम में अंतर होने की वजह से अभियोजन पक्ष और दावा करने वालों के मामले पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। उम्र के सवाल पर, कोर्ट ने कहा कि आधार में दर्ज उम्र को ताडमाली की जन्मतिथि का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने गौर किया कि परिवार रजिस्टर में उनके जन्म का साल 1967 दर्ज था, हालांकि सही तारीख और महीना उपलब्ध नहीं था। इसलिए, कोर्ट ने दुर्घटना के समय उनकी उम्र 50 साल मानी और 13 का मल्टीप्लायर लागू किया।

इसे भी पढ़ें: Allahabad High Court: कर्मचारियों को Santa Claus की टोपी पहनने के लिए बाध्य करना गलत

हाई कोर्ट ने मृतक की मासिक आय को भी ट्रिब्यूनल द्वारा तय 5,000 रुपये से बढ़ाकर 7,400.46 रुपये कर दिया, जो अकुशल श्रमिक के लिए न्यूनतम मजदूरी के बराबर है। इसके अलावा, कोर्ट ने मृतक की पत्नी और दो बच्चों में से प्रत्येक को 48,400 रुपये का 'कंसोर्टियम' (पारिवारिक नुकसान के लिए मुआवजा) भी दिया। कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना पीड़ितों और उन पर निर्भर लोगों को उचित मुआवजा दिलाने में तकनीकी बातें बाधा नहीं बननी चाहिए।

All the updates here:

अन्य न्यूज़