Dwarka: Mythology Meets Reality | हिंदू पौराणिक कथाओं में द्वारका शहर | Matrubhoomi

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अभिनय आकाश । Mar 7 2024 7:58PM

विशाल द्वारकाधीश मंदिर पर 52 गज का परचम पिछले 2800 सालों से लहरा रहा है। ये भव्यधाम इस बात का गवाह है कि इसी भूमि पर कभी प्राचीन द्वाराका नगरी हुआ करती थी। मंदिर का इतिहास बताता है कि इसका निर्माण तब हुआ जब पौराणिक द्वारका समुद्र में डूब गई और यदुवंश बिखर गया। तब श्रीकृषण के चचेरे भाई उद्धव कृष्ण के पपौत्र वज्रनाभ को लेकर यहां आए थे।

पांच हजार साल से भी पुरानी ऐसी नगरी जिसे खुद श्रीकृष्ण ने बसाया। एक ऐसी नगरी जो समुद्र के सतह में चली गई लेकिन आज भी उसके साक्ष्य मौजूद हैं। यूं तो श्रीकृष्ण का साम्राज्य इस धरती पर ही नहीं बल्कि हर मनुष्य के दिल में है। लेकिन आज हम आपको कृष्ण के उस अदृश्य साम्राज्य के बारे में बताने वाले हैं जो धरती की सतह पर नहीं बल्कि समुद्र की गहराईयों की रेल में लिपटा है। जहां कभी श्रीकृष्ण ने अपने राज की शुरुआत की थी। जहां का कण-कण कृष्ण लिलाओं का साक्षी रहा है। लेकिन आज वहां केवल और केवल समुद्र की लहरों का शोर सुनाई देता है। गोमती नदी और अरब सागर के संगम पर बसा विश्वास और इतिहास को जोड़ता ये नगर आज भी श्रद्धालुओं के लिए देवधूमि है। 

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कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने बनाया मंदिर 

विशाल द्वारकाधीश मंदिर पर 52 गज का परचम पिछले 2800 सालों से लहरा रहा है। ये भव्यधाम इस बात का गवाह है कि इसी भूमि पर कभी प्राचीन द्वाराका नगरी हुआ करती थी। मंदिर का इतिहास बताता है कि इसका निर्माण तब हुआ जब पौराणिक द्वारका समुद्र में डूब गई और यदुवंश बिखर गया। तब श्रीकृषण के चचेरे भाई उद्धव कृष्ण के पपौत्र वज्रनाभ को लेकर यहां आए थे। गुजरात पर्यटन की वेबसाइट के अनुसार, माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 2500 साल पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने की थी। इसमें कहा गया है कि प्राचीन मंदिर का कई बार जीर्णोद्धार किया गया है। आज जिस द्वारका को लोग जानते हैं उसे सातवीं बार बसाया गया। इसके दो अहम हिस्से हैं। पहला द्वारकाधीश मंदिर है। मान्यता के मुताबिक यहां कृष्ण का दरबार लगता था। दूसरा मंदिर से 35 किलोमीटर दूर बेट द्वारका जहां कृष्ण का राजमहल था। 

द्वारका शहर का पुरातात्विक महत्व 

भारत के सात पवित्र तीर्थस्थलों में से एक द्वारका शहर का न केवल धार्मिक बल्कि पुरातात्विक महत्व भी है। शहर के प्राचीन अवतार को महाकाव्य महाभारत में कृष्ण के प्राचीन साम्राज्य के रूप में संदर्भित किया गया है। एक गढ़वाले शहर के रूप में लगभग 84 किमी में फैला हुआ था जहां गोमती नदी और अरब सागर मिलते हैं। पाठ के अनुसार, कृष्ण की मृत्यु के बाद प्राचीन शहर अरब सागर के नीचे डूब गया था। पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में पुरातत्वविदों ने आधुनिक द्वारका के तट पर डूबे हुए शहर के भौतिक साक्ष्य खोजने का प्रयास किया ताकि वे संदेह से परे इसके अस्तित्व को साबित कर सकें। परिणामस्वरूप, पानी के भीतर कई कलाकृतियाँ खोजी गई हैं जैसे पत्थर के ब्लॉक और खंभे इत्यादि। हालाँकि, इन निष्कर्षों की सही उम्र पर अभी भी बहस चल रही है। अब, पुरातत्वविद् प्राचीन शहर की दीवारों की नींव की तलाश के लिए पानी के नीचे खुदाई की योजना बना रहे हैं। यदि उन्हें बस्ती का सटीक स्थान मिल जाए, तो यह भारत के लिए जबरदस्त ऐतिहासिक महत्व होगा। 

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हिंदू पौराणिक कथाओं में द्वारका शहर 

कहा जाता है कि हिंदू धर्म की सप्त पुरियों में से एक द्वारका शहर को भगवान कृष्ण ने उत्तर प्रदेश के मथुरा से गुजरात के द्वारका में स्थानांतरित होने के बाद समुद्र से पुनः प्राप्त किया था। किंवदंतियों के अनुसार, भगवान कृष्ण के दुनिया छोड़ने के बाद द्वारका अरब सागर में डूब गई थी, जो कलियुग की शुरुआत थी। भगवान कृष्ण और द्वारका के बारे में पौराणिक कथा पुराणों में निहित है। वर्षों से पुरातात्विक साक्ष्य, कई संरचनाओं और एक शहर के अचानक जलमग्न होने की ओर इशारा करते हैं। इसी आख्यान और इसके आस्था से जुड़े होने की बात पीएम मोदी ने भी दोहराई। 

पुरातत्वविदों ने खुदाई में क्या पाया 

पानी के नीचे के पुरातत्वविदों सहित पुरातत्वविदों ने खुदाई की है, जिसमें मिट्टी के बर्तन, चित्रित पॉलीक्रोम और माइक्रोन का पता चला है। पानी के अंदर पत्थर की संरचनाएं और मंदिर पाए गए हैं, जो बदलते समुद्र तट का संकेत देते हैं। डॉ. एस आर राव द्वारा निर्देशित 2007 की खुदाई में अच्छी तरह से संरक्षित अवशेष मिले, जो समुद्र के कारण द्वारका के विनाश का सुझाव देते हैं। पत्थर के लंगर और एक हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण एक प्राचीन बंदरगाह के सिद्धांत का समर्थन करते हैं। 15,000 वर्षों में समुद्र के स्तर में उतार-चढ़ाव से लगभग 3,500 साल पहले द्वारका के जलमग्न होने का पता चलता है, जिससे इसका सटीक स्थान भारत के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। साल 2007 में की गई खुदाई टीम का हिस्सा रहे डॉ. आलोक त्रिपाठी ने बीबीसी से बात करते हुए बताया कि द्वारका की लोकेशन वहीं है जैसी कि ऐतिहासिक साहित्य में वर्णित है। ये गोमती नामक छोटी सी नदी है जो समुंदर में मिल जाती है और द्वारका की नगरी है। इसलिए हमने इसके इर्द गिर्द 200 वर्ग मीटर जगह को खुदाई के लिए चुना और हमने पुरातत्व विज्ञान के अनुसार इस इलाके की गहरी छानबीन की। हमने देखा कि 50 वर्ग मीटर में अधिक कलाकृतियां मिली जो बड़े आकार की थी। काउंसिल ऑफ़ साइंटिफ़िक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के पूर्व प्रमुख और वैज्ञानिक डॉक्टर राजीव निगम का कहना है कि महाभारत में कृष्ण कहते हैं कि द्वारका शहर सागर से निकली जमीन पर बनाया गया था। लेकिन जब उसका पानी दोबारा अपनी पुरानी जगह पर आया तो शहर डूब गया। ये जानने के लिए समुंदर की सतह में क्या उतार चढ़ाव आया, हमने कंप्यूटर के जरिए पिछले पंद्रह हजार सालों के रिकॉर्ड की एक प्रोजेक्शन बनाई। पंद्रह हजार साल पहले समुंदर की सतह सौ मीटर नीचे थी। फिर समुंदर की सतह ऊपर आना शुरू हुई और सात हजार साल पहले समुंदर की सतह मौजूदा सतह से अधिक थी। 

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