भारत में TFR घटकर 1.9 पहुंचा, बढ़ती बुजुर्ग आबादी पर विशेषज्ञों ने चेताया

भारत में TFR घटकर 1.9 पहुंचा, बढ़ती बुजुर्ग आबादी पर विशेषज्ञों ने चेताया
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उच्चतम न्यायालय द्वारा दो बच्चों से जुड़े नियमों की प्रासंगिकता पर की गई टिप्पणी के बाद देश में जनसंख्या नीति पर नई चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में कुल प्रजनन दर घटकर 1.9 रह गई है और कामकाजी आबादी का अनुपात घटने से पहले बुजुर्गों के लिए नीतियां बनाना जरूरी है।

(कोमल शर्मा) नयी दिल्ली, छह नवंबर दो से अधिक संतान होने पर दंड का प्रावधान करने वाले कानूनों की प्रासंगिकता पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी ने देश में जनसंख्या नीति को लेकर नयी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास अपनी युवा आबादी के दम पर आर्थिक विकास को गति देने यानी ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ का फायदा उठाने का अवसर तेजी से सिमट रहा है। विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि भारत को भविष्य की दो बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी।

एक ओर बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी, तो दूसरी ओर कामकाजी उम्र में पहुंचने वाले युवाओं का अनुपात घटता जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 2003 में तीन थी, जो घटकर अब 1.9 रह गई है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए कानून अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारी स्पष्ट राय है कि दो से अधिक बच्चों पर जुर्माना लगाने वाले कानूनों ने अपनी प्रासंगिकता खो दी है। पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण ऐसे कानूनों का आधार यानी अत्यधिक जनसंख्या का डर अब खत्म हो चुका है।’’ ‘पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया’ की कार्यकारी निदेशक पूनम मुटरेजा ने इन टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि भारत के सामने एक ओर शेष जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने और दूसरी ओर तेजी से बुजुर्ग होते समाज की जरूरतों के लिए तैयारी करने की दोहरी चुनौती है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति को देखते हुए देश की जनसंख्या नीति और उसे लागू करने के तरीकों पर नए सिरे से विचार करना बेहद जरूरी है।

मुटरेजा ने कहा, ‘‘इसका अर्थ है युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देना, अधिक महिलाओं को सार्थक रूप से कार्यबल का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित करना और बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा तथा देखभाल की व्यवस्था विकसित करना। भारत का आर्थिक भविष्य काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वह महिलाओं को कामकाजी आबादी का हिस्सा बनाने में कितना सफल होता है।’’ ‘ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया’ की विशेषज्ञ सीमा भास्करन ने कहा कि भारत की जनसंख्या नीति में महिलाओं की प्रजनन क्षमता और मातृत्व संबंधी फैसलों को नियंत्रित करने पर जोर दिया गया, जिसके कारण देश की प्रजनन दर में भारी गिरावट आई है। उन्होंने कहा, ‘‘इस जनसांख्यिकीय बदलाव के कारण बुजुर्गों की आबादी बढ़ेगी और कामकाजी आबादी का अनुपात घटेगा।

भारत को अपने वरिष्ठ नागरिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रम तैयार करने होंगे।’’ भास्करन ने कहा, ‘‘हालांकि, जनसांख्यिकीय गति के कारण भारत की आबादी कुछ समय तक बढ़ती रहेगी। शुरुआती दौर में कामकाजी आबादी भी बड़ी संख्या में उपलब्ध होगी, जिससे आर्थिक विकास के नए अवसर पैदा होंगे।’’ मुटरेजा ने भी कहा कि भारत की आबादी अगले कुछ दशकों तक बढ़ती रहेगी, लेकिन असल बदलाव आबादी की आयु संरचना में हो रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे अनुमान के मुताबिक, कुल आबादी में कामकाजी उम्र के लोगों का अनुपात 2031 के आसपास लगभग 66 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएगा और इसके बाद इसमें गिरावट आने लगेगी।

भारत के पास अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का फायदा उठाने के लिए बहुत कम समय बचा है और यह अवसर तेजी से हाथ से निकल रहा है।’’ भास्करन ने राज्यों की सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप जनसंख्या नीतियां बनाने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि बढ़ती बुजुर्ग आबादी से पैदा होने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत फिलहाल पर्याप्त रूप से तैयार नहीं है। स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने और सरकारी योजनाओं का लाभ पाने की पात्रता के लिए कुछ राज्यों में दो बच्चों की अनिवार्यता के नियम पर मुटरेजा ने कहा कि ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो कि इन नियमों के कारण लोगों के प्रजनन संबंधी व्यवहार में कोई बदलाव आया है।

उन्होंने कहा, ‘‘जिन राज्यों में दो बच्चों की नीति लागू नहीं थी, वहां भी प्रजनन दर में उतनी ही तेजी से गिरावट आई। इसके विपरीत, इन नियमों के हानिकारक परिणामों के प्रमाण जरूर मिले हैं। महिलाएं, दलित, आदिवासी और गरीब परिवार इनसे असमान रूप से प्रभावित होते हैं...।’’ मुटरेजा ने कहा कि ये कानून उन लोगों को ही दंडित करते हैं जिनके पास अपने प्रजनन संबंधी फैसले लेने की सबसे कम स्वतंत्रता होती है।

उन्होंने इन कानूनों को तत्काल समाप्त करने की मांग की।

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