गृह लक्ष्मियों के सशक्तीकरण पर भी ध्यान दें..

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ANI

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास में अपनी कई अनूठी पहलों के लिए याद किए जाएंगे। उनमें से ही एक अनूठी पहल है, लखपति दीदी योजना। इस योजना की शुरूआत उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के दिन 15 अगस्त 2023 को किया था। इसके तहत अगले साल के केंद्रीय बजट में इसे औपचारिक रूप से देश भर में लागू करने का प्रावधान किया गया।

दीपावली की आहट सुनाई देने लगी है। घर-दुकान से लेकर कार्यालय आदि की साफ-सफाई का दौर चल रहा है। धन की देवी की बाट ताकती दुनिया को पता है कि भले ही उनकी सवारी उल्लू है, लेकिन उनकी कृपा उसी जगह होती है। जहां स्वच्छता होती है। लेकिन यह स्वच्छता आती कैसे है? बिना उद्यम और परिश्रम के क्या सफाई संभव है। मतलब साफ है कि बिना उद्यम के लक्ष्मी का आना संभव नहीं। हमारी परंपरा में घर-परिवार की महिलाओं-कन्याओं को भी देवी का ही रूप माना जाता है। बिनु घरनी घर भूत का डेरा, हमारे यहां यह माना जाता रहा है। यानी घर में जब घरनी या महिला होती है, तो वह सिर्फ महिला, पत्नी, बेटी, बहन या मां ही नहीं रह जाती, बल्कि घर की लक्ष्मी हो जाती है। घर की लक्ष्मी जब समर्थ होती है तो परिवार खुशहाल होता है। इन्हीं संदर्भो में याद आती है भारत सरकार की लखपति दीदी योजना। मोदी सरकार की कोशिशों से अब देश में तीन करोड़ महिलाएं लखपति दीदी बन चुकी हैं। अब भारत सरकार का लक्ष्य है कि इस संख्या को छह करोड़ तक पहुंचाया जाए। इस योजना की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब कई दीदियां करोड़पति बन चुकी हैं या फिर उनका स्वयंसहायता समूह करोड़पति हो चुका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इतिहास में अपनी कई अनूठी पहलों के लिए याद किए जाएंगे। उनमें से ही एक अनूठी पहल है, लखपति दीदी योजना। इस योजना की शुरूआत उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के दिन 15 अगस्त 2023 को किया था। इसके तहत अगले साल के केंद्रीय बजट में इसे औपचारिक रूप से देश भर में लागू करने का प्रावधान किया गया। इस योजना का नोडल केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय है। जिसके तहत चल रही दीनदयाल अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन को इस योजना को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को कौशल विकास की ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, ताकि वे सालाना कम से कम ₹1 लाख की स्थायी आय अर्जित कर सकें। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने वाली इस योजना के तहत उन्हें एलईडी बल्ब बनाने, प्लंबिंग, ड्रोन चलाने और रिपेयरिंग जैसे तकनीकी काम तो सिखाए ही जा रहे हैं, उन्हें स्थानीय स्तर पर काम करने और दस्तकारी आदि को बढ़ावा देने की भी कोशिश की जा रही है। शुरू में इस योजना के जरिए दो करोड़ महिलाओं को 'लखपति दीदी' बनाने का लक्ष्य रखा गयॉ था, जिसे फरवरी 2024 के अंतरिम बजट में बढ़ाकर तीन करोड़ कर दिया गया और यह लक्ष्य भी हासिल किया जा चुका है। इस योजना के तहत राज्य सरकारों की मदद से बैंकों से स्वयं सहायता समूहों को सस्ते दर पर कर्ज दिलाया जा रहा है। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर दीदियां इस कर्ज से ना सिर्फ अपना काम बढ़ा रही हैं, बल्कि बैंकों को कर्ज की किश्तें भी नियमित रूप से चुका रही हैं। हाल ही में विजयवाड़ा में आयोजित दिल्ली के बाहर सरस मेले के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस लक्ष्य को छह करोड़ करने का ऐलान किया और कहा कि अगले तीन साल में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया जाएगा। इस दस्तकारों और स्वयंसहायता समूहों द्वारा निर्मित सामानों को बाजार उपलब्ध कराने की दृष्टि से केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय 1999 से ही दिल्ली में सरस मेले का आयोजन करता रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा शुरू किए गए इस बाजार को अब तक दिल्ली में ही लगाया जाता रहा है। लेकिन इस साल पहली बार विजयवाड़ा में 13 से 31 अक्टूबर तक विजयवाड़ा में यह आयोजन किया गया। इस आयोजन में विशेष रूप से सफल लखपति और करोड़पति दीदियों के काम को प्रदर्शित किया गया। इसी आयोजन में झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले लखपति दीदी मीनू रक्षित से मुलाकात हुई। ग्यारह महिला सदस्यों की सहायता से शुरू उनके ग्रुप का टर्न ओवर अब पचास लाख सालाना से ज्यादा हो गया है। इसका असर यह हुआ है कि कभी मजदूरी करके जीने वाला उनका परिवार अब आत्मनिर्भर हो गया है और ना सिर्फ उनके परिवार में खुशहाली आई है, बल्कि उनके समूह में शामिल महिलाओं की भी स्थिति सुधरी है। साबुन बनाने से शुरू हुआ उनका काम अब 35 तरह के घरेलू उत्पाद बना रहा है और देशभर से उनके माल की मांग बढ़ रही है। कुछ ऐसी ही कहानी रही राजस्थान के बीकानेर से इस मेले में शामिल होने आई राजीविका मिशन से जुड़ी ममता की भी कहानी है। बीकानेर अपने नमकीन के लिए मशहूर पहले से ही है। ममता भी अपने घर में अपने खाने-पीने के लिए नमकीन बनाती रहीं। लेकिन लखपति दीदी योजना से जुड़ने के बाद उनके समूह की ग्यारह महिलाओं का जैसे भाग्य ही बदल गया। महज तीन साल में ही इस समूह का सालाना टर्नओवर बारह लाख से ज्यादा हो गया है। इसका असर यह हुआ है कि इस समूह की महिलाएं अपने घर की आर्थिक मदद करने लगी हैं। अपने बच्चों के खर्च के लिए उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा। लखीमपुर से आई शमीमा की भी कुछ ऐसी ही कहानी रही। आज उनका समूह चमड़े के जूते-चप्पल बना रहा है। इस काम में उनके पति सहयोग करते हैं और उनके समूह का टर्नओवर साठ लाख को पार कर चुका है।

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भारत में प्रबंधन की पढ़ाई के लिए मशहूर भारतीय प्रबंधन संस्थान यानी आईआईएम, अहमदाबाद ने हाल ही में लखपति दीदी योजना को लेकर एक शोध किया है। संस्थान ने अपने अध्ययन में देश के सत्रह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 6531 महिलाओं के काम को शामिल किया है। इस अध्ययन के मुताबिक लखपति दीदियों के परिवारों की आय में 61 फीसद तक का इजाफा देखा गया है। इसकी वजह से परिवारों की मासिक बचत में करीब 61.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। मार्च 2026 में खत्म हुए अध्ययन के अनुसार, करीब 48 प्रतिशत लखपति दीदियों के कारोबार में पिछले एक साल में विस्तार हुआ है। इसका असर यह हुआ है कि अब लखपति दीदियों के काम करने का दायरा भी बढ़ा है। अब वे एक साथ करीब-करीब दो-दो काम कर रही है। इस अध्ययन के मुताबिक एक लखपति दीदी की कामयाबी से दूसरी महिलाओं को भी प्रेरणा मिली और उन्होंने भी समूह बनाकर इस योजना का फायदा उठाया और अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर की।

घर की लक्ष्मी भले ही महिला को माना जाता रहा हो, लेकिन पारंपरिक परिवारों के अहम फैसलों में महिलाओं की राय की भूमिका कम रही है। लेकिन लखपति दीदियों की राय को पारिवारिक फैसलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आईआईएम के अध्ययन के अनुसार 36 प्रतिशत से ज्यादा लखपति दीदियों का कहना है कि पारिवारिक मामलों में उनकी राय का वजन बढ़ा है, साथ ही करबी 30.5 प्रतिशत दीदियों का मानना है कि उन्हें इस योजना के जरिए आर्थिक स्वायत्तता मिली है। आईआईएम अहमदाबाद की अध्ययन रिपोर्ट बताती है कि इस योजना से ग्रामीण समाज में भी बदलाव दिख रहा है।

मराठी की एक कहावत है कि एक शिक्षित महिला के चलते सात पीढ़ियों तक शिक्षा का बदलाव दिखता है। कुछ इसी तर्ज पर कह सकते हैं कि लखपति दीदी योजना के चलते भारतीय समाज बदलाव के नए दौर में कदम रख चुका है। सोचिए अगर देश की छह करोड़ महिलाएं सालाना कम से कम एक लाख रूपए की आय वाली होंगी तो इसका क्या असर होगा। निश्चित तौर पर छह करोड़ परिवार गरीबी रेखा की सीमा को कुछ और फांद जाएंगे। लक्ष्मी पूजन के मौके पर लखपति दीदी योजना को इस रूप में भी देखा जाना चाहिए।

उमेश चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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