जनरल वीपी मलिक ने करगिल युद्ध में शहीद सौरभ कालिया की प्रतिमा का अनावरण किया

General VP Malik

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना में हिमाचल प्रदेश के वीर जवानों ने अमूल्य योगदान दिया है। खासकर पालमपुर के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। जहां से कैप्टन सौरभ कालिया व विक्रम बत्रा जैसे बहादुर जवानों ने देश की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति देकर नई वीरगाथा लिखी। उन्होंने कहा कि शहीद किसी जाति, किसी वर्ग, किसी समाज, किसी क्षेत्र के नहीं होते हैं बल्कि सभी के होते हैं।

पालमपुर। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीपी मलिक ने आज हिमाचल प्रदेश के जिला कांगडा पालमपुर में सौरभ वन विहार में स्थापित कैप्टन सौरभ कालिया की प्रतिमा अनावरण किया। उन्होंने कहा कि मातृभूमि की रक्षा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीदों के प्रति देश कृतज्ञ रहेगा। 

 

उन्होंने कहा कि भारतीय सेना में हिमाचल प्रदेश के वीर जवानों ने अमूल्य योगदान दिया है। खासकर पालमपुर के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। जहां से कैप्टन सौरभ कालिया व विक्रम बत्रा जैसे बहादुर जवानों ने देश की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति देकर नई वीरगाथा लिखी। उन्होंने कहा कि शहीद किसी जाति, किसी वर्ग, किसी समाज, किसी क्षेत्र के नहीं होते हैं बल्कि सभी के होते हैं। उन्होंने कहा कि हम देश के शहीदों के समर्पण को याद रखें और ऐसी विभूतियों से प्रेरणा लें। उन्होंने सौरभ वन विहार में वन विभाग के योगदान की भी सराहना की। 

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करगिल युद्ध के दौरान कई भारतीय जांबाजों ने अपनी कुर्बानी दी, जिसकी वजह से भारत दोबारा अपने उस हिस्से पर नियंत्रण कर पाया, जहां पाकिस्तानी घुसपैठिए ने चुपके से कब्जा कर लिया था। इन्हीं जवानों में से एक नाम है कैप्टन सौरभ कालिया का. वह करगिल वॉर के ऐसे पहले हीरो थे जिनके बलिदान से इस युद्ध की इबारत लिखी गई थी. उन्होंने करगिल की युद्ध शुरू होने से पहले ही देश के लिए अपनी शहादत दे दी थी। करगिल युद्ध से पहले जब ताशी नामग्याल नाम के एक चरवाहा ने करगिल को चोटियों पर कुछ पाकिस्तानी घुसपैठिए को देखा और 3 मई 1999 को इस बात की खबर भारतीय सेना को दी।

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इसके बाद 14 मई को कैप्टन सौरभ कालिया पांच जवानों को अपने साथ लेकर पेट्रोलिंग पर निकले. कालिया अपने साथियों के साथ जब बजरंग की चोटी पर पहुंचे तो वहां पर देखा कि भारी संख्या में हथियारों के साथ पाकिस्तान की फौज खड़ी थी। उस समय कैप्टन सौरभ कालिया के पास न ज्यादा गोला बारूद था और ना ही हथियार. पाकिस्तानी सैनिकों की काफी संख्या होने की वजह से दुश्मनों ने कैप्टन सौरभ कालिया और उनके बाकी साथियों को घेर लिया। हालांकि, इस दौरान कैप्टन सौरभ कालिया और उनके साथियों ने जंग के मैदान में दुश्मनों से मुकाबला लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन गोला-बारूद खत्म होने के बाद पाकिस्तानी घुसपैठिए ने उन्हें और उनके पाचों साथियों को बंदी बना लिया।

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दुश्मनों की तरफ से काफी कोशिशों के बावजूद वे कैप्टन कालिया से एक भी शब्द नहीं निकलवा पाए।  उसके बाद बर्बरता के साथ सलूक करने के 22 दिन बाद कैप्टन सौरभ कालिया के शव को सौंप दिया था. सौरभ कालिया के साथ दुश्मनों ने जो बर्ताव किया था उसकी वजह से उनके शव को उनके परिवारवाले तक नहीं पहचान पाए थे. हालांकि, पाकिस्तान हमेशा इससे इनकार करता रहा है कैप्टन सौरभ कालिया की उस समय उम्र महज 22 साल थी. साल 1976 के 29 जून को अमृतसर में डॉ. एन.के. कालिया के घर पैदा हुए सौरभ कालिया. बचपन से ही वे आर्मी में जाना चाहते थे. यही वजह थी कि 12 वीं की पढ़ाई के बाद उन्होंने एएफएमसी की परीक्षा दी। हालांकि इसमें उतीर्ण नहीं हो पाए और ग्रेजुएट होते ही सीएसडी पास किया. आईएमए की ट्रेनिंग के बाद 1999 के फरवरी में करगिल में 4 जाट रेजिमेंट में पहली पोस्टिंग मिली थी. लेकिन नौकरी के चार महीने ही हुए थे कि करगिल में पाकिस्तान घुसपैठिए से उनका सामना हुआ था। 

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