Matrubhoomi: सम्राट अशोक की गौरव गाथा, जिन्होंने शस्त्रों को त्याग कर दिलों को जीता

Matrubhoomi: सम्राट अशोक की गौरव गाथा, जिन्होंने शस्त्रों को त्याग कर दिलों को जीता

अपनी युवावस्था में अशोक काफी गुस्सैल स्वभाव के थे। उनकी क्रूरता के कारण लोग उन्हें चंडाशोक चंड, प्रचंड और कालाशोक जैसे नामों से जानते थे। कहानी तो यह भी कही जाती है कि सम्राट अशोक ने गद्दारी के शक में अपने सैकड़ों मंत्रियों को मौत की सजा दे दी थी। बिल्कुल किसी तानाशाह की तरह।

इतिहास में हजारों राजाओं का जिक्र है। हर एक ने अपने हिसाब से कई बड़े और बेहतर काम किए हैं। हालांकि एक राजा ऐसा है जिसका नाम अलग ही चमकता है। वह नाम है महान सम्राट अशोक का। शुरू में एक क्रूर राजा के तौर पर पहचान बनाने वाले अशोक ने शस्त्रों को त्याग कर दिलों को जीतना शुरू कर दिया। यही कारण है कि आज भी इतिहास में महान सम्राट अशोक का नाम अमर है। सम्राट अशोक ने दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली सब राज्यों में से एक पर शासन किया। उन्हें विश्व के इतिहास में सबसे अनुकरणीय शासकों में से एक के तौर पर याद किया जाता है। उन्होंने भौगोलिक तौर पर अपने क्षेत्र का विस्तार तो किया ही, साथ ही साथ पूरे विश्व को सहिष्णुता का संदेश दिया। सम्राट अशोक की दूरदर्शी मूल्य, मानवीय नैतिकता आज भी हमारे सामने मिसाल के तौर पर पेश की जाती है। दुनिया में कई सम्राट आए और गए लेकिन आज भी सम्राट अशोक की चमक फीकी नहीं पड़ी है।

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सम्राट अशोक को लोग आज भी दो बड़ी वजह से जानते है। पहला कलिंग युद्ध के लिए जबकि दूसरा है बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए। हालांकि ऐसा नहीं है कि सम्राट अशोक ने अपने जीवन में इन्हीं 2 कामों को किए हैं। सम्राट अशोक ने ऐसे कई बड़े और शानदार काम किए हैं जिनकी मिसाले आज भी दी जाती हैं। सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए शिलालेखों को पढ़ने के बाद उनकी महानता का अंदाजा लगाया जा सकता है। प्रारंभिक जीवन में अपने क्रूरता और लिप्साओं से भरे सम्राट अशोक ने अपने आखिरी क्षणों में दिलों को जीतना शुरू किया था। कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने राजा बनने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की थी। सम्राट अशोक बिंदुसार के पुत्र थे। अशोक के पिता बिंदुसार की 16 पत्नियां थीं और 101 बच्चे थे। सम्राट अशोक ने मौर्य साम्राज्य के तीसरे शासक के तौर पर शासन किया। लेकिन उनका उनका शासन उनके दादा चंद्रगुप्त मौर्य से बिल्कुल अलग था।

अपनी युवावस्था में अशोक काफी गुस्सैल स्वभाव के थे। उनकी क्रूरता के कारण लोग उन्हें चंडाशोक चंड, प्रचंड और कालाशोक जैसे नामों से जानते थे। कहानी तो यह भी कही जाती है कि सम्राट अशोक ने गद्दारी के शक में अपने सैकड़ों मंत्रियों को मौत की सजा दे दी थी। बिल्कुल किसी तानाशाह की तरह। अपने विरोधियों को तरह-तरह की यातानाएं भी देते थे। उन्होंने इसके लिए यातना गृह बनवाया था जिसे धरती कर नर्क भी कहा जाता था। अशोक ने मौर्य साम्राज्य के परंपरा का निर्वहन किया। उन्होंने देश के अंदर मौर्य साम्राज्य का विस्तार किया। इतिहासकारों की मानें तो मौर्य साम्राज्य का सम्राट अशोक के समय में विस्तार बर्मा से लेकर ईरान तक और कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक स्थापित हो चुका था। वह विश्व में एक विजेता के तौर पर उभर रहे थे। उन्होंने नेपाल को जीता और तक्षशिला के विद्रोह को भी शांत किया। इसके साथ ही सम्राट अशोक ने कलिंग को जीतने में भी कामयाबी हासिल की। लेकिन यह वही कलिंग युद्ध था जिसने सम्राट अशोक के हृदय को परिवर्तित किया।

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अशोक का हृदय परिवर्तन 

सम्राट अशोक लगातार अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे। इसी कड़ी में एक राज्य था कलिंग। बंगाल की खाड़ी से सटा हुआ था जो कि एक स्वतंत्र और शक्तिशाली राज्य के तौर पर जाना जाता था। अशोक से पहले चंद्रगुप्त और बिंदुसार ने भी कलिंग को मौर्य साम्राज्य में मिलाने की कोशिश की थी। लेकिन यह सफल नहीं हो पाया था। यही कारण है कि अशोक ने कलिंग को जीतने के ठानी। कलिंग युद्ध में खून पानी की तरह बहा। कलिंग की सेना ने भी सम्राट अशोक को बेहतरीन चुनौती दी। लेकिन आखिरकार जंग में विजयी अशोक हुए। लेकिन इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए। कहते हैं कि भले ही इससे युद्ध में जीत अशोक की हुई लेकिन उनके अंदर से चंडाशोक मर चुका था। इस युद्ध के बाद ही एक नए अशोक का जन्म हुआ जो अपनी दयालुता के लिए जाना गया। कहते हैं कि इस युद्ध को जीतने के बाद जब सम्राट अशोक रणभूमि पहुंचे तो वहां पड़े शवों और उन पर विलाप करते परिजनों को देखकर उनका ह्रदय पसीज गया। इसी युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया। इतिहास यह भी कहता है कि अशोक दयालुता और प्रजापालकता के भी प्रतीक थे जिसकी वजह से उन्हें देवानांप्रिय नाम से भी जाना जाता है। 

धर्म की राह पर अशोक 

जिस समय शस्त्र बल किसी राजा का सबसे बड़ा आधार माना जाता था, उस समय अशोक ने लोगों के दिलों को जीतने का काम किया। अशोक ने अपनी प्रजा के हित को ध्यान में रखते हुए नया सिद्धांत बनाया जिसे अशोक का धम्म कहते हैं। इसमें बौद्ध, जैन और हिंदू तीनों विचारधाराओं का दार्शनिक समागम था। अशोक ने बौद्ध धर्म को अपनाने के बाद इसे न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी फैलाया। उन्होंने बौद्ध धर्म का विदेशों में भी खूब प्रचार-प्रसार कराया। अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को सिलोन भेजा ताकि बौद्ध धर्म का प्रचार किया जा सके। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ अपने आदेशों और आदर्शों को लोगों तक पहुंचाने के लिए सम्राट अशोक ने 84 हजार स्तूपों और स्तंभों का निर्माण कराया। इन सभी पर सम्राट अशोक के आदर्श वाक्य और आदेश लिखे गए थे। यही कारण है कि आज भी अशोक के शिलालेख प्राप्त होते हैं। इन स्तूपों पर उस समय के वास्तुकला का नायाब नमूना देखने को मिलता है। अशोक के  बनवाए गए स्तूपों में सांची का स्तूप सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा अशोक ने सारनाथ में अशोक स्तंभ बनवाया था जो कि लोकप्रिय होने के साथ-साथ भारत का राष्ट्रीय चिन्ह भी है।





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