• क्या गुजरात के जरिए भाजपा मुख्यमंत्रियों को दे रही है सबक ? गुटबाजी नहीं होगी बर्दाश्त

राजनीतिक गलियारों में तो यह भी कहा जाता है कि गुजरात की सत्ता में भले ही कोई भी नेता बैठा हो लेकिन सियासत तो दिल्ली से ही चलती है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को यह गृह राज्य है।

नयी दिल्ली। भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत के सपने को पूरा करने के लिए पिछले छह महीने के भीतर तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को बदल दिया है। दरअसल, भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं उठाना चाहती है। ऐसे में कर्नाटक, उत्तराखंड और फिर गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन करके वहां भाजपा के खिलाफ पनप रहे विरोध को समाप्त करने की कोशिश की है। 

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कर्नाटक में भाजपा के बीएस येदियुरप्पा उनका भूत, वर्तमान और भविष्य हैं। ऐसे में पार्टी उन्हें और उनके समुदाय को नाराज किए बिना प्रदेश में नेतृत्व बदलना चाहती थी और पार्टी ने ऐसा किया भी। येदियुरप्पा ने न सिर्फ पद से इस्तीफा दिया बल्कि लिंगायत समुदाय के बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा था। जिस पर आलानेतृत्व की मुहर लगी और बोम्मई को कर्नाटक की सियासत का सर्वोच्च बना दिया गया।

उत्तराखंड की स्थिति थी काफी अलग

उत्तराखंड में तो हालात काफी अलग थे तभी तो भाजपा को वहां पर दो मुख्यमंत्री बदलने पड़े। पार्टी आगामी चुनाव को लेकर सतर्क है और वह नहीं चाहती है कि कोई गलत संदेश जाए। तभी तो गुजरात में भी परिस्थितियां बदल गईं। क्योंकि 27 दिन पहले भाजपा ने ऐलान किया था कि पार्टी आगामी चुनाव विजय रूपाणी और नितिन पटेल की अनुवाई में लड़ेगी। लेकिन उन्हें अपना फैसला बदलना पड़ा।

दिल्ली से चलती है गुजरात की सियासत !

राजनीतिक गलियारों में तो यह भी कहा जाता है कि गुजरात की सत्ता में भले ही कोई भी नेता बैठा हो लेकिन सियासत तो दिल्ली से ही चलती है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को यह गृह राज्य है। लेकिन विजय रूपाणी के बदले जाने के बाद एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है कि आने वाले समय में किस राज्य का नंबर आएगा और किसे बदला जा सकता है ? हालांकि इस सवाल का जवाब तो मुख्यमंत्री बदले गए राज्यों में ही छिपा हुआ है। 

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क्या है बदलाव की वजह ?

कहा जा रहा है कि लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर पार्टी कोई भी जोखिम नहीं उठाना चाहती है। क्योंकि पार्टी समझती है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे लोकसभा चुनाव को प्रभावित करेंगे। ऐसे में विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में कोई भी कमी नहीं होनी चाहिए। ऐसे में पार्टी अंतर्कलह को समाप्त करने की कोशिशें कर रही है। वहीं कहा तो यह भी जा रहा है कि भाजपा ने आंतरिक सर्वे कराया था, जिसके आधार पर वो पार्टी को दुरुस्त करने में लगी हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भाजपा अपनी पहचान को बदलना चाहती है। एक वक्त था जब नेता की वजह से पार्टी की पहचान होती थी लेकिन भाजपा इस दिशा की तरफ आगे नहीं बढ़ना चाहती है। भाजपा अब नए नेतृत्व को तैयार कर रही है। पार्टी का मानना है कि उसकी वजह से नेताओं की पहचान हो। इसके अलावा पार्टियों में गुटबाजी भी काफी ज्यादा बढ़ गई है। ऐसे में आलानेतृत्व यह संदेश देना चाहता है कि मिलकर एकजुट होकर काम करो, गुटबाजी बर्दाश्त के बाहर है।