Matrubhoomi: जानें कौन थीं अबादी बानो बेग़म, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में निभाई अहम भूमिका

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अंकित सिंह । Apr 05, 2022 2:23PM
अबादी बेगम की शादी अब्दुल अली खान से हुई थी जो कि रामपुर रियासत में एक बड़े ओहदे पर नौकरी करते थे। यही कारण था कि उनका जीवन ठीक-ठाक से बीत रहा था। अबादी बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं। हालांकि उनका परिवार प्रगतिशील विचारों वाला था। यही कारण रहा कि अबादी के अशिक्षित होने की वजह से भी उनके जीवन में कभी कोई बाधा नहीं आया।

सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका काफी अहम रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी ऐसी कई महिलाएं रही जिन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ा। इन्हीं महिलाओं में से एक थीं अबादी बानो बेग़म। अबादी बानो बेग़म को बी-अम्मा के भी नाम से जाना जाता था। वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ऐसी महिला थीं जिन्होंने ना सिर्फ राजनीतिक गतिविधियों में भाग लिया बल्कि दूसरों को भी प्रेरित किया। अबादी बेग़म का 1850 में उत्तर प्रदेश में हुआ था। जब वह महज 7 वर्ष की थीं तो उनका पूरा परिवार 1857 की आजादी की क्रांति में उतर गया था। अबादी बेगम के जेहन में यह बात बैठ गई थी। यही कारण था कि उन्होंने देश के लिए कुछ अलग करने के लिए सोचा।

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अबादी बेगम की शादी अब्दुल अली खान से हुई थी जो कि रामपुर रियासत में एक बड़े ओहदे पर नौकरी करते थे। यही कारण था कि उनका जीवन ठीक-ठाक से बीत रहा था। अबादी बहुत ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थीं। हालांकि उनका परिवार प्रगतिशील विचारों वाला था। यही कारण रहा कि अबादी के अशिक्षित होने की वजह से भी उनके जीवन में कभी कोई बाधा नहीं आया। अबादी बानो बेग़म होने के बावजूद भी शिक्षा की प्रबल समर्थक रहीं। अबादी के पांच बेटे और एक बेटी थी। अबादी के पति ही कम उम्र में मृत्यु हो गई जिसके बाद बच्चों के देखभाल की जिम्मेदारी उन्हीं पर आ गई। अबादी के पास संसाधन भी बेहद कम और सीमित थे। लेकिन अपने बच्चों को बरेली जैसे शहर में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में शिक्षा के लिए भेजा। 

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इसके साथ ही उन्होंने अपने बच्चों को अलीगढ़ से लेकर ऑक्सफोर्ड तक भेजा। अबादी बानो बेग़म ने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपने गहने तक बेच दिए थे और ऐसी तालीम दी कि वे आगे चलकर स्वतंत्रता सेनानी बने। इन्हीं अबादी बेग़म के दो शूरवीर मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता सेनानी बने। सबसे खास बात तो यह रही कि अबादी ने अपने बच्चों की परवरिश ऐसे की ताकि उनमें राष्ट्रवाद की तालीम का विशेष ध्यान रहे। बहुत कम उम्र में वे विधवा हो गईं और बी अम्मा बन गईं। अबादी बानो बेग़म एनी बेसेंट से ही बेहद ही प्रभावित थीं। 1917 में एनी बेसेंट से प्रभावित होकर अबादी बानो बेग़म आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका में आईं। इस दौरान महात्मा गांधी ने भी महिलाओं से आजादी के आंदोलन में जुड़ने को कहा और बी अम्मा उसमें जुट भी गईं। बी अम्मा ने खिलाफत आंदोलन में भाग लिया। मुस्लिम समुदाय से आने के कारण बी अम्मा को कई बड़ी जिम्मेदारियां दी गई जिसे उन्होंने निभाने का प्रयास किया। सबसे खास बात तो यह रही कि बी अम्मा ने बुर्का पहनकर आजादी की लड़ाई लड़ी और कभी इसे बाधा नहीं बनने दिया। 

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बी अम्मा एक सशक्त महिला नेता के तौर पर उभरने लगीं। हिंदू हो या मुसलमान, सभी उन्हें सम्मान करते थे। उन्होंने कई महिलाओं को आजादी की लड़ाई में जोड़ा। आजादी की लड़ाई के दौरान ही वह हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बन गईं। उन्होंने अपने पूरे जीवन में पर्दा प्रथा का पालन किया। वह पर्दे में ही रहकर बड़ी-बड़ी सभाओं को संबोधित करती थीं। वे आजादी की लड़ाई में भारत के प्रतिबद्ध और बहादुर सेनानी के तौर पर उभरी थीं जिनका लोहा हर कोई मानता था। वे हिंदू-मुस्लिम को भारत की दो आंखें कहा करते थीं। वे क्रांतिकारी विचारों वाली महिला थीं जो हमेशा दूसरों को प्रेरित करती थी। उन्होंने बेगम हजरत मोहानी, बसंती देवी, सरला देवी चौधुरानी और सरोजनी नायडू के साथ बड़ी-बड़ी सभाओं को संबोधित करते हुए महिलाओं को प्रेरित किया था। अपने बेटों और देश के लाखों लोगों के अंदर आजादी की चिंगारी जलाकर वह 13 नवबंर 1924 को इस दुनिया को अलविदा कह गईं। हालांकि उन्होंने भारत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक ऐसी भूमिका निभाई जिसकी वजह से उन्हें देश हमेशा याद रखेगा।

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