45 साल चली कानूनी लड़ाई हार गई मुस्लिम बेटी, पैतृक संपत्ति में नहीं मिला हक, अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड होता तो ऐसा न होता

45 साल चली कानूनी लड़ाई हार गई मुस्लिम बेटी, पैतृक संपत्ति में नहीं मिला हक, अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड होता तो ऐसा न होता

मामला जब कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत रहमथुनिशा और नूरजहां को संपत्ति से बेदखल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी। इसके तहत मजांबी को पाशा की संपत्ति में 1/8वां हिस्सा मिला, असगर और

45 साल से चल रही कानूनी लड़ाई में उच्चतम न्यायालय ने एक मुस्लिम विधवा और उसकी बेटी को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया। 1977 में यह मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद 45 साल पुराना यह मामला खत्म हो गया। आपको बता दें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार का अधिकार केवल उन वंशजों को दिया गया है जो अपने बुजुर्ग की मौत के वक्त रहे हों। हालांकि अगर समान नागरिक संहिता के हिसाब से इस मामले का हल किया गया होता तो ऐसा नहीं होता।

यह मामला मोइनुद्दीन पाशा की संपत्तियों के बंटवारे को लेकर था। जस्टिस एल एन राव और बीआर गवाही की पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत स्वीकृत बंटवारे की योजना पर मोहर लगा दी। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत ही बड़े बेटे रहमान गरीब की विधवा और बेटी को कोई हिस्सा नहीं मिला क्योंकि रहमान की मौत पाशा से पहले हो गई थी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ

मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अगर किसी मुस्लिम व्यक्ति की मौत वसीयत किए बिना हो जाती है तो उस वक्त रहने वाले उत्तराधिकारीयों को ही संपत्ति में हिस्सा मिलता है। इसके तहत जन्म के अधिकार को मान्यता नहीं दी गई है। उत्तराधिकार का अधिकार बुजुर्ग या पूर्वज की मौत के समय अस्तित्व में आता है और अगर पूर्व जिंदा हैं तो संपत्ति में किसी भी तरह का हक उत्तराधिकारी का नहीं बनता।

समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता के मामले में बिना किसी लैंगिक भेदभाव के वंशजों में पैतृक संपत्ति का समान बटवारा होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पैतृक संपत्ति में बेटी, बेटे की तुलना में आधी संपत्ति की हकदार होती है।

क्या है पूरा मामला

पाशा ने नूरबी  से शादी की थी और उनके दो बेटे रहमान और असगर हुए। उनकी पत्नी नूरबी की मौत 1944 में हो गई। इसके बाद पाशा ने मजांबी से शादी की और उनसे दो बेटे और तीन बेटियां हुईं। पहली पत्नी से हुए बेटे रहमान ने रहमथुनिसा से शादी की और उन्हें एक बेटी नूरजहां हुई। रहमान 1945 में गुजर गए जबकि उनके पिता पाशा की मृत्यु 1964 में हुई। रहमान की विधवा और पाशा की पत्नी और उनके बच्चों ने उनकी संपत्ति में हक मांगा। कोलार कोर्ट ने कुछ हिस्सा नूरजहां को दिया और बाकी पाशा की पत्नी मजांबी को उनके बच्चों और असगर में बांट दिया।

मामला जब कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत रहमथुनिशा और नूरजहां को संपत्ति से बेदखल कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी। इसके तहत मजांबी को पाशा की संपत्ति में 1/8वां हिस्सा मिला, असगर और मजांबी के दोनों बेटों में हर एक को 7/36वां हिस्सा मिला और तीनों बेटियों के हक में 7/72वां हिस्सा आया है।





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