नेताजी जयंती विशेष: जब हिटलर से मिलने पहुंचे बोस तो उसने अपने हमशक्लों को भेज दिया, फिर जानिए क्या हुआ?

नेताजी जयंती विशेष: जब हिटलर से मिलने पहुंचे बोस तो उसने अपने हमशक्लों को भेज दिया, फिर जानिए क्या हुआ?

जब नेताजी हिटलर से मिलने गए थे। कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस को पहले एक कमरे में बिठाया गया। हिटलर ने अपने कुछ नकली खुद जैसे दिखने वाले अंगरक्षक रखे हुए थे। जिन्हें पहचान करना बेहद कठिन था।

इस साल गणतंत्र दिवस समारोह की शुरूआत नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन 23 जनवरी से हो जाएगी। अभी तक गणतंत्र दिवस समारोह का औपचारिक आयोजन 24 जनवरी से शुरू होता है। सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी से जुड़ी अहम बातें जानना सामयिक और ज्ञानवर्धक है। यह राष्ट्र के युवाओं के लिए खास तौर पर प्रेरणादायक भी है। आजादी की लड़ाई में वह इतना मशगूल थे कि उन्होंने जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर से भी मदद मांगी थी। हिटलर से मिलने को लेकर कई कहानियां मशहूर हैं।

हिटलर हुआ नेताजी का मुरीद

दूसरा विश्वयुद्ध का दौर था और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मन से मिलकर ही आज़ादी हासिल की जा सकती है। बोस को एक नए मंच की जरूरत थी। उन्होंने ये मंच खोज लिया। यह मंच बना उस समय का नाजीवादी जर्मनी। "मुझे भारत की आज़ादी चाहिए" का मंत्र लिए, अपनी जान पर खेलकर बोस अंग्रेजों को झांसा देकर पहले अफगानिस्तान से मॉस्को और फिर रोम होते हुए बर्लिन पहुंचे। शायद ही कोई औए ऐसा नेता ऐसा साहस दिखा सकता था। फिर नाज़ी जर्मनी की भूमि पर उदय हुआ भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले इस अभूतपूर्व सितारे का। "सुभाष बाबू" अब सेनानायक "नेताजी" बन गए। जर्मनी में ही उन्होंने आधुनिक भारत को दो सबसे बड़े तोहफे दिए।- भारत का राष्ट्रीय नारा (जय हिन्द) और भारत का राष्ट्र गान (जन गण मन)। हिटलर और उनके बड़े अफसर नेताजी के मुरीद हो चुके थे। मुसोलिनी की तरह हिटलर भी नेताजी की तरफ यूं खिंचे जैसे लोहा चुम्बक की तरफ खिंचता है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापान की सहायता से बोस ने आज़ाद हिन्द फौज बनाई। बोस का कहना था जार्ज वॉशिंगटन ने अपनी सेना की सहायता से अमेरिका की आज़ादी हासिल की थी। इटली को आज़ादी दिलाने वाले गरिबाल्डी के पास भी एक सेना थी। 

मैं सुभाष भारत से आया हूं

ये घटना उस वक्त की है जब नेताजी हिटलर से मिलने गए थे। कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस को पहले एक कमरे में बिठाया गया। हिटलर ने अपने कुछ नकली खुद जैसे दिखने वाले अंगरक्षक रखे हुए थे। जिन्हें पहचान करना बेहद कठिन था। थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति हिटलर की वेशभूषा में नेताजी के सामने आया और उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा कि मैं हिटलर हूं। नेताजी ने भी हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा कि मैं सुभाष भारत से आया हूं। मगर आप हिटलर नहीं हो सकते। जिसके बाद दूसरा व्यक्ति आया रुबिले अंदाज में आकर उसने हाथ आगे बढ़ाया व कहा मैं हिटलर हूं। नेताजी ने भी फिर हाथ आगे बढ़ाया और कहा कि मैं सुभाष भारत से आया हूं। मगर आप हिटलर नहीं हो सकते। मैं यहां केवल हिटलर से मिलने आया हूं। फिर तीसरी बार पुन: एक व्यक्ति आया उसी वेशभूषा में आकर खड़ा हुआ। नेताजी ने कहा मैं सुभाष चंद्र बोस भारत से आया हूं पर हाथ मिलाने से पहले कृपया दस्ताने उतार दें।  क्योंकि मैं मित्रता के बीच दीवार नहीं चाहता। हिटलर नेताजी के अंदाज का कायल हो गया और उसने तुरंत नेताजी से पूछा तुमने मेरे हमशक्लों को कैसे पहचान लिया। नेताजी ने उत्तर दिया- 'उन दोनों ने अभिवादन के लिए पहले हाथ बढ़ाया जबकि ऐसा मेहमान करते हैं।

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हिटलर ने अपने किये के लिए मांगी माफी

हिटलर ने 'माइन का फ’ नामक आत्मचरित्र में भारत और भारतीय लोगों की बुराई की थी। इस विषय पर सुभाष ने हिटलर से अपनी नाराजगी व्यक्त की। हिटलर ने अपने किए पर माफी मांगी और ‘माइन का फ’ के अगले संस्करण में वह परिच्छेद निकालने का वचन दिया। 





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