भावी पीढ़ियों के लिए पर्यावरण की रक्षा करें:राष्ट्रपति कोविंद

Ram Nath Kovind
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राष्ट्र के नाम राष्ट्रपति के रूप में टेलीविजनपर अपने अंतिम संबोधन में, कोविंद ने कहा, ‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारा देश 21वीं सदी को भारत की सदी बनाने के लिए तैयार हो रहा है।’’उन्होंने कहा कि ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ युवा भारतीयों के लिए अपनी विरासत से जुड़ने और 21वीं सदी में अपने पैर जमाने में बहुत सहायक सिद्ध होगी।

नयी दिल्ली|  राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने युवाओं से अपनी जड़ों से जुड़े रहने और देशवासियों से भावी पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण का आह्वान करते हुए रविवार को कहा कि प्रकृति मां गहरी पीड़ा से गुजर रही है और जलवायु संकट इस ग्रह के भविष्य को खतरे में डाल सकता है। राष्ट्र के नाम अपने विदाई संबोधन में उन्होंने कहा कि देश 21वीं सदी को ‘‘भारत की सदी’’ बनाने के लिए तैयार हो रहा है।

उन्होंने कहा, ‘‘शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हुए हमारे देशवासी सक्षम बन सकते हैं और आर्थिक सुधारों का लाभ लेकर अपने जीवन निर्माण के लिए सर्वोत्तम मार्ग अपना सकते हैं।’’ नवनिर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू सोमवार को देश की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगी।

राष्ट्र के नाम राष्ट्रपति के रूप में टेलीविजन पर अपने अंतिम संबोधन में, कोविंद ने कहा, ‘‘मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारा देश 21वीं सदी को भारत की सदी बनाने के लिए तैयार हो रहा है।’’ उन्होंने कहा कि ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ युवा भारतीयों के लिए अपनी विरासत से जुड़ने और 21वीं सदी में अपने पैर जमाने में बहुत सहायक सिद्ध होगी।

कोविंद ने कहा कि देश हर परिवार को बेहतर आवास, पेयजल और बिजली उपलब्ध कराने के उद्देश्य से काम कर रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘यह बदलाव विकास और सुशासन के जरिये संभव हुआ है, जिसमें किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘महामारी ने सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में और सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। मुझे खुशी है कि सरकार ने इस कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।’’

उन्होंने पर्यावरण के लिए खतरे का विशेष उल्लेख किया और सभी नागरिकों से आने वाली पीढ़ियों के लिए इसका ध्यान रखने को कहा। कोविंद ने कहा, ‘‘प्रकृति मां गहरी पीड़ा से गुजर रही है और जलवायु संकट इस ग्रह के भविष्य को खतरे में डाल सकता है। हमें अपने बच्चों की खातिर अपने पर्यावरण, हमारी जमीन, हवा और पानी का ख्याल रखना चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अपनी दिनचर्या में तथा रोज़मर्रा की चीजों का इस्तेमाल करते समय हमें अपने पेड़ों, नदियों, समुद्रों और पहाड़ों के साथ-साथ अन्य सभी जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए बहुत सावधान रहने की जरूरत है। प्रथम नागरिक के रूप में, यदि अपने देशवासियों को मुझे कोई एक सलाह देनी हो तो मैं यही सलाह दूंगा।’’

राष्ट्रपति कोविंद ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों की त्रिमूर्ति की भी सराहना करते हुए कहा कि उन्हें अमूर्त समझने की गलती नहीं की जानी चाहिए क्योंकि वे उच्च, महान और उत्थानशील हैं। कोविंद ने कहा, ‘‘हमारा इतिहास, न केवल आधुनिक समय का इतिहास बल्कि प्राचीनकाल का इतिहास भी हमें याद दिलाता है कि वे वास्तविक हैं और उन्हें संभवकिया जा सकता है। और वास्तव में उन्हें अलग अलग काल में संभव किया गया है।’’

उन्होंने कहा, हमारे पूर्वजों और हमारे आधुनिक राष्ट्र के संस्थापकों ने कड़ी मेहनत और सेवा की भावना के साथ न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श का उदाहरण दिया। हमें केवल उनके नक्शेकदम पर चलना है और चलते रहना है।’’

उन्होंने सवाल किया, ‘‘और आज एक आम नागरिक के लिए ऐसे आदर्शों के क्या मायने हैं?’’

राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘मेरा मानना है कि मुख्य लक्ष्य उन्हें जीने का आनंद खोजने में मदद करना है। इसके लिए सबसे पहले उनकी बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए।’’

कोविंद ने अपने पहले के दिनों को याद करते हुए कहा, ‘‘जब अपने छोटे से गांव में, एक साधारण बालक के नजरिए से मैं जीवन को समझने की कोशिश कर रहा था, तब देश को आजादी हासिल किए हुए कुछ ही साल हुए थे। देश के पुनर्निर्माण के लिए लोगों में एक नया जोश दिखाई देता था; उनकी आंखों में नए सपने थे। मेरे दिलो-दिमाग में भी एक धुंधली सी कल्पना उभर रही थी कि एक दिन शायद मैं भी अपने देश के निर्माण में भागीदारी कर सकूंगा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘कच्चे घर में गुजर-बसर करने वाले एक परिवार के मेरे जैसे साधारण बालक के लिए हमारे गणतंत्र के सर्वोच्च संवैधानिक पद के बारे में कोई भी जानकारी होना कल्पना से परे था। लेकिन यह भारत के लोकतंत्र की ताकत है कि इसमें हर नागरिक के लिए ऐसे रास्ते खुले हैं, जिन पर चलकर वह देश की नियति को संवारने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।’’

कोविंद ने कहा, ‘‘कानपुर देहात जिले के परौंख गांव के अति साधारण परिवार में पला-बढ़ा वह रामनाथ कोविंद आज आप सभी देशवासियों को संबोधित कर रहा है, इसके लिए मैं अपने देश की जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति को शत-शत नमन करता हूं।

उन्होंने कहा, ‘‘लोकतंत्र के जिस पथ पर हम आज आगे बढ़ रहे हैं उसकी रूप-रेखा हमारी संविधान सभा द्वारा तैयार की गयी थी। उस सभा में पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले अनेक महानुभाव शामिल थे।’’ उन्होंने कहा, ‘‘संविधान को अंगीकृत किए जाने से एक दिन पहले संविधान सभा में अपने समापन वक्तव्य में, डॉ. आंबेडकर ने लोकतंत्र के सामाजिक और राजनीतिक आयामों के बीच के अंतर को स्पष्ट किया था।

उन्होंने कहा था कि हमें केवल राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। मैं उनके शब्दों को आप सबके साथ साझा करता हूं।’’ कोविंद ने डा. आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा, ‘‘हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को एक सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता, यदि वह सामाजिक लोकतंत्र पर आधारित न हो।

सामाजिक लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है जीवन का वह तरीका जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन के सिद्धांतों के रूप में मान्यता देता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में, देश की गौरवशाली यात्रा औपनिवेशिक शासन के दौरान राष्ट्रवादी भावनाओं के जागरण और स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत के साथ शुरू हुई थी।

उन्होंने कहा, ‘‘उन्नीसवीं सदी में देशभर में कई विद्रोह हुए। नई सुबह की उम्मीद लाने वाले कई नायकों के नाम लंबे समय से भुला दिए गए हैं।’’ उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ के योगदान को हाल के दिनों में ही सराहा गया है।

कोविंद ने कहा कि वर्ष 1915 में जब महात्मा गांधी जी स्वदेश लौटे, उस समय देश में राष्ट्रीयता की भावना और भी प्रबल हो रही थी और अनेक महान जननायकों की उज्ज्वल आकाश-गंगा के जैसा प्रकाश हमारे देश को बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में प्राप्त हुआ, वह विश्व इतिहास में अतुलनीय है।

उन्होंने कहा, ‘‘जहां एक ओर आधुनिक युग के एक ऋषि की तरह, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, हमारी सांस्कृतिक विरासत से देशवासियों को फिर से जोड़ रहे थे, वहीं दूसरी ओर बाबासाहब भीमराव आंबेडकर समानता के आदर्श की ऐसी पुरजोर वकालत कर रहे थे जैसा अधिकांश विकसित देशों में भी दिखाई नहीं दे रहा था।’’

उन्होंने कहा, ‘‘तिलक और गोखले से लेकर भगत सिंह और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तक; जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर सरोजिनी नायडू और कमलादेवी चट्टोपाध्याय तक - ऐसी अनेक विभूतियों का केवल एक ही लक्ष्य के लिए तत्पर होना, मानवता के इतिहास में अन्यत्र नहीं देखा गया है।’’

सभी नागरिकों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति गहरा आभार व्यक्त करते हुए, कोविंद ने कहा कि वह छोटे गांवों के किसानों और श्रमिकों के साथ बातचीत से प्रेरित और उत्साहित हैं।

उन्होंने लोगों की सेवा करने वाले चिकित्सकों और नर्सों, राष्ट्र-निर्माण में लगे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों, देश की न्याय वितरण प्रणाली में योगदान देने वाले न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं और प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने वाले नौकरशाहों का भी उल्लेख किया।

कोविंद ने कहा, ‘‘संक्षेप में, मुझे समाज के सभी वर्गों से पूर्ण सहयोग, समर्थन और आशीर्वाद मिला। मैं विशेष रूप से उन अवसरों को संजो कर रखूंगा, जब मुझे सशस्त्र बलों, अर्ध-सैन्य बलों और पुलिस के हमारे बहादुर जवानों से मिलने का अवसर मिला। उनका देशभक्ति का उत्साह बहुत अद्भुत और प्रेरणादायक है।’’

विदेश यात्राओं के दौरान प्रवासी भारतीयों के साथ अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए कोविंद ने कहा कि उन्हें मातृभूमि के लिए उनका प्यार और चिंता बहुत ही मार्मिक लगी।

उन्होंने कहा, ‘‘ये सभी इस विश्वास की पुष्टि करते हैं कि राष्ट्र आखिरकार अपने नागरिकों से बना है और आप में से प्रत्येक भारत को और बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं, देश का महान भविष्य सुरक्षित है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस बात का भी उल्लेख करना चाहूंगा कि राष्ट्रपति के तौर पर कार्यकाल के दौरान अपने पैतृक गांव का दौरा करना और अपने कानपुर के विद्यालय में वयोवृद्ध शिक्षकों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना मेरे जीवन के सबसे यादगार पलों में हमेशा शामिल रहेंगे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसी साल प्रधानमंत्री भी मेरे गांव परौंख आए और उन्होंने मेरे गांव की धरती का मान बढ़ाया। अपनी जड़ों से जुड़े रहना भारतीय संस्कृति की विशेषता है। मैं युवा पीढ़ी से यह अनुरोध करूंगा कि अपने गांव या नगर तथा अपने विद्यालयों तथा शिक्षकों से जुड़े रहने की इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहें।’’

कोविंद ने कहा, ‘‘अपने कार्यकाल के पांच वर्षों के दौरान, मैंने अपनी पूरी योग्यता से अपने दायित्वों का निर्वहन किया है। मैं डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. एस. राधाकृष्णन और डॉ. ए. पी. जे अब्दुल कलाम जैसी महान विभूतियों का उत्तराधिकारी होने के नाते बहुत सचेत रहा हूं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘जब कभी मुझे किसी तरह का संशय हुआ, तब मैंने गांधीजी द्वारा सुझाए गए मूल-मंत्र का सहारा लिया। मैं गांधीजी के सिद्धांतों पर अपने अटूट विश्वास को दोहराते हुए आप सबसे यह आग्रह करूंगा कि आप प्रतिदिन, कुछ मिनटों के लिए ही सही, गांधीजी के जीवन और शिक्षाओं पर अवश्य विचार करें।

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