जेलों में जातिगत भेदभाव: 23 राज्यों के जवाब न देने पर Supreme Court ने जताई नाराजगी

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि जेलों में भेदभाव को लेकर केंद्र द्वारा मांगी गई जानकारी 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा न दिया जाना बेहद दुखद है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि अगली सुनवाई तक जवाब नहीं मिला, तो संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों को व्यक्तिगत रूप से तलब किया जाएगा। पीठ ने राज्यों को इस संबंध में अपना पक्ष रखने का यह आखिरी मौका दिया है।
नयी दिल्ली, तीन नवंबर उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण और ‘‘बहुत दुखद’’ है कि 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने जेलों के भीतर भेदभाव से जुड़े एक मामले में केंद्र द्वारा मांगी गई जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं कराई है। अक्टूबर 2024 में दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले में, न्यायालय ने जेलों में शारीरिक श्रम का बंटवारा, बैरकों को अलग-अलग रखना तथा विमुक्त जातियों और आदतन अपराधियों के प्रति जाति-आधारित भेदभाव पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने 10 राज्यों की जेल नियमावली के उन नियमों को ‘‘असंवैधानिक’’ करार दिया था, जो इस तरह के भेदभाव को बढ़ावा देते थे।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनमोहन की एक पीठ, जो मंगलवार को ‘भारत की जेलों में भेदभाव शीर्षक वाले एक स्वतः संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी, ने इस बात पर गौर किया कि केंद्र ने इस मामले में हुई आगे की प्रगति को दर्शाते हुए एक नयी वस्तु स्थिति रिपोर्ट दाखिल की है। पीठ ने कहा कि इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश पुलिस विनियमन, 1937 के समान पुलिस नियमों और मॉडल कारागार नियमावली, 2016 के तहत गठित जिला-स्तरीय निरीक्षक मंडल से जुड़े मुद्दों को उजागर किया गया है। पीठ ने गौर किया कि यह रिपोर्ट इस साल 30 जुलाई और 10 सितंबर को शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों के पालन में दाखिल की गई है।
अपने 30 जुलाई के आदेश में, शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे चार सप्ताह के भीतर हर जिले में निरीक्षक मंडल का गठन सुनिश्चित करें, जिसकी अध्यक्षता उस जिले के प्रधान जिला न्यायाधीश करेंगे। मंगलवार को मामले की सुनवाई करते हुए, पीठ ने कहा कि रिपोर्ट से पता चलता है कि संबंधित मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अतिरिक्त मुख्य सचिवों/प्रधान सचिवों (गृह)/गृह सचिवों और पुलिस महानिदेशकों(डीजीपी)/पुलिस प्रमुखों को पत्र भेजे थे। पीठ ने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से, 23 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अभी तक केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा मांगी गई जानकारी का जवाब नहीं दिया है।’’ न्ययालय ने उल्लेख किया कि वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर, जो इस मामले में न्याय मित्र के रूप में शीर्ष अदालत की सहायता कर रहे हैं, ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उचित हलफनामों या रिपोर्ट के जरिए यह बताना होगा कि जिला-वार निरीक्षक बोर्ड के गठन को लेकर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
पीठ ने कहा, ‘‘यह बहुत दुखद है कि रिपोर्ट में जिन राज्यों का जिक्र है, वे केंद्रीय गृह मंत्रालय को कोई जवाब नहीं दे रहे हैं।’’ न्यायालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को केंद्र द्वारा उठाए गए विभिन्न मुद्दों पर तुरंत जवाब देने का एक आखिरी मौका दिया है। इससे सरकार एक संयुक्त रिपोर्ट दाखिल कर सकेगी, जिसमें यह बताया जाएगा कि अदालत के निर्देशों के पालन में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। पीठ ने कहा, ‘‘हम आज यह स्पष्ट कर देते हैं कि अगर अगली सुनवाई की तारीख तक राज्यों ने जवाब नहीं दिया, तो हमें राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों/प्रधान सचिवों को व्यक्तिगत रूप से इस अदालत के समक्ष पेश होने का निर्देश देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।’’ अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी 2027 के लिए निर्धारित की है।
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