WhatsApp-Signal छोड़ आतंकियों ने अपनाया नया रास्ता! पॉर्न साइट्स और एन्क्रिप्टेड ऐप्स से भेज रहे हमले के निर्देश

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों और आईएसआई की गुप्त मैसेजिंग की नई साजिश का खुलासा हुआ है। सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए आतंकी व्हाट्सएप छोड़कर अब पॉर्न वेबसाइट्स के लाइव चैट, सीक्रेट डेटिंग और टॉर आधारित ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियां इस चुनौती से निपटने के लिए इन गुप्त माध्यमों की मैपिंग कर रही हैं।
सुरक्षा एजेंसियों ने जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की एक कथित नई साजिश का खुलासा किया है। सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म्स पर निगरानी बढ़ने के बाद अब आतंकी कथित तौर पर पॉर्न वेबसाइट्स, गुप्त डेटिंग फीचर्स और टॉर नेटवर्क पर चलने वाले एन्क्रिप्टेड ऐप्स का इस्तेमाल सीक्रेट मैसेजिंग के लिए कर रहे हैं।
अधिकारियों के अनुसार, इन माध्यमों का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचने और पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स से संपर्क बनाए रखने के लिए किया जा रहा है।
पॉर्न वेबसाइट्स के लाइव चैट का इस्तेमाल
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, आतंकी अब व्हाट्सएप, सिग्नल और फेसबुक जैसे आम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से दूरी बना रहे हैं। उनकी जगह कुछ ऐसे पॉर्न प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनमें आसपास के लोगों से जुड़ने के लिए लाइव चैट की सुविधा होती है।
आरोप है कि पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स इन चैट रूम के जरिए घाटी के युवाओं से संपर्क करते हैं। इसके बाद उन्हें भड़काने और हमलों से जुड़े निर्देश देने की कोशिश की जाती है।
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टॉर आधारित एन्क्रिप्टेड ऐप्स का इस्तेमाल
जांच में यह भी सामने आया है कि आतंकी पहचान छिपाने के लिए ‘कॉटेक्स’ और ‘कॉनियन’ जैसे टॉर आधारित एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। बताया गया है कि भारत में प्रतिबंधित होने के बावजूद इन ऐप्स को VPN के जरिए डाउनलोड किया जा रहा है। जांच के दायरे में फ्रांस, वियतनाम और चीन से जुड़े कुछ अन्य ऐप्स भी हैं।
इनमें से कुछ ऐप्स यूजर्स को बिना सिम कार्ड, फोन नंबर या ईमेल आईडी के अकाउंट बनाने की सुविधा देते हैं। इससे यूजर की पहचान पता करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन सकता है।
2G और एज नेटवर्क पर भी काम करते हैं ऐप्स
सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक, इनमें से कई ऐप्स धीमे 2G और एज (EDGE) नेटवर्क पर भी काम कर सकते हैं। इससे दूरदराज और दुर्गम इलाकों में छिपे आतंकियों के लिए संपर्क बनाए रखना आसान हो जाता है। कुछ प्लेटफॉर्म्स में भेजे गए मैसेज अपने आप गायब हो जाते हैं। वहीं, कुछ ऐप्स में डेटा सीधे यूजर के डिवाइस पर ही प्रोसेस होता है। इसकी वजह से किसी तीसरे पक्ष के लिए बातचीत और डेटा को ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।
पुलवामा हमले के बाद बदला तरीका
आतंकियों की यह रणनीति 2019 के पुलवामा हमले के बाद सामने आए ‘वर्चुअल सिम’ के इस्तेमाल जैसी नई तकनीकी चुनौती के तौर पर देखी जा रही है। पुलवामा हमले के बाद भारत ने आतंकियों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अपने साइबर सर्विलांस सिस्टम को मजबूत किया था। अब आतंकियों की ओर से इन नए और कम निगरानी वाले संचार माध्यमों के इस्तेमाल की जानकारी सामने आने के बाद सुरक्षा एजेंसियां भी अपनी निगरानी और बढ़ा रही हैं।
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ऑफ-ग्रिड मैसेजिंग चैनलों की मैपिंग
सुरक्षा एजेंसियां अब इन ऑफ-ग्रिड मैसेजिंग चैनलों की मैपिंग कर रही हैं। इसका मकसद ऐसे नेटवर्क और संपर्कों का पता लगाना है, ताकि आतंकियों की किसी भी संभावित साजिश को समय रहते नाकाम किया जा सके। अधिकारियों के मुताबिक, आतंकियों के संचार के तरीके लगातार बदल रहे हैं और सुरक्षा एजेंसियां भी इन नए डिजिटल माध्यमों पर नजर रखने के लिए अपनी रणनीति को लगातार अपडेट कर रही हैं।
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