UNDP की Utthan Project से बदले हालात, 42 हजार Waste Pickers बने जलवायु प्रहरी

UNDP की Utthan Project से बदले हालात, 42 हजार Waste Pickers बने जलवायु प्रहरी
प्रतिरूप फोटो
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संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की पहल से देश भर के 42 हजार से अधिक कचरा बीनने वाले कामगारों को नई पहचान और सामाजिक सुरक्षा मिली है। वर्ष 2020 से शुरू हुए इस बदलाव के जरिए कामगारों को बैंक खाते, बीमा और सरकारी योजनाओं से जोड़कर सशक्त बनाया जा रहा है। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य पुनर्चक्रण अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले इन श्रमिकों को जलवायु कार्रवाई के प्रमुख भागीदार के रूप में स्थापित करना है।

अपर्णा बोस नयी दिल्ली, दो सितंबर राष्ट्रीय राजधानी के जागने से बहुत पहले ही असंगठित क्षेत्र के हजारों कामगार अपना दिन शुरू कर देते हैं। वे घर-घर जाकर कचरा इकट्ठा करते हैं, सड़क किनारे बैठकर रोजाना कई किलो कचरे को हाथों से अलग करते हैं और चुपचाप देश की पुनर्चक्रण आधारित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाते हैं। हालांकि लंबे समय तक उन्हें पहचान नहीं मिली, लेकिन अब यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है।

इनमें से हजारों कामगारों के लिए यह पहचान वर्ष 2020 से धीरे-धीरे आकार ले रही है। इसकी शुरुआत बैंक खाता खुलने, बचत की आदत विकसित होने और बीमा सुविधा मिलने से हुई। यह बदलाव केवल आर्थिक सुरक्षा का नहीं, बल्कि सम्मान और गरिमा से भी जुड़ा है।

दिल्ली में कचरा बीनने वाले 48 वर्षीय जोगिंदर केवट ने कहा, ‘‘पहले मेरी पूरी कमाई रोजमर्रा की जरूरतों में खर्च हो जाती थी। लेकिन अब मैं बचत कर पाता हूं और घर के खर्च, खाने तथा बच्चों की पढ़ाई का बेहतर प्रबंधन कर सकता हूं।’’ केवट जैसे हजारों लोग ‘उत्थान परियोजना’ का हिस्सा हैं। यह संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और कुछ सहयोगी संस्थाओं की मदद से शुरू हुई पहल है, जिसका उद्देश्य भारत के ‘सफाई मित्रों’ यानी कचरा संग्रह करने वाले कामगारों को पर्यावरण संरक्षण के प्रहरी, पुनर्चक्रण आधारित अर्थव्यवस्था के सहयोगी और जलवायु कार्रवाई के भागीदार के रूप में पहचान दिलाना है।

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 पर शुरू किए गए ‘प्लैनेट स्टार्ट्स विद पीपल’ अभियान के तहत इन कामगारों को जलवायु परिवर्तन की कहानी के केंद्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है। ये वे लोग हैं जो पहले से ही पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास में योगदान दे रहे हैं, लेकिन अक्सर उनकी भूमिका नजरअंदाज कर दी जाती है। केवट ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘परियोजना से जुड़ने से पहले मेरे हालात स्थिर नहीं थे और मैं रोजाना करीब 100 से 150 रुपये कमाता था।

अब मेरी आजीविका सुरक्षित हुई है और आमदनी भी बढ़ी है। इससे मेरे और मेरे परिवार के लिए जीवन आसान हुआ है। मुझे सरकार की कई योजनाओं और उपलब्ध सहायता के बारे में भी जानकारी मिली।’’ देशभर में अब 42 हजार से अधिक कचरा कामगार इस परियोजना से जुड़े हैं।

इन सभी को यह पहचान अलग-अलग तरीकों से मिली है, लेकिन एक समान भावना है कि उनके काम को अब सम्मान मिल रहा है। यूएनडीपी की भारत में प्रतिनिधि एंजेला लुसिगी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा कि यह अभियान इस बात को रेखांकित करता है कि जलवायु कार्रवाई की शुरुआत स्थानीय स्तर पर लोगों से होती है और कचरा कामगार इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं, क्योंकि वे रोजाना कचरे को अलग करने और पुनर्चक्रण का काम करते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर जलवायु संरक्षण के येाद्धाओं के रूप में नहीं देखा जाता। यूएनडीपी इंडिया में जलवायु और पर्यावरण विभाग के प्रमुख आशीष चतुर्वेदी ने कहा कि कचरा कामगारों के लिए सरकारी कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच बनाने में सबसे बड़ी बाधा पात्रता नहीं, बल्कि जानकारी और आत्मविश्वास की कमी थी।

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