हमें बुरा देखने से बचना चाहिए : डॉ. नंदा

हमें बुरा देखने से बचना चाहिए : डॉ. नंदा

डॉ. वर्तिका नंदा ने कहा कि पत्रकारिता की पढ़ाई में हम पाँच ‘डब्ल्यू’ और एक ‘एच’ पढ़ाया जाता है। अब उसमें हमें एक ‘एच’ और जोड़ लेना चाहिए- ह्यूमैनिटी। यदि आप किसी पीडि़त से बात करें, तब उसकी जगह अपने को रखकर सोचें। मैं बड़े चैनल का पत्रकार हूँ, यह भाव छोडऩा चाहिए।

भोपाल। जहाँ बुरा देखने की जरूरत हो, हमें वहीं बुरा देखना चाहिए। जहाँ बुरा न हो, वहाँ जबरन बुरा देखने की जगह अपने मन की आँखों को खोल कर सकारात्मक देखना चाहिए। बुरा देखने के लिए सारी दुनिया पड़ी है। यदि हम बुरा ही देखते रहेंगे तो अच्छा नहीं कर पाएंगे। यह विचार मीडिया प्राध्यापक डॉ. वर्तिका नंदा ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित ऑनलाइन व्याख्यानमाला ‘स्त्री शक्ति संवाद’ में व्यक्त किए। डॉ. नंदा मीडिया अध्यापन के साथ ही जेलों और बंदियों के जीवन पर काम करती हैं। उन्होंने लंबे समय तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्राइम रिपोर्टिंग भी की है। 

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‘जेल और मीडिया’ विषय पर अपने व्याख्यान में लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली के पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष एवं ‘तिनका-तिनका’ की संस्थापक डॉ.वर्तिका नंदा ने बताया कि उन्होंने तिनका-तिनका पर काम करने से पहले मीडिया का चश्मा उतार दिया था। अपने सभी पूर्वाग्रह त्याग कर बंदियों के साथ संवाद किया। उन्होंने कहा कि जेलों की जिंदगी कठिन है। दबाव से भरी है। जेलों में कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। कई बंदी ऐसे भी हैं, जिनसे अपराध तो हुआ है लेकिन उन्हें अपने अपराध पर पछतावा है। उन्होंने बताया कि उनकी संवेदना ऐसे सभी बंदियों के साथ रहती है। लेकिन, जेल में और जेल के बाहर ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने अपराध किए हैं और उन्हें किसी तरह का पछतावा नहीं है। ऐसे लोगों के साथ किसी प्रकार की संवेदना नहीं होनी चाहिए। डॉ. नंदा ने कहा कि कोरोना ने हम सबको जिंदगी की जेल से जो परिचय कराया है, उसे हमें भूलना नहीं चाहिए। हालांकि, हम सब अपने घर में बंद थे, जो मन करता था वह खा सकते थे, दिनचर्या भी अपने मन के अनुसार थी। इसके बाद भी घर के बाहर जाने की बेचैनी रहती थी। उन्होंने कहा कि जिसको भी न्याय की जरूरत हो, हमें उसकी मदद करनी चाहिए। लेकिन, हमें मदद का शोर नहीं करना चाहिए। उन्होंने बताया कि कोरोना के कारण जेल के बंदियों से मुलाकात बंद हुई, तो फोन पर उनसे बात हुई। वे अपनी रचनात्मकता को दुनिया के सामने लाना चाहते हैं। तिहाड़ जेल में काम करते हुए कैदियों पर एक गीत लिखा, जिसे महिला और पुरुष बंदियों ने गाया। कई महिलाओं ने चित्र बनाये हैं और कई ने कविताएं लिखीं। 

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अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ. नंदा ने कहा कि तिनका-तिनका पर काम करते हुए जिंदगी ने उन्हें सिखाया कि बड़ा काम करना है तो बोलना भी कम चाहिए और दिखना भी कम चाहिए। कम कहेंगे, कम दिखेंगे, तभी बड़ा काम कर सकते हैं। बहुत ज्यादा दिखने के चक्कर में हम वह काम नहीं कर पाते जिसे करने के लिए ऊपरवाले ने हमें बनाया और यहाँ भेजा। डॉ. नंदा ने बताया कि लंबे समय तक पत्रकारिता करने के बाद जेल पर काम करते हुए उन्होंने सबसे जरूरी बात यही सीखी कि अपने लालच और अपने प्रचार पर, कैसे नियंत्रण कैसे रखा जाए। 

पत्रकारिता की पढ़ाई में एक ‘एच’ और शामिल किया जाए : 

मीडिया प्राध्यापक डॉ. वर्तिका नंदा ने कहा कि पत्रकारिता की पढ़ाई में हम पाँच ‘डब्ल्यू’ और एक ‘एच’ पढ़ाया जाता है। अब उसमें हमें एक ‘एच’ और जोड़ लेना चाहिए- ह्यूमैनिटी। यदि आप किसी पीडि़त से बात करें, तब उसकी जगह अपने को रखकर सोचें। मैं बड़े चैनल का पत्रकार हूँ, यह भाव छोडऩा चाहिए। मानवीय संवेदना से उसके पक्ष को जानने और लिखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हमें गोपनीयता का पालन करना चाहिए। अगर किसी ने आपसे कहा है कि यह बात किसी को नहीं बताना तो मरते दम तक उसे किसी को नहीं बताना चाहिए। इसके साथ ही पत्रकारिता के विद्यार्थियों को उन्होंने कहा कि किसी का साक्षात्कार करना है तो पहले तैयारी कर लेनी चाहिए। यूँ ही किसी का साक्षात्कार करने नहीं जाना चाहिए। अपने संबोधन के आखिर में उन्होंने कहा कि हमें प्रयास करना चाहिए कि हमारी जिंदगी किसी के काम आए, हम किसी के मददगार बन सकें, लेकिन उस काम और मदद का शोर न करें। 

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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन : 

विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने अपने घर पर योग कर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया। योग शिक्षक देवेन्द्र शर्मा ने फेसबुक लाइव के माध्यम से सबको योगाभ्यास कराया। इस अवसर पर कुलपति प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा विश्व योग दिवस के बहाने भारत को विश्व से जुडऩे और अपनी पहचान कराने का अवसर मिला है। दुनिया के अनेक देश जब योग के बहाने भारत के साथ जुड़ते हैं तो उन्हें भारतबोध होता है





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