जब देश जश्न में डूबा था, तब मोदी क्या कर रहे थे? आखिर PM Modi ने New Year को कैसे किया Celebrate?

Narendra Modi
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प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले दस वर्षों में ‘प्रगति’ मंच के माध्यम से 85 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाया गया है। हम आपको बता दें कि यह प्रगति मंच केवल एक समीक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि देश की शासन संस्कृति में आए ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक बन चुका है।

जब देश नए साल के स्वागत में जश्न, आतिशबाज़ी और छुट्टियों के मूड में डूबा हुआ था, उसी वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की प्रगति की गहन समीक्षा में जुटे थे। हम आपको बता दें कि बुधवार को प्रधानमंत्री ने ‘प्रगति’ (Pro-Active Governance and Timely Implementation) मंच की 50वीं बैठक की अध्यक्षता करते हुए न केवल बीते एक दशक की उपलब्धियों का लेखा-जोखा लिया, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए शासन और विकास का स्पष्ट रोडमैप भी रखा।

प्रधानमंत्री ने बताया कि पिछले दस वर्षों में ‘प्रगति’ मंच के माध्यम से 85 लाख करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाया गया है। हम आपको बता दें कि यह प्रगति मंच केवल एक समीक्षा प्रणाली नहीं, बल्कि देश की शासन संस्कृति में आए ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रतीक बन चुका है। बैठक के दौरान सड़क, रेलवे, बिजली, जल संसाधन और कोयला क्षेत्रों की पांच प्रमुख अवसंरचना परियोजनाओं की समीक्षा की गई, जो पांच राज्यों में फैली हैं और जिनमें 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश शामिल है।

प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब शासन का मतलब फाइलें आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि समय पर निर्णय, सटीक समन्वय और तय जवाबदेही है। उन्होंने दो टूक कहा कि जब निर्णय समय पर होते हैं और जिम्मेदारी तय होती है, तो उसका सीधा लाभ देश के नागरिकों को मिलता है।

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‘पीएम श्री योजना’ की समीक्षा करते हुए प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को चेताया कि यह योजना केवल इमारतें खड़ी करने तक सीमित न रहे। उनका जोर परिणामों पर था यानि ऐसी शिक्षा व्यवस्था जो समग्र हो, भविष्य के लिए तैयार हो और बाकी स्कूलों के लिए मानक बने। उन्होंने सभी मुख्य सचिवों को निर्देश दिया कि वह स्वयं निगरानी करें और वरिष्ठ अधिकारी जमीन पर जाकर स्कूलों की वास्तविक स्थिति का आकलन करें।

प्रधानमंत्री ने ‘प्रगति’ के मूल विचार को याद करते हुए बताया कि इसकी प्रेरणा गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए शुरू किए गए ‘स्वागत’ तंत्र से मिली थी, जहां तकनीक के ज़रिये समयबद्ध तरीके से जन-शिकायतों का समाधान किया जाता था। उसी मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित कर ‘प्रगति’ मंच के रूप में लागू किया गया, जिसने परियोजना निगरानी, कार्यक्रम क्रियान्वयन और शिकायत निवारण को एक ही मंच पर जोड़ दिया।

हम आपको बता दें कि आंकड़े इस परिवर्तन की गवाही देते हैं। वर्ष 2014 से अब तक ‘प्रगति’ के तहत 377 परियोजनाओं की समीक्षा की गई, जिनसे जुड़े 3,162 मुद्दों में से 2,958 यानी लगभग 94 प्रतिशत का समाधान हो चुका है। इसके चलते वर्षों से अटकी परियोजनाएं आगे बढ़ीं, लागत बढ़ने से रुकी और विभागों के बीच समन्वय बेहतर हुआ। असम का बोगीबील रेल-सड़क पुल, जम्मू-उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक, नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भिलाई स्टील प्लांट का विस्तार और गडरवारा व लारा सुपर थर्मल पावर परियोजनाएं, ये सब प्रगति के ठोस उदाहरण हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘प्रगति’ सहकारी संघवाद का जीवंत मॉडल है, जहां केंद्र, राज्य, मंत्रालय और विभाग एक ही मंच पर समस्या का समाधान खोजते हैं। हम आपको बता दें कि अब तक करीब 500 केंद्रीय सचिव और राज्य के मुख्य सचिव इसमें भाग ले चुके हैं। अगले चरण के लिए प्रधानमंत्री ने अपना मंत्र दोहराते हुए कहा, “Reform to simplify, Perform to deliver, Transform to impact”, उन्होंने इसे ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य से जोड़ा।

देखा जाये तो यह दृश्य प्रतीकात्मक है और बेहद अर्थपूर्ण भी। जब देश नए साल की रात में उलटी गिनती कर रहा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रगति की समीक्षा कर रहे थे। यही फर्क है दिखावटी नेतृत्व और जिम्मेदार नेतृत्व में। यही वजह है कि मोदी की राजनीति उत्सवों की नहीं, उत्तरदायित्व की राजनीति बन चुकी है।

वैसे यह कोई पहली बार नहीं है। जब देश दीपावली मना रहा होता है और लोग अपने परिजनों के साथ खुशियाँ मना रहे होते हैं तब प्रधानमंत्री मोदी सीमाओं पर खड़े जवानों के साथ खुशियाँ बाँट रहे होते हैं। कभी सियाचिन की बर्फ में, कभी राजस्थान की तपती रेत में और कभी अरुणाचल की ऊँचाइयों पर। इसके अलावा, ‘प्रगति’ मंच दरअसल उस सोच का नाम है, जिसने “चलता है” संस्कृति को खत्म कर दिया है। दशकों तक देश में परियोजनाएं लटकती रहीं, फाइलें धूल खाती रहीं और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टाली जाती रही। मोदी ने इस ढर्रे को तोड़ा। उन्होंने सवाल पूछे, समयसीमा तय की और जवाबदेही मांगी। नतीजा यह हुआ कि जो परियोजनाएं सरकारों की उम्र खा गई थीं, वह धरातल पर उतरने लगीं।

यह उन आलोचकों के लिए भी जवाब है, जो कहते हैं कि सरकार केवल प्रचार में व्यस्त है। 85 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं को गति देना कोई नारा नहीं, यह ठोस प्रशासनिक क्षमता का प्रमाण है। 94 प्रतिशत समस्याओं का समाधान महज़ आंकड़ा नहीं, यह इच्छाशक्ति का आईना है। मोदी का शासन मॉडल यह भी दिखाता है कि विकास और संवेदनशीलता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। एक तरफ सीमाओं पर जवानों के साथ त्योहार, दूसरी तरफ सचिवों के साथ देर रात तक समीक्षा बैठकें, यही संतुलन नेतृत्व को बड़ा बनाता है। यही कारण है कि ‘प्रगति’ केवल एक डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि एक मानसिक बदलाव है।

बहरहाल, आज जब दुनिया भारत को उभरती शक्ति के रूप में देख रही है, तब उसके पीछे यह निरंतर, अनुशासित और परिणाम-उन्मुख शासन है। जश्न मनाना बुरा नहीं, लेकिन जश्न के बीच भी काम करना, यह हर किसी के बस की बात नहीं। और शायद यही वजह है कि जब देश सो रहा होता है, तब सरकार जाग रही होती है। यही नया भारत है और यही ‘प्रगति’ है।

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