Father Of Indian AI | कौन हैं राज रेड्डी, जिन्हें कहा जाता है फॉदर ऑफ इंडियन एआई|Matrubhoomi

विशाल डेटा सेट के बीच पैटर्न तलाशने के लिए एआई का इस्तेमाल भले ही कई दशक पुराना हो, लेकिन आज के दौर में चैटजीपीटी (ChatGPT) और बार्ड (Bard) जैसे प्रॉडक्ट्स ने जो हलचल मचाई है, उसकी सबसे बड़ी वजह 'जनरेटिव एआई' है। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. रेड्डी ने पिछले 50 वर्षों में जो काम किया, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी जनरेटिव एआई की बुनियाद तैयार करने को समर्पित रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के विकास और वर्चस्व की इस जंग में भले ही अमेरिका और चीन सबसे आगे हों और भारत उनसे थोड़ा पीछे नजर आ रहा हो, लेकिन इस क्षेत्र के शुरुआती विचारकों और रचनाकारों में आज भी एक भारतीय मूल के वैज्ञानिक का नाम सबसे ऊपर आता है। हम बात कर रहे हैं डॉ. डब्बाला राजगोपाल "राज" रेड्डी की। डॉ. रेड्डी फिलहाल कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर साइंस विभाग में मोज़ा बिंत नासिर यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उनकी रिसर्च का मुख्य केंद्र 'ह्यूमन-कंप्यूटर इंटरैक्शन' (इंसान और कंप्यूटर का आपसी तालमेल) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रहा है। इसके साथ ही, वर्तमान में वे 'स्पोकन लैंग्वेज सिस्टम' (आवाज़ पहचानने वाली तकनीक), 'गीगाबिट नेटवर्क', 'यूनिवर्सल डिजिटल लाइब्रेरी' और 'डिस्टेंस लर्निंग ऑन डिमांड' (मांग पर दूरस्थ शिक्षा) जैसे कई क्रांतिकारी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। उस दौर में, जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज की तरह कोई कल्ट या 'बज़वर्ड' नहीं बना था, इसने एक ऐसे शख्स का ध्यान अपनी ओर खींचा जिनका एकमात्र बड़ा जुनून तकनीक को गरीब और विकासशील देशों तक पहुंचाना था। यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर, जिसने आगे चलकर इस विषय की सोच को नए आयाम दिए। विशाल डेटा सेट के बीच पैटर्न तलाशने के लिए एआई का इस्तेमाल भले ही कई दशक पुराना हो, लेकिन आज के दौर में चैटजीपीटी (ChatGPT) और बार्ड (Bard) जैसे प्रॉडक्ट्स ने जो हलचल मचाई है, उसकी सबसे बड़ी वजह 'जनरेटिव एआई' है। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. रेड्डी ने पिछले 50 वर्षों में जो काम किया, उसका एक बड़ा हिस्सा इसी जनरेटिव एआई की बुनियाद तैयार करने को समर्पित रहा है।
इसे भी पढ़ें: AI ने खुद लिखा 80% Code! Claude बनाने वाली Anthropic की रिपोर्ट से सनसनी, बढ़ा ये बड़ा खतरा
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
भारत में जन्मे डॉ. राज रेड्डी बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए। अमेरिका में वे अग्रणी कंप्यूटर वैज्ञानिकों और एआई शोधकर्ताओं में से एक बन गए। भारत में उनकी प्रारंभिक शिक्षा ने उनके भावी करियर की मजबूत नींव रखी। इसके अलावा, अमेरिका में उनके आगे के अध्ययन ने उनकी विशेषज्ञता को और भी निखारा। डॉ. रेड्डी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान वाक् पहचान और प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण में है। ये दो सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जो मशीनों को मानव भाषा को समझने और संसाधित करने में सक्षम बनाने पर केंद्रित हैं। 1994 में रेड्डी को कंप्यूटर विज्ञान में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ जब उन्हें बड़े पैमाने पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों के डिजाइन और निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाने, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक महत्व और संभावित वाणिज्यिक प्रभाव को प्रदर्शित करने" के लिए ए.एम. ट्यूरिंग पुरस्कार (एडवर्ड फीगेनबाम के साथ संयुक्त रूप से) से सम्मानित किया गया। वास्तव में ऐसा कोई बड़ा पुरस्कार नहीं है जो उन्होंने न जीता हो 1984 में फ्रेंच लीजन ऑफ ऑनर, 1991 में आईबीएम रिसर्च राल्फ गोमोरी फेलो अवार्ड, 2001 में पद्म भूषण, 2004 में ओकावा फाउंडेशन ओकावा पुरस्कार, 2005 में होंडा फाउंडेशन होंडा पुरस्कार और 2006 में अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान बोर्ड वैनेवर बुश पुरस्कार।
इसे भी पढ़ें: Reliance और Meta की मेगा डील! Jamnagar में बनेगा भारत का सबसे एडवांस AI डेटा सेंटर
एआई में अग्रणी कार्य
डॉ. रेड्डी के कार्यों ने कंप्यूटरों को न केवल लिखित पाठ पढ़ने में सक्षम बनाया, बल्कि बोले गए शब्दों को सुनने और समझने में भी सक्षम बनाया, जिससे मनुष्यों और मशीनों के बीच इंटरफ़ेस में काफी सुधार हुआ। अपनी रिसर्च के दम पर उन्होंने ऐसी बेहतरीन तकनीक विकसित की, जिससे कंप्यूटर आवाज़ के निर्देशों पर काम करने लगे। आज हम जो वॉयस असिस्टेंट और आवाज़ से चलने वाले गैजेट्स देखते हैं, उनकी शुरुआत इसी तकनीक से हुई थी।
इसे भी पढ़ें: नैनो SIM अब देश में! Ashwini Vaishnaw ने MNIT Jaipur में Makers Lab का किया उद्घाटन
भारत के AI परिदृश्य में डॉ. रेड्डी का योगदान
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के अनुसंधान और शिक्षा को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में डॉ. रेड्डी का नाम सबसे आगे आता है। अमेरिका में अपनी सफलताओं के इतर, उन्होंने भारत के 'राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ नॉलेज टेक्नोलॉजीज' में एआई रिसर्च की नींव रखने में बेहद अहम भूमिका निभाई। आज यह संस्थान देश में एआई की युवा प्रतिभाओं को तराशने वाले एक बड़े हब के रूप में उभर चुका है। डॉ. रेड्डी के विज़न से प्रेरित होकर आज सैकड़ों छात्र और प्रोफेशनल्स एआई के क्षेत्र में अपना करियर बना रहे हैं, जिसने दुनिया भर में भारत के बढ़ते एआई दबदबे को और मजबूत किया है। डॉ. रेड्डी का प्रभाव केवल किताबी ज्ञान या एकेडमिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एआई के इस्तेमाल के बड़े पैरोकार रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल तकनीकी विकास करना नहीं, बल्कि भारतीय शोधकर्ताओं के लिए ऐसे अवसर पैदा करना है जिससे वे वैश्विक मंच पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकें।
भारतीय AI जगत के अन्य दिग्गज चेहरे
एआई के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के इस सफर में डॉ. रेड्डी अकेले नहीं हैं; देश के कई अन्य दिग्गजों ने भी इस दिशा में क्रांतिकारी काम किए हैं। इसी फेहरिस्त में एक बड़ा नाम आईआईटी खड़गपुर के मशहूर प्रोफेसर पार्थ प्रतिम चक्रवर्ती का है। डॉ. चक्रवर्ती ने इमेज प्रोसेसिंग और मेडिकल इमेजिंग खासकर 'पैटर्न आइडेंटिफिकेशन' और 'कंप्यूटर विज़न' के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। उनकी इसी अग्रणी रिसर्च की बदौलत आज ऐसे आधुनिक एआई सिस्टम तैयार हो सके हैं, जो बीमारियों के सटीक और शुरुआती निदान (डायग्नोसिस) में गेम-चेंजर साबित हो रहे हैं। डॉ. चक्रवर्ती की रिसर्च ने न केवल विज्ञान जगत की कई जटिल गुत्थियों को सुलझाया है, बल्कि उनके काम को दुनिया की शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सॉफ्टवेयर टूल्स और इंटरनेशनल टेक्स्टबुक्स में भी शामिल किया गया है। 200 से अधिक रिसर्च पेपर्स के प्रकाशन और दर्जनों पीएचडी छात्रों को मेंटर करने वाले डॉ. चक्रवर्ती आज भी इस फील्ड को नई दिशा दे रहे हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश के सर्वोच्च सम्मान 'शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार' से सम्मानित डॉ. चक्रवर्ती भारत के वैज्ञानिक और शैक्षणिक समुदाय के सबसे प्रतिष्ठित चेहरों में से एक हैं।
अन्य न्यूज़














