अजीत जोगी: प्रशासनिक सेवा में कार्य करने के बाद राजनीति में आए, छत्तीसगढ़ के पहले सीएम बनने का गौरव प्राप्त हुआ

अजीत जोगी: प्रशासनिक सेवा में कार्य करने के बाद राजनीति में आए, छत्तीसगढ़ के पहले सीएम बनने का गौरव प्राप्त हुआ
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राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अजीत जोगी की बुद्धिमत्ता या बौद्धिकता उनकी हमेशा ताकत रही है और आजीवन उनके साथ रही। अजीत जोगी की शुरुआती यात्रा बेहद ही दिलचस्प रही। उन्होंने भोपाल के मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ़ टेक्नोलॉजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।

जब-जब छत्तीसगढ़ और वहां की राजनीति के बारे में चर्चा होगी, तब-तब अजीत जोगी का नाम जरूर आएगा। छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई दिग्गज हुए लेकिन अजीत जोगी के समानांतर कोई नहीं पहुंच सका। अजीत जोगी का जन्म बिलासपुर जिले के जोगीडोंगरी गांव में 29 अप्रैल 1946 को एक साधारण परिवार में हुआ था। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अजीत जोगी की बुद्धिमत्ता या बौद्धिकता उनकी हमेशा ताकत रही है और आजीवन उनके साथ रही। अजीत जोगी की शुरुआती यात्रा बेहद ही दिलचस्प रही। उन्होंने भोपाल के मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ़ टेक्नोलॉजी से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। वह कॉलेज में टॉपर रहे और इसलिए 1968 में यूनिवर्सिटी में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता। इतना ही नहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून की भी पढ़ाई की। इसके बाद अजीत जोगी ने इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया। हालांकि बाद में वह आईपीएस बन गए। डेढ़ साल तक आईपीएस रहने के बाद उन्होंने आईएएस की परीक्षा निकाली। उनकी पहली पोस्टिंग गृह राज्य मध्यप्रदेश में ही हुई।

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14 सालों तक आईएएस रहने के बाद उनकी दिलचस्पी राजनीति में हुई। इससे पहले अजीत जोगी रायपुर, सीधी, शहडोल और इंदौर में बतौर कलेक्टर काम कर चुके थे। उनकी पहचान एक तेजतर्रार आईएएस ऑफिसर की थी उन्हें नियम और विनियमों की अच्छी जानकारी थी। साधारण कद काठी वाले अजीत जोगी में गजब का आत्मविश्वास था। वह दूर की सोचते थे और यही कारण था कि उन्हें नेताओं का भरोसेमंद अधिकारी भी माना जाता था। सीधी में ही काम करने के दौरान अजीत जोगी का परिचय अर्जुन सिंह से हुआ था। अर्जुन सिंह अजीत जोगी के राजनीतिक गुरु बन गए। इसके बाद अजीत जोगी धीरे-धीरे राजनीति की सीढ़ीया चढ़ते गए। अजीत जोगी पहली बार 1986 में राज्यसभा के लिए चुने गए। वह 1998 तक राज्यसभा में बने रहे। 1987- 89 में उन्हें राज्य का महासचिव बनाया गया। अजीत जोगी कांग्रेस के लिए मणिपुर और सिक्किम में बतौर पर्यवेक्षक काम कर चुके हैं। अजीत जोगी ने रायगढ़ से 1998 में लोकसभा का चुनाव जीता। इसके बाद उन्हें दोबारा 2004 में छत्तीसगढ़ के महासमुंद से चुनाव जीतने का मौका मिला। 2009 में भी उन्होंने इस सीट से जीत हासिल की थी। हालांकि 2014 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

जोगी ने नवगठित राज्य छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कहा था ‘‘कई वर्ष पहले हमने और हमारे पूर्वजों ने एक सपना देखा था, आदर्श छत्तीसगढ़ राज्य का सपना, जो हमारी आशाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को स्वीकार करे। एक नवंबर, 2000 की मध्यरात्रि, जब शेष भारत सो रहा था तब देश के नक्शे में नवजात छत्तीसगढ़ राज्य का उदय विकास की असीम संभावनाओं के साथ हुआ। छत्तीसगढ़ राज्य का सपना पूरा होने की खुशी में हम सब सहभागी हैं।’’ वर्ष 2000 से वर्ष 2003 तक तीन वर्ष के शासन काल में जोगी ने ऐसी कई योजनाओं को छत्तीसगढ़ में शुरू किया जिससे राज्य को नई पहचान मिली तथा आने वाले बेहतर भविष्य के लिए मजबूत नींव भी तैयार हुई। लेकिन इस तीन वर्ष के दौरान राज्य में कई घटनाएं ऐसी हुई जिसके कारण जोगी का नाम विवादों में आता रहा। राज्य विधानसभा में कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्या होने के बावजूद भाजपा के 12 विधायकों ने कांग्रेस प्रवेश किया तब इसका असर नकारात्मक हुआ। वहीं 2003 के चुनावी वर्ष के दौरान राज्य में कई घटनाएं हुई और जोगी का नाम विवादों में जुड़ता रहा। इस वर्ष राजधानी रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता रामवतार जग्गी की हत्या हो गई। पार्टी के नेता विद्याचरण शुक्ल ने इस हत्या के लिए अजीत जोगी को जिम्मेदार ठहराया और इसी वर्ष भारतीय जनता पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रबल दोवेदार राज्य के वरिष्ठ नेता दिलीप सिंह जूदेव की कथित भ्रष्टाचार की एक सीडी सामने आ गई। विपक्षी दलों ने जोगी पर साजिश करने का आरोप लगाया। 

राज्य में जोगी का नाम विवादों से जुड़ने का यह अंतिम मामला नहीं था। जब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हो गई और भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल गया तब जोगी पर आरोप लगा कि उन्होंने भाजपा के विधायकों को प्रलोभन देकर कांग्रेस में लाने की कोशिश की है। इस आरोप के बाद जोगी को कांग्रेस से निलंबित कर दिया गया, लेकिन तीन माह बाद अजीत जोगी का निलंबन समाप्त हो गया और वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में वह महासमुंद से भाजपा के प्रत्याशी विद्याचरण शुक्ल के खिलाफ खड़े हो गए तथा जीत भी गए। इस चुनाव के दौरान ही जोगी का वाहन दुर्घटनाग्रस्त हुआ और उनका आगे का सफर व्हील चेयर से सहारे शुरू हुआ। अजीत जोगी की जीवटता का ही परिणाम था कि वह इसके बावजूद राजनीति में सक्रिय रहे और तमाम परेशानियों से लड़ते हुए आगे बढ़ते गए। जोगी कभी अपनी जाति को लेकर विवाद में रहे तो कभी उनपर भाजपा सरकार की बी टीम के रूप में काम करने का आरोप लगा। राज्य में वर्ष 2013 में विधानसभा चुनाव में हार के बाद जब कांग्रेस का नेतृत्व भूपेश बघेल (वर्तमान मुख्यमंत्री) के हाथ में चला गया तब जोगी और राज्य नेतृत्व के बीच खाई बढ़नी शुरू हो गई। वर्ष 2014 में कांकेर जिले के अंतागढ़ विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव हुआ और इस दौरान जोगी पर कांग्रेस के प्रत्याशी मंतुराम पवार को चुनाव मैदान से हटाने के लिए मुख्यंमत्री रमन सिंह के साथ सांठगांठ करने का आरोप लगा।

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इन आरोपों के बाद पार्टी ने 2015 में अजीत जोगी के बेटे और विधायक अमित जोगी को पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर वर्ष 2016 में राज्य में नई पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) बनाई। राज्य में वर्ष 2018 के चुनाव में किंग मेकर की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे अजीत जोगी ने मायावती की पार्टी बहुजन समाज पार्टी के साथ समझौत कर लोगों को चौका दिया था। हालंकि, इस चुनाव में जोगी गठबंधन को महज सात सीट ही मिल सकी। इस चुनाव में कांग्रेस को बड़ा जनादेश मिला और उसने 68 सीटों पर जीत हासिल की जबकि भाजपा को 15 सीटों पर ही जीत मिल सकी। अजीत जोगी इस हार के बावजूद थके नहीं डटे रहे। राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन के बाद जोगी की परेशानी ही बढ़ी। पिछले वर्ष एक उच्चस्तरीय जांच समिति ने जोगी को आदिवासी मानने से इंकार कर दिया और जोगी के खिलाफ मामला भी दर्ज किया गया। हालांकि, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जोगी राज्य के ऐसे नेता रहे हैं जिन्हें जन नेता कहा जा सकता है। वह जनसभा में छत्तीसगढ़ी में भाषण देते और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल हो जाते थे। उनकी पत्नी रेनु जोगी ने अपनी किताब अजीत जोगी अनकही कहानी में लिखा है अजीत जोगी रहें न रहें, जोगी का परिवार रहे न रहे, अजीत जोगी की विचारधारा हमेशा जिंदा रहेगी।

- अंकित सिंह