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मुगलों की गुलामी से कराहते देश की उम्मीद की किरण बने थे शिवाजी

By प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क | Publish Date: Jun 6 2018 11:51AM

मुगलों की गुलामी से कराहते देश की उम्मीद की किरण बने थे शिवाजी
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इतिहास में आज के दिन का महत्व जानने के लिए ठीक 444 साल पीछे जाना होगा, जब मुगलों की 400 साल की गुलामी से कराहते देश को छत्रपति शिवाजी के रूप में उम्मीद की एक किरण दिखाई दी थी। वह छह जून का ही दिन था, जब मुगलों के साम्राज्यवादी सपनों को हकीकत में बदलने से रोकने के लिए भारत के महान सपूत छत्रपति शिवाजी का रायगढ़ के किले में राज्याभिषेक हुआ था और उन्हें छत्रपति की उपाधि से नवाजा गया था।

राष्ट्र के महानायक
 
वीर छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के ही नहीं अपितु पूरे भारत के महानायक थे। वह एक अत्यंत महान कुशल योद्धा और रणनीतिकार थे। वीर माता जीजाबाई के सुपुत्र वीर शिवाजी का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब महाराष्ट्र ही नहीं अपितु पूरा भारत मुगल आक्रमणकारियों की बर्बरता से आक्रांत हो रहा था। चारों ओर विनाशलीला व युद्ध के बादलों के दृश्य पैदा हो रहे थे। बर्बर हमलावरों के आगे भारतीय राजाओं की वीरता जवाब दे रही थी उस समय शिवाजी का जन्म हुआ। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब पूरा भारत निराशा के गर्त में डूबा हुआ था। कहा जाता है कि जिस कालखंड में सेक्युलर राज्य की कल्पना पश्चिम में लोकप्रिय नहीं थी उस समय शिवाजी ने ही हिंदू परम्परा के अनुकूल सम्प्रदाय निरपेक्ष धर्मराज्य की स्थापना की। शिवाजी का जीवन रोमहर्षक तथा प्रेरणास्पद घटनाओं का भंडार है।

शिवाजी के जन्म का काल
 
जिस समय शिवाजी का जन्म हआ था उस समय पूरे भारत की हालत वास्तव में बहुत ही चिंतनीय व दारूण हो चुकी थी। चारों तरफ हाहाकार मचा था। एक के बाद एक भारतीय राजा मुगलों के अधीन हुये जा रहे थे। बिना युद्ध किये वे उनके गुलाम होते जा रहे थे। मंदिरों को लूटा जा रहा था, गायों की हत्या हो रही थी, नारी अस्मिता तार−तार हो चुकी थी। ऐसे भयानक समय में शिवनेरी किले में माता जीजाबाई ने वीर पुत्र को जन्म दिया। माता जीजाबाई ने बचपन से ही शिवाजी को कहानियां सुनायीं जिसका असर उनके मन पर पड़ा। शिवाजी की निर्भयता का उदाहरण उनके बचपन से ही मिलने लगा था। उन्होंने बीजापुर में सुल्तान के आगे सिर नहीं झुकाया। बस यहीं से उनकी विजय गाथा प्रारम्भ होने लग गयी थी। 16 वर्ष की अवस्था तक आते−आते मुगलों के मन में शिवाजी के प्रति भय उत्पन्न होने लग गया था। बीजापुर दरबार से लौटते समय एक बार उन्होंने रास्ते में एक कसाई जो गायों की हत्या करने के लिये जा रहा था, का हाथ काट दिया था। यह उनकी एक और वीरता निर्भयता का अनुपम उदाहरण था।
 
स्वराज्य की स्थापना
 
सन 1642 में रायरेश्वर मंदिर में कई नवयुवकों ने शिवाजी के साथ स्वराज्य की स्थापना करने का निर्णय लिया। सर्वप्रथम तोरण का दुर्ग जीता। उसके बाद उनका एक के बाद एक विजय अभियान चल निकला। 15 जनवरी 1656 को सम्पूर्ण जावली, रायरी सहित आधा दर्जन किलों पर कब्जा किया। सूपा, कल्याण, दाभोल, चोल बंदरगाह पर भी नियंत्रण कर लिया। 30 अप्रैल 1657 की रात्रि को जुन्नरनगर पर विजय प्राप्त की। शिवाजी की सफलताओं से घबरा कर तत्कालीन मुगल शासक ने शिवाजी को आश्वस्ति पत्र भेजा था। लेकिन शिवाजी यही नहीं रूके उनका अभियान तेज होता चला गया। बाद में अफजल खां शिवाजी को पकड़ने निकला लेकिन शिवाजी उससे कहीं अधिक चतुर निकले और अफजल खां मारा गया। इसके बाद शिवाजी के यश की कीर्ति पूरे भारत में ही नहीं अपितु यूरोप में भी सुनी गयी। विभिन्न पड़ावों, राजनीति और युद्ध से गुजरते हुए ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी के दिन शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया। भारतीय इतिहास में पहली मजबूत नौसेना का निर्माण शिवाजी के कार्यकाल में माना गया है। शिवाजी की नौसेना में युद्धपोत भी थे तथा भारी संख्या में जहाज भी थे।

स्वराज्य के साथ सुराज भी
 
शिवाजी भारत के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने स्वराज्य में सुराज की स्थापना की थी। प्रत्येक क्षेत्र में मौलिक क्रांति की। शिवाजी मानवता के सशक्त संरक्षक थे। वे सभी धर्मों का आदर और सम्मान करते थे। लेकिन हिंदुत्व पर आक्रमण कभी सहन नहीं किया। उनके राज्य में गद्दारी, किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार, धन का अपव्यय आदि पर उनका कड़ा नियंत्रण था। शिवाजी में परिस्थितियों को समझने का चातुर्य था। शिवाजी ने अपने जीवनकाल में भारी यश प्राप्त किया था। इतिहास बताता है कि उन्होंने शून्य से सृष्टि का निर्माण किया। एक छोटी सी जागीर के बल पर बड़े राज्य का मार्ग प्रशस्त किया। शिवाजी ने उत्तर से दक्षिण तक अपनी विजय पताका फहराने में सफलता प्राप्त की थी।

कुशल प्रशासक थे शिवाजी
 
शिवाजी केवल युद्ध में ही निपुण नहीं थे अपितु उन्होंने कुशल शासन तंत्र का भी निर्माण किया। राजस्व, खेती, उद्योग आदि की उत्तम व्यवस्था ऐजाद की। शिवाजी के शासनकाल में किसी भी प्रकार का तुष्टीकरण नहीं होता था। शिवाजी को एक कुशल शासक और प्रबुद्ध सम्राट के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कई बार शुक्राचार्य तथा कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लिया। उनकी आठ मंत्रियों की मंत्रिपरिषद थी जिन्हें अष्टप्रधान कहा जाता था। इसमें मंत्रियों के प्रधान को पेशवा कहा जाता था। वह एक समर्पित हिंदू थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे। उन्होंने कई मस्जिदों के निर्माण में भी सहायता की थी और उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। वह अच्छे सेनानायक के साथ अच्छे कूटनीतिक भी थे।
 
दूरदृष्टा थे शिवाजी महाराज  
 
शिवाजी की दूरदृष्टि व्यापक थी। शिवाजी के शासनकाल में अपराधियों को दण्ड अवश्य मिलता था लेकिन साबित हो जाने पर। शिवाजी का राज्याभिषेक होने के बाद ही सच्चे अर्थों में स्वराज्य की स्थापना हुई थी। हिंदू समाज में गुलामी और निराशा के भाव के साथ जीने की भावना को शिवाजी ने ही समाप्त किया। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बहुत से लोगों ने शिवाजी के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना तन−मन−धन न्यौछावर कर दिया। 
 
शिवाजी का जीवन वीरतापूर्ण, अतिभव्य और आदर्श जीवन है। नयी पीढ़ी को शिवाजी की जीवनी अवश्य पढ़नी चाहिये। इससे उनके जीवन में एक नयी स्फूर्ति और उत्साह का वातावरण अवश्य पैदा होगा तथा निराशा का भाव छंटेगा।
 

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